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अॉफिस में सज-संवर कर जाने पर क्यों उठती हैं ''कैरेक्टर'' पर उंगलियां

अॉफिस में सज-संवर कर पुरुष कुलिग्स का ध्यान भटकाने के लिए आई हो।

अॉफिस में सज-संवर कर जाने पर क्यों उठती हैं कैरेक्टर पर उंगलियां
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नई दिल्ली. अॉफिस और काम करने की जगहों पर महिलाओं के पहनावे को लेकर पुरुषों की अलग-अलग सोच है। दफ्तरों में महिलाओं को परंपरागत कपड़े पहनने की सलाह दी जाती है तो कई बार किसी महिला वर्कर को सिर्फ इसलिए निकाल दिया जाता है क्योंकि वह ऊंची हील की सैंडिल पहनकर अॉफिस आई थी। अॉफिस में अगर आप सज-संवर कर आईं हैं तो किसलिए? काम करने वाले पुरुष कुलिग्स का ध्यान भटकाने के लिए? आखिर क्यों अॉफिस या दफ्तर में महिलाओं को सजने-संवरने पर उनपर सवाल उठाएं जाते हैं। काम करने की जगह पर किसी महिला के थोड़े डार्क कलर के कपड़े पहनने पर उसके करैक्टर पर उंगलियां उठ जाती हैं।
लंदन की संसद ने महिलाओं के लिए मनमाना ड्रेस कोड रखने वाली कंपनियों पर जुर्माना लगाने की बात कही है। दरअसल लंदन की एक रिसेप्शनिस्ट को ऊंची एड़ी की सैंडल पहनने से मना करने पर ऑफ़िस से घर भेज दिया गया था। निकोला थ्रोप ने इस भेदभाव भरे ड्रेस कोड को चुनौती दी और याचिका दायर की। इस पर अब तक डेढ़ लाख लोग साइन कर चुके हैं।
कपड़े और दूसरी चीजों को लेकर काम की जगह पर टीका-टिप्पणी और अनलिखा कोड भारत में भी दिखाई देता है।
भारत में महिलाओं के कपड़ों पर उंगलियां उठना कोई बड़ी बात नहीं है। वहीं अब तो पढ़े-लिखे लोग भी रेप जैसे बड़े अपराधों में महिलाओं के कपड़ों को ही वजह बताने लगे हैं। भारत में सिर्फ अॉफिस में ही नहीं बल्कि बाजार जाते समय, मंदिर जाते समय, शादी-पार्टी और नॉर्मल आउटिंग के लिए भी अलग-अलग ड्रेस कोड है। आपको देखने और टोकने वालों की तादाद कभी कम नहीं होगी।
चाहे वह बड़ी बिंदी हो या जूड़े में अटका फूल, फटी जीन्स या टैंक टॉप, घुंघरू वाली चप्पल या टिक-टॉक करती हिल्स। साजगार हम सबके जीवन में रंग और राग बिखेरता है। ये रंग बेमानी और राग बेसुरा लगता है जब ये सजना-संवरना अपनी मनमर्ज़ी का ना हो। छोटे-बड़े शहरों की लड़कियों ने जीन्स पहनने और चुन्नी न ओढ़ने के लिए जाने कितनी लड़ाइयां जीती और हारी हैं। ऐसे में जब किसी दफ्तर या क्लब का दखल हमारे ड्रेसिंग टेबल तक पहुंचता है, तो लगता है कि "लुक्स" को लेकर ऊहापोह अभी ख़त्म नहीं हुई है।
दिल्ली जैसे मेट्रो शहर में भी लोगों की सोच उतनी ही है जितनी कि ग्रामीण लोगों की। मेट्रो सिटीज में भी महिलाएं कहां क्या पहनना चाहिए जैसे तंज सुनती रहती हैं। कई बार तो हद हो जाती है जब लोग दफ्तर में थोड़े से फैशन के कपड़े पहनने पर उस महिला को गिरी हुई धंधे वाली तक कह दिया जाता है। दफ्तर में वेल ड्रेसेड होकर जाने पर ही लोगों की आंखे उठ जाती हैं और खुसुर-फुसुर चालू।
एक महिला पत्रकार बताती है कि बारह साल पहले दफ्तर में एक दिन. मैं सरोजिनी नगर से खरीदा "बड़े-गले वाला टॉप" पहन कर दफ्तर पहुंची। कुछ देर बाद एक सीनियर महिला सहकर्मी ने अपने कमरे में बुलाया। हंसी-ठट्ठा करते हुए पूछा, 'आज किसी को काम नहीं करने दोगी क्या?' मैंने भी मज़ाकिया जवाब देकर बात को रफा-दफा करने की कोशिश की। वह सहकर्मी अचानक गंभीर हो गईं। मुझसे 4-5 साल उम्र में बड़ी इस सहकर्मी ने समझाने की कोशिश की मुझे दिल्ली को अभी समझने में समय लगेगा। वे मुझे दफ्तर के नीचे वाले मार्किट में ले जा कर एक चुन्नी खरीदवा लायीं।
बात सिर्फ फॉर्मल सेटिंग्स की नहीं है, कई अनौपचारिक बैठकों में भी बातचीत का रुख कई बार आपकी वेशभूषा तय करती है। जब कोई महिला सलवार-कुर्ते में किसी पार्टी में होती हैं तो लोग उससे पति और बच्चों के बारे में पूछते हैं। वहीं जब वेस्टर्न कपड़ों में होने पर लोग काम और करियर के बारे में पूछते हैं। आखिर ये "आधुनिक" और "परंपरागत" वेश भूषा है क्या? क्या हमारा पहनावा हमारे इंटेलेक्ट की निशानी है?
पहनने-ओढ़ने का मामला समाज और संस्कृति की बुनावट समझने का एक टूल हो सकता है। ये कतई नहीं तय कर सकता कि हम अपने काम या जीवन में कैसे हैं? मेरी बड़ी बिंदी मेरे एक्टिविस्ट होने का सबूत नहीं हो सकती या मेरी मिनी स्कर्ट मेरे आधुनिक विचारधारा की निशानी। किसी लड़के की काली टर्टल नैक टी-शर्ट उसको एक एन्टेर्प्रेनुएर या उसका कुर्ता उसको लेखक के रूप में पहचान नहीं दे सकता। अपनी पहचान के लिए हम सबको मेहनत करनी होगी। पैरहन की रंगत तभी चटख होगी जब अंदर का रंग गहरा होगा।
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