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वर्ल्ड आर्थराइटिस डे: अगर आप भी हैं जोड़ों के दर्द परेशान, घर पर अपनाएं ये टिप्स- मिलेगा आराम

बोंस ज्वाइंट से जुड़ी आर्थराइटिस की प्रॉब्लम केवल ओल्ड एज के लोगों में ही नहीं होती, अपेक्षाकृत कम उम्र के लोग भी इसकी चपेट में आ रहे हैं। आर्थराइटिस को पूरी तरह ठीक नहीं किया जा सकता है, लेकिन समय रहते समुचित उपचार कराने पर इसे बढ़ने से रोका जा सकता है। हम आपको बता रहे हैं आर्थराइटिस के कारण, प्रकार और इसके रोकथाम के बारे में।

वर्ल्ड आर्थराइटिस डे: अगर आप भी हैं जोड़ों के दर्द परेशान, घर पर अपनाएं ये टिप्स- मिलेगा आराम

बोंस ज्वाइंट से जुड़ी आर्थराइटिस की प्रॉब्लम केवल ओल्ड एज के लोगों में ही नहीं होती, अपेक्षाकृत कम उम्र के लोग भी इसकी चपेट में आ रहे हैं। आर्थराइटिस को पूरी तरह ठीक नहीं किया जा सकता है, लेकिन समय रहते समुचित उपचार कराने पर इसे बढ़ने से रोका जा सकता है। हम आपको बता रहे हैं आर्थराइटिस के कारण, प्रकार और इसके रोकथाम के बारे में।

हमें अपने आस-पास छोटी-बड़ी उम्र के कई ऐसे लोग मिल जाएंगे, जो घुटने के दर्द को लेकर परेशान हैं। जोड़ों के दर्द ने उनके दूसरे काम तो दूर, चलना-फिरना तक मुहाल कर रखा है। मेडिकल टर्म में जोड़ों के दर्द की समस्या को आर्थराइटिस या गठिया रोग कहा जाता है।

इसका सबसे अधिक प्रभाव उनके घुटनों, कोहनी, हाथ-पैर की अंगुलियों, गर्दन, स्पाइन, कूल्हे या हिप-बोन, टखनों की हड्डियों पर पड़ता है। इसके गंभीर रूप लेने पर अंगों में विकृति आ सकती है और विकलांगता को भी झेलना पड़ सकता है।

आर्थराइटिस से जुड़े फैक्ट्स

विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के हिसाब से भारत में आर्थराइटिस के 18 करोड़ पेशेंट्स हैं। जिनमें 60 प्रतिशत मरीज महिलाएं हैं। पहले यह समस्या जहां 50 साल के पार और बुजुर्गों में देखी जाती थी। आज के बदलते परिवेश में भागदौड़ वाली लाइफस्टाइल, खान-पान की गलत आदतें जैसे कारणों के चलते 30 साल के 20 फीसदी युवा भी ऑस्टियोआर्थराइटिस की चपेट में आ रहे हैं।

यही नहीं 14 साल से भी कम उम्र के बच्चे भी इससे अछूते नहीं रहे हैं, जिसे ज्युवेनाइल आर्थराइटिस कहा जाता है। आर्थराइटिस पुरुषों की तुलना में महिलाओं को अधिक होता है। इसकी मुख्य वजह है- प्राकृतिक रूप से महिलाओं की हड्डियां पुरुषों के मुकाबले छोटी, पतली और मुलायम होती हैं, जिससे आर्थराइटिस की गिरफ्त में जल्दी आ जाती हैं।

45-50 साल की उम्र में मेनोपॉज के बाद महिलाओं के शरीर में कैल्शियम के अवशोषण में कमी हो जाती है। जिससे उनकी बोन डेंसिटी कम हो जाती है और हड्डियां कमजोर हो जाती हैं। मेनोपॉज की स्टेज पर पहुंची महिलाओं के शरीर में एस्ट्रोजन हार्मोन बहुत तेजी से कम होने लगता है। एस्ट्रोजन हार्मोन की कमी से उनकी हड्डियों के क्षरण होने लगता है, जिससे उनमें सूजन और दर्द रहता है और आर्थराइटिस की समस्या उभर जाती है।

आर्थराइटिस क्या है

आर्थराइटिस हमारे शरीर में मौजूद हड्डियों के जोड़ों की बीमारी है। दो हड्डियों के जोड़ों के बीच सॉफ्ट कार्टिलेज होता है, जो हड्डियों को सपोर्ट करता है और जोड़े रखता है। उम्र बढ़ने के साथ हड्डियों के बीच मौजूद कार्टिलेज घिसता जाता है। इससे हड्डियों के बीच गैप कम हो जाता है और वे आपस में रगड़ खाने लगती हैं। जिससे जोड़ों में सूजन और ऐंठन आ जाती है। जोड़ों की हड्डियों में कभी रुक-रुक कर तो कभी लगातार दर्द रहता है।

आर्थराइटिस के प्रकार

शरीर के जोड़ों के हिसाब से आर्थराइटिस कई प्रकार के होते हैं, जिनका उपचार अलग-अलग तरह से किया जाता है। ज्यादातर मामलों में ऑस्टियो आर्थराइटिस, रूमेटॉयड आर्थराइटिस उम्र बढ़ने के साथ विकसित होते हैं, लेकिन कुछ मरीजों में यह आनुवांशिक भी हो सकता है।

अगर किसी के पैरेंट्स को आर्थराइटिस है, तो संभव है बच्चों में भी उसके जीन आ सकते हैं। ऐसे बच्चों में कम उम्र में ही आर्थराइटिस के लक्षण दिखाई देने लगते हैं। भागदौड़ वाली लाइफस्टाइल, अनहेल्दी डाइट की आदत, फास्ट फूड का क्रेज मोटापे को न्योता देता है जो आस्टियोआर्थराइटिस की मूल वजह है।

वजन बहुत ज्यादा होने पर घुटनो, हिप-बोन और स्पाइन पर दबाव पड़ता है और उनमें दर्द होना शुरू हो जाता है। इनके अतिरिक्त कुछ बैक्टीरिया जोड़ों पर सीधे अटैक करते हैं और आर्थराइटिस की समस्या उत्पन्न करते हैं।

पेनकिलर नहीं है समाधान

आर्थराइटिस में दर्द से राहत पहुंचाने के लिए मरीज को टेबलेट या इंजेक्शन के फॉर्म में एनाल्जेसिक पेनकिलर मेडिसिन दी जाती हैं। इनसे उन्हें दर्द में अस्थायी तौर पर आराम तो मिलता है, लेकिन लंबे समय तक इनका उपयोग घातक साबित होता है, अल्सर हो सकता है।

फिजियोथेरेपी है फायदेमंद

फिजियोथेरेपी आर्थराइटिस को गंभीर रूप धारण नहीं करने देने और दर्द से राहत पहुंचाने में फायदेमंद तो है ही साथ ही जोड़ों में दर्द की वजह से मरीज के फिजिकल मूवमेंट में आई कमी को दूर करने में भी मददगार होता है। फिजियोथेरेपिस्ट मरीज की स्थिति के हिसाब से एक्सरसाइज का चयन और समुचित टाइम नियत करते हैं।

आर्थराइटिस बीमारी का अंदेशा होने पर ही अगर मरीज फिजियोथेरेपिस्ट की गाइडेंस में एक्सरसाइज करना शुरू कर देते हैं, तो बीमारी को बढ़ने से रोका जा सकता है। इसके साथ ही गंभीर रूप ले चुके आर्थराइटिस की सर्जरी होने के बाद फिजियोथेरेपी की एक्सरसाइज मरीज को जल्दी ठीक होने में मदद करती हैं।

एक्सरसाइज

मरीजों के लिए वेट-बियरिंग एक्सरसाइज या वजन घटाने वाले व्यायाम करना फायदेमंद है। चूंकि ज्यादा वजन होने से हड्डियों पर दबाव पड़ता है और उनके टूटने की संभावना रहती है, ऐसे मरीज वॉकिंग, ब्रिस्क वॉकिंग, जॉगिंग, सीढ़ियां चढ़ना, स्ट्रेचिंग जैसी एक्सरसाइज कर सकते हैं। इनके अलावा संभव हो तो साइकलिंग, स्वीमिंग भी कर सकते हैं।

इनसे शरीर के विभिन्न अंगों में मूवमेंट होती है, मसल्स एक्टिव रहते हैं और आर्थराइटिस का खतरा कम हो जाता है। एक्सरसाइज नियमित करें। शुरू में बहुत तेजी से और लंबे समय तक न करें, इन्हें धीरे-धीरे बढ़ाएं।

वेट लिफ्टिंग जैसी हार्ड एक्सरसाइज न करें, अगर करना चाहें तो लो-वेट रखकर ही करें जिससे हड्डियों पर दबाव न पड़े। गिरने या चोट लगने वाली एक्सरसाइज न करें। सिट-अप जैसी एक्सरसाइज जिसमें घुटनो, स्पाइन को मोड़ना पड़ता है न करें। एरोबिक या जंपिंग एक्सरसाइज न करें, इससे आपके गिरने या चोट लगने का खतरा हो सकता है।

न्यूट्रीशस डाइट

कुछ खाद्य पदार्थ के नियमित सेवन से जोड़ों में होने वाली सूजन और दर्द में राहत मिलती है। ये खाद्य पदार्थ हमारी हड्डियों को मजबूत बनाते हैं और हमारे इम्यून सिस्टम को बूस्ट करते हैं। डेयरी प्रोडक्ट्स, हरी पत्तेदार सब्जियां नियमित रूप से अपने आहार में शामिल करें। शरीर में सूजन की वजह से सी-रिएक्टिव प्रोटीन का स्तर बढ़ जाता है।

साबुत अनाज, फल-सब्जियों और फाइबर से भरपूर डाइट सूजन कम करने में सहायक है। अदरक में सूजन-विरोधी गुण पाए जाने के कारण आहार में ज्यादा से ज्यादा शामिल करें। ओमेगा-3 फैटी एसिड से भरपूर मैकरेल, सैलमन मछली, अलसी, मूंगफली और अखरोट का सेवन फायदेमंद है।

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