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पढ़िए, आखिर ब्रेड में क्यों पड़ती है केमिकल मिलाने की जरूरत

ब्रेड में पोटेेशियम ब्रोमेट और पोटेेशियम आयोडेट रसायन है, जो कैंसर का कारण बनती है।

पढ़िए, आखिर ब्रेड में क्यों पड़ती है केमिकल मिलाने की जरूरत
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नई दिल्ली. एक अध्ययन से पता चला है कि भारत की राजधानी में बिकने वाले ब्रेड और बेकरी उत्पादों में से 84 फीसद में पोटाशियम ब्रोमेट और पोटाशियम आयोडेट रसायन है जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक ही नहीं, कैंसर का कारण भी बन सकते हैं।
यह अध्ययन पर्यावरण पर काम करने वाली सेंटर फॉर साइंस एंड एन्वायरमेंट (सीएसई) ने किया है। दरअसल ब्रेड में केमिकल होना ही नहीं चाहिए। सुबह ब्रेड लाओ और शाम तक खत्म हो जाए। ताजा ब्रेड खाएं तो केमिकल की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। लेकिन अगर महीनों रखा जाए और हजारों मील दूर से वह आए, तो केमिकल की जरूरत पड़ेगी।
जब से विश्व व्यापार संगठन (डब्लूटीओ) और ग्लोबलाइजेशन आया है तब से भारत में फूड सेफ्टी स्टैंडर्ड ऑथॉरिटी (एफएसएसए) काम करने लगी है। यह मानक तीन वजहों से भारत के लिए बहुत गलत हैं। पहला यह कि यह हमारे फूड सिस्टम और फूड कल्चर के खिलाफ है। मैं अगर लोकल बेकरी में बढ़िया से बढ़िया ब्रेड बनाऊं, लेकिन मेरे पास लैब न हो और मेरी बेकरी छोटी हो तो क्या होगा? ये लोग यह कहकर मेरी छोटी बेकरी को बंद करा देंगे कि मेरे पास लेबोरेटरी नहीं है।
देश में जब तक डब्लूटीओ का प्रभाव नहीं था, तब तक फूड प्रोसेसिंग लघु उद्योगों तक सीमित थी। यानी उस पर स्थानीय समुदाय और समाज का नियमन था। सरकार प्रिवेंशन ऑफ फूड एडलटरेशन एक्ट की मदद से भी खाने-पीने की चीजों में मिलावट रोक सकती है। लेकिन अब इन्होंने मिलावट को ही मानक बना दिया है।
खाने-पीने की चीजों के औद्योगिकरण की वजह से इनमें खुले तौर पर केमिकल्स की मिलावट हो रही है। नियमों में विविधता लाने की बहुत जरूरत है। कुछ चीजें जो स्थानीय स्तर पर सुरक्षित और स्वास्थ्यवर्धक हैं, उसका एक केंद्रीय ऑथिरीटी के जरिए नियमन करना गलत है। सरकारी नियमन लाकर लाइसेंस राज, जो भ्रष्टाचार की जड़ है, उसे वापस लाया जा रहा है।
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