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#WorldDrugDay भारत में नशीली दवाओं का क्या है कानून ?

इंटरनेशनल नारकोटिक्स कंट्रोल बोर्ड की रिपोर्ट में कहा गया है कि भौगोलिक स्थिति के कारण भारत नशीली दवाओं की तस्करी के लिए अच्छा रास्ता बन गया है। आरंभ में भारत में नशीली दवाओं से संबंधित कानून बहुत पुराने थे, जिनमें अवैध व्यापार के लिए बहुत कम सजा का प्रावधान था, इसलिए स्वापक औषधि और मन:भावी पदार्थ अधिनियम, 1985 बनाया गया, जो 14 नवम्बर 1985 से लागू हुआ।

#WorldDrugDay  भारत में नशीली दवाओं का क्या है कानून ?
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आज वर्ल्ड ड्रग डे है। नशे की रोकथाम के लिए हमारे कानून अन्य देशों के मुकाबले बहुत कड़े हैं, फिर भी अपराधी कुछ खामियों की वजह से बच निकलते हैं और यही कारण है कि मादक पदार्थों का व्यापार फल-फूल रहा है। हमारे युवा जिस कदर मादक पदार्थों के शिकंजे में फंस रहे हैे, उससे समाज का कर्त्तव्य है कि वह युवा पीढ़ी का मार्गदर्शन करके उसे उचित मार्ग दिखलाए। इसे अपना उत्तरदायित्व समझकर समाज को इस दिशा में कार्रवाई करनी चाहिए। यह कार्य सिर्फ सरकार पर छोड़ देना उचित नहीं है।

मादक पदार्थों की तस्करी नशे के सौदागरों के लिए सोने का अंडे देने वाली मुर्गी साबित हो रही है। यह अवैध व्यापार निरन्तर फल-फूल रहा है, जिसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि विश्व की कुल अर्थव्यवस्था का 15 फीसदी हिस्सा यही व्यापार रखता है। भारत से मादक पदार्थों की तस्करी अफगानिस्तान, पाकिस्तान, चीन, बर्मा, ईरान आदि देशों के जरिये होती है।

हालांकि भारत इस अवैध व्यापार में तस्करों के लिए केवल एक पड़ाव का काम करता है, लेकिन इसके दुष्प्रभावों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। क्योंकि इस अवैध व्यापार का तस्करी, आतंकवाद, शहरी क्षेत्र के संगठित अपराध तथा आर्थिक एवं व्यावसायिक अपराधों से काफी करीबी रिश्ता है।

इंटरनेशनल नारकोटिक्स कंट्रोल बोर्ड की रिपोर्ट में कहा गया है कि भौगोलिक स्थिति के कारण भारत नशीली दवाओं की तस्करी के लिए अच्छा रास्ता बन गया है। आरंभ में भारत में नशीली दवाओं से संबंधित कानून बहुत पुराने थे, जिनमें अवैध व्यापार के लिए बहुत कम सजा का प्रावधान था, इसलिए स्वापक औषधि और मन:भावी पदार्थ अधिनियम, 1985 बनाया गया, जो 14 नवम्बर 1985 से लागू हुआ।

1961 में भारत ने नशीली दवाओं के बारे में अंतरराष्ट्रीय करार पर और 1988 में नशीली दवाओं तथा मदहोशी पैदा करने वाले पदार्थों के अवैध व्यापार पर रोक संबंधी संयुक्त राष्ट्र के करार पर हस्ताक्षर किए, इसलिए 1988 में भारत में एक और अधिनियम बनाया गया जिसे ‘स्वापक औषधि और मन:प्रभावी पदार्थ के अवैध व्यापार की रोकथाम अधिनियम’ नाम दिया गया।

इसमें जेल की कड़ी सजा और जुर्माने के साथ नशीली दवाओं का अवैध धंधा करने वालों को मौत की सजा देने तथा उनकी सम्पत्ति जब्त करने का प्रावधान भी किया गया। हालांकि हमारे यहां के कानून अन्य देशों के मुकाबले बहुत कड़े हैं, फिर भी अपराधी कुछ खामियों की वजह से बच निकलते हैं और यही कारण है कि मादक पदार्थों का अवैध व्यापार भारत में फल-फूल रहा है।

हमारे युवा जिस कदर मादक पदार्थों की शिकंजे में फंस रहे हैे, उससे समाज का कर्त्तव्य है कि वह युवा पीढ़ी का मार्गदर्शन करके उसे उचित मार्ग दिखलाए। इसे अपना उत्तरदायित्व समझकर समाज को इस दिशा में कार्रवाई करनी चाहिए। यह कार्य सिर्फ सरकार के ही भरोसे छोड़ देना उचित नहीं है।

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