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तंबाकू से हर साल होती है 60 लाख लोगों की मौत

युवा आबादी के तंबाकू की चपेट में आने का खतरा तेजी से बड़ी चुनौती बनकर उभर रहा है।

तंबाकू से हर साल होती है 60 लाख लोगों की मौत

वैश्विक स्वास्थ्य समस्याओं में इन दिनों से सबसे ज्यादा चर्चा तंबाकू के सेवन से होने वाली बामीरियों को लेकर हो रही है। क्योंकि इससे हर साल दुनिया में कुल 6 मिलियन लोग काल के गाल में समा रहे हैं।

इसमें युवा आबादी के तंबाकू की चपेट में आने का खतरा तेजी से बड़ी चुनौती बनकर उभर रहा है। भारत के लिए मुश्किलें ज्यादा हैं। क्योंकि यहां की आधी यानि 50 फीसदी आबादी की उम्र 25 वर्ष से कम है।

इसी खतरे को भांपते हुए देश में बच्चों के अधिकारों के लिए काम करने वाली शीर्ष संस्था राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) ने इस मामले पर देशभर में जागरूकता लाने का निर्णय लिया है।

इसके लिए कर्नाटक राज्य बाल अधिकार आयोग द्वारा हाल ही में जारी की गई रिपोर्ट ऑन टोबैगो यूज एंड ईट्स इम्पैक्ट ऑन चिंल्ड्रन नामक पुस्तक का बड़े पैमाने पर प्रयोग किया जाएगा।

राज्यों को भेजी जाएगी पुस्तक

एनसीपीसीआर की अध्यक्ष स्तुति कक्कड़ ने हरिभूमि से बातचीत में कहा कि इसमें कोई शक नहीं है कि बच्चों में तंबाकू सेवन एक बड़ी समस्या बनता जा रहा है। हमारा देश युवाओं का देश है।

इसलिए हमें इस पर गंभीरता से सोचने की जरूरत है। कर्नाटक राज्य बाल अधिकार आयोग ने इस मामले पर एक अच्छी पुस्तक तैयार की है। मैं जल्द ही इसके बारे में राज्यों के मुख्य सचिवों को पत्र लिखकर सूचित करूंगी और एनसीपीसीआर इसकी एक-एक प्रति देश के सभी राज्यों-केंद्रशासित प्रदेशों में मौजूद बाल आयोगों को भेजेगा।

इससे राज्य आयोगों को इस गंभीर चुनौती के बारे में न केवल जानकारी बढ़ाने में मदद मिलेगी। बल्कि इस विषय पर सामाजिक जागरूकता लाने में आसानी होगी। बच्चों द्वारा तंबाकू सेवन से जुड़े हुए मामलों को हल करने में भी यह पुस्तक राज्यों के लिए लाभप्रद रहेगी। जेजे एक्ट के क्रियान्वयन की निगरानी का अधिकार एनसीपीसीआर के पास है। इसलिए वो इस विषय को गंभीरता से उठा रहा है।

पुस्तक की खास बातें

पुस्तक में कुल आठ चैप्टर हैं। इसमें तंबाकू सेवन के ट्रेंडस, स्वास्थ्य को नुकसान, तंबाकू गेटवे है ड्रग्स का, फिल्मों में तंबाकू सेवन का बच्चों पर पड़ने वाला प्रभाव, स्वास्थ्य नीतियों पर तंबाकू उद्योग जगत का प्रभाव, नियंत्रण के उपाय, समरी, एक मैनवल तैयार करके बच्चों को इसके बारे में जागरूक किया जाना मुख्य है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन दक्षिण पूर्व एशिया क्षेत्र का कहना है कि तंबाकू सेवन से हर साल एक मिलियन मौतों की जानकारी दर्ज की जाती है। 500 मिलियन प्रयोग करने वालों में आधे चबाने वाले तंबाकू का प्रयोग करते हैं, बाकी बीड़ी, सिगरेट (धुएं वाले) का प्रयोग करते हैं।

13 से 15 साल की उम्र में दुनिया में हर पांच में से एक बच्चा नियमित तंबाकू सेवन करता है। इसमें 80 हजार से 1 लाख बच्चों की यह नियमित आदत में शामिल है।

किशोरों के इसके सेवन व प्रभावित होने के पीछे फिल्मों की अहम भूमिका है, जिसमें बच्चों के नायक-नायिकाएं जब पर्दे पर सिगरेट या अन्य तंबाकू उत्पादों का इस्तेमाल करते हुए नजर आते हैं। तभी से तंबाकू किशोरों के जीवन में भी कूल, अट्रेक्टिव और ग्रोन अप जैसे शब्दों के साथ जुड़ता चला जाता है।

जेजे एक्ट के प्रावधान

बाल अधिकारों की सुरक्षा के लिए बनाए गए किशोर न्याय अधिनियम (बालकों की देखरेख व संरक्षण) 2015 की धारा 77 में किसी बच्चे को लोक स्थान में तंबाकू सहित मादक पदार्थ देने या दिलवाने वाले व्यक्ति को सात साल की सजा और एक लाख रुपए का जुर्माना होगा।

धारा 78 में बच्चों को इन पदार्थों को बेचने के लिए अपने साथ रखने, फुटकर क्रय-विक्रय, उसकी आपूर्ति करने या तस्करी करने के लिए उपयोग करने पर सात साल कारावास व एक लाख रुपए जुर्माना किया जाएगा, दंडनीय होगा।

तंबाकू ड्रग सेवन का गेटवे

कर्नाटक राज्य बाल अधिकार आयोग की अध्यक्ष डॉ.कृपा अमर अल्वा ने कहा कि बैंग्लुरु ड्रग्स के लिए हब बनता जा रहा है। राज्य में युवाओं व बच्चों की बड़ी आबादी है। इसलिए हमें चिंता है कि वो सिगरेट, बीड़ी से शुरू करके ड्रग्स तक प्रयोग करने की दिशा में भटक सकते हैं।

जल्द ही हम राज्य के सभी स्कूलों को कहेंगे कि वो इस पर ध्यान दें और कोशिश करेंगे कि हमारी पुस्तक की कॉपी भी उन्हें ज्ञानवर्धन के लिए भेजें। बेंगलुरु में हाल में इस बाबत 18 साल से कम उम्र के एक बच्चे को लेकर तंबाकू सेवन का मामला दर्ज किया गया है।

यह हमारे लिए खुशी की बात है कि कर्नाटक आयोग की पुस्तक को सभी राज्यों को राष्ट्रीय आयोग भेज रहा है। हमने उन्हें इसके लिए पुस्तक की कुल 55 कॉपियां भेज दी हैं।

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