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World Elders Day 2018: इन खास तरीकों से अपने घर के बुजुर्गों के लिए बनाएं हर दिन ''स्पेशल''

कहावत है कि बूढ़ा बरगद भी छांव तो देता ही है। घर-परिवार के बुजुर्ग भी ऐसे ही होते हैं, सदैव स्नेह की छांव देने वाले। लेकिन आज की जीवनशैली में वे उपेक्षा और अकेलेपन का दंश झेलने को विवश हो रहे हैं।

World Elders Day 2018: इन खास तरीकों से अपने घर के बुजुर्गों के लिए बनाएं हर दिन स्पेशल
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संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (यूएनपीएफ) की रिपोर्ट के अनुसार 2050 तक भारत में बुजुर्गों की तादाद बढ़कर तीन गुनी हो जाएगी। अपने देश में फिलहाल जनसंख्या का 6 फीसदी हिस्सा बुजुर्ग हैं।

लेकिन अफसोस की बात है कि देश, समाज और परिवार को गढ़ने में अपना पूरा जीवन लगा देने वाले बहुत से बुजुर्ग जिंदगी के आखिरी पड़ाव पर फाइनेंशियल, सोशल और पर्सनल फ्रंट पर खुद को अकेला पाते हैं।

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हमारे यहां उम्रदराज लोगों का एक बड़ा प्रतिशत ऐसा है, जो खुद को समाज से कटा हुआ महसूस करता है। उम्र की ढलती सांझ में जब बुजुर्गों को बच्चों के सहारे की सबसे ज्यादा जरूरत होती है, वे अकेले रह जाते हैं।

ह्यूमन राइट्स ऑफ एल्डरली इन इंडिया- अक्रिटिकल रिफ्लेक्शन ऑन सोशल डेवलपमेंट की एक रिपोर्ट में 5000 बुजुर्गों की आपबीती सुनने पर सामने आया कि 25 प्रतिशत बुजुर्गों को घर के युवा सदस्य बोझ समझते हैं और उनके प्रति उपेक्षा का भाव रखते हैं।यकीनन ऐसी स्थितियां चिंतनीय हैं, जिनमें घर के बुजुर्ग खुद को अकेला और असुरक्षित समझते हैं।

सिमट रही है सोच

हमारे सामजिक, पारिवारिक परिवेश में बड़े-बुजुर्गों को हमेशा परिवार का मुखिया मानकर सम्मान दिया जाता रहा है। तजुर्बे और मार्गदर्शन की अनमोल पूंजी माना गया है। बावजूद इसके अब बुजुर्गों के प्रति सोच और स्वीकार्यता में बड़ा फर्क देखने को मिल रहा है।

बुजुर्गों के लिए अब ना सिर्फ सोच संकुचित हो रही है, बल्कि घर में उनकी जगह भी सिमट कर रह गई है। घर हो या बाहर, हर जगह बुजुर्गों के साथ अपमानजनक व्यवहार भी होने लगा है।

ऐसे तिरस्कार के चिंताजनक आंकड़े हेल्पेज इंडिया संस्था द्वारा देश के 19 छोटे-बड़े शहरों में साढ़े चार हजार से अधिक बुजुर्गों पर किए एक सर्वे में भी सामने आए हैं। जिसमें खुद बुजुर्गों ने उपेक्षा और बुरे व्यवहार की शिकायत की है।

इस सर्वे में 44 फीसदी बुजुर्गों का कहना था कि पब्लिक प्लेसेस पर उनके साथ बहुत गलत व्यवहार किया जाता है। अपने हों या पराए, उन्हें भावनात्मक रूप से आहत करते हैं। ऐसे में जरूरी है कि इस सिमटती सोच पर लगाम लगे।

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ना हों उपेक्षित

जिनका पूरा जीवन अपनी संतान को पालने-संवारने में गुजरा हो, उनकी मौजूदगी कभी उपेक्षा का शिकार ना बने, इसका ध्यान हमें ही रखना होगा। जीवन में बहुत से उतार-चढ़ाव देख, इस उम्र तक पहुंचने वाले बुजुर्गों को घर में अपनापन और प्यार ना मिले तो वे अकेलेपन और अवसाद का भी शिकार हो जाते हैं।

ऐसे में अपना सब कुछ बच्चों को बड़ा करने में लगा देने वाले बुजुर्गों के मन में अपराधबोध भी जगह बना लेता है। नई पीढ़ी को इस बात का ख्याल रखना चाहिए कि जो बुजुर्ग हमारी पारिवारिक, सामाजिक व्यवस्था की रीढ़ हैं, उन्हें वो अहमियत उम्रभर मिले, जिसके वे हकदार हैं।

यह समझना जरूरी है कि घर के बड़ों का निरादर करना, उनके स्नेह का नहीं घर के संस्कारों का अपमान करना भी है। उनके पास जो अनुभव का खजाना है, वो भावी पीढ़ी के लिए सहेजने योग्य थाती है। वे जो सिखाते-समझाते हैं, वो किताबों के पन्नों में नहीं मिलता। इसीलिए उनके स्नेह और समर्पण का मान रखना जरूरी है।

ना भूलें अपना आधार

आज जीवन की भागदौड़ में हम अपने बड़े-बजुर्गों को ही भूलते जा रहे हैं। न्यूक्लियर फैमिलीज में एक ओर बच्चे अकेले हैं तो दूसरी ओर बड़े-बुजुर्ग अपनेपन को तरस रहे हैं। जबकि अनुभवों और नवीनता का यह सेतु एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को जोड़ता है।

जिसके चलते भावी नागरिकों को भी जीवन की सही समझ और विचारों को स्थायी पृष्ठभूमि मिलती है। यह तकलीफदेह है कि जिन बुजुर्गों के स्नेह की छांव तले बच्चों को उनके अनगिनत सवालों के जवाब मिल जाते हैं, वही बुजुर्ग, अपने बच्चों से बात करने को भी तरस जाते हैं।

नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने वाले इस साथ को भुलाना, उपेक्षित करना अपने आधार से दूर होना है।

समझने वाली बात यह है कि बुजुर्गों को भावनात्मक रूप से तकलीफ देने वाला व्यवहार करने वाले बच्चे, कहीं ना कहीं खुद की जिंदगी की व्यावहारिक बुनियाद को भी कमजोर करते हैं। वे संयत और सम्मानजनक व्यवहार करना ही भूल जाते हैं।

तब मिलेगी उनको खुशी

घर-परिवार के बुजुर्गों को खुशहाली देने के लिए बहुत ज्यादा करने की जरूरत नहीं। आपकी कुछ छोटी बातें और प्रयास से भी उन्हें बहुत खुशी मिल सकती है। यहां बताई जा रही कुछ बातें आपके लिए मददगार हो सकती हैं।

1.उनके लिए समय निकालें।

2.उनकी हेल्थ ही नहीं इमोशंस की भी फिक्र करें।

3.अपनी किसी परेशानी पर उनसे सलाह लें।

4.उन्हें हर सेलिब्रेशन में शामिल करें।

5.ठेस पहुंचाने वाली भाषा कभी ना बोलें।

6.अपनी सफलता का क्रेडिट उन्हें जरूर दें।

7.निरंतर संवाद करें, आभार जताएं।

8.उन्हें सक्रिय रहने को प्रेरित करें

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