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दीपोत्सव फैले खुशियों का उजियारा

प्रकाश पर्व दीपावली से सिर्फ धार्मिक-सांस्कृतिक कारक ही नहीं जुड़े हैं, सामाजिक सरोकार भी जुड़े हैं, जो हमारे जीवन में खुशियों का उजियारा फैलाते हैं। यह पर्व हमें सीख देता है कि संकट का अंधेरा चाहे कितना गहरा हो, अपनों के संबल से एक न एक दिन छंटता ही है। कोरोना संकट काल पर भी यही बात लागू होती है। आइए, इस दीपोत्सव हम अपने भीतर के प्रकाश को आलोकित करें, सकारात्मक हों और एक दूसरे का संबल बन कोरोना संकट का मुकाबला करें।

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दीपावली का पर्व रोशनी के साथ जीवन में खुशहाली की सौगात लेकर आता है। यह पर्व एक परंपरा है, सबके साथ खुशियां साझा करने की। झिलमिल दीपों से सजे चौखट-चौबारे देखकर हमारे मन में सकारात्मक ऊर्जा के भाव स्वत: जागते हैं। इस तरह दीपोत्सव हमारे जीवन को ही नहीं, हमारे अंतस के हर कोने को प्रकाश से जगमगा देता है। आज जब हमारा देश कोरोना की विपदा घिरा है, तो दीपोत्सव का महत्व और ज्यादा बढ़ जाता है, क्योंकि ये हमें सकारात्मक रहने का संदेश देता है। हमें इस संदेश को अपने जीवन में गहरे से आत्मसात करना चाहिए। सिर्फ अपनी ही नहीं, दूसरे के भीतर भी बैठे दुख-निराशा को दूर करना चाहिए।

सबका मन-जीवन हो रोशन

कोरोना संकट ने हमें जीवन की अनिश्चितता और उलझनों से रूबरू करवाया है। कई लोग निराशा के अंधकार से घिर उठे हैं, लेकिन नकारात्मक सोच रखने से हमारा ही अहित होगा। ऐसे प्रतिकूल समय में हमें सहजता पूर्वक खुद को अपने परिवेश से जोड़ना चाहिए, तभी हमारी सोच में सकारात्मकता आएगी। दीपावली का त्योहार भी यही समझाता है कि अंधकार में प्रकाश छुपा है, बस जरूरत है एक प्रयास की, जो उस प्रकाश को अंतस से बाहर लाए। इस पर्व में सबकी सुख-समृद्धि और खुशियों की कामना की जाती है। हर घर-आंगन के लिए ऐसे खुशनुमा माहौल की चाह रखी जाती है, जिसमें दरिद्रता, दुख और अंधकार नहीं, सुख-समृद्धि का प्रकाश हो। किसी भी आंगन में अंधियारा ना रहे। साथ ही सकारात्मक सोच और व्यवहार हमारे जीवन का हिस्सा बन जाए, मन को नकारात्मक भावों से मुक्ति मिले। वाकई दीपावली के पर्व की सार्थकता यही है कि सबका जीवन खुशियों से रोशन हो।

आलोकित हों मानवीय भाव

दीप पर्व पर रात्रि के समय चारों तरफ फैला प्रकाश यही संदेश देता है कि हम संकटकाल में भी रोशनी की रिवायत को आगे ले जाएं, इसे विस्तार दें। वैश्विक महामारी कोरोना से जूझने के इस दौर में ऐसी इंसानी समझ बहुत जरूरी है। इससे ही विपदा के समय परिवार और समाज आपस में जुड़ा रह सकता है। दीपावली के जरिए घर-परिवार और समाज के लोगों को हर्षोल्लास के साथ सामाजिक सरोकारों और जिम्मेदारी निभाने की भी सीख मिलती है। इस पर्व से जुड़ी कितनी ही परंपराएं हैं, जो हमारे अपने ही नहीं, दूसरों के जीवन में भी रोशनी भरने की सीख देती है। साथ ही जगमग करते दीपों के साथ हमारी मानवीय सोच भी उजास पाती है। ऐसी ही उजास भरी संवेदनाओं की दरकार कोरोना संकट का सामना करने के लिए जरूरी है।

संकट में साथ और संबल की सोच

दीपावली पर घर के आंगन और मुंडेर पर जैसे दीपों की पंक्तियां मिलकर अंधेरे का अंत करती हैं, वैसे ही एकजुट होकर किसी भी समस्या का सामना हम मिलकर कर सकते हैं। इसी तरह हम सब कोरोना के संकट का भी मुकाबला कर सकते हैं। इस संकट के समय जागरूक रहकर अपने स्वास्थ्य का विशेष ध्यान रखने की जरूरत है। हर नागरिक को अपनी जिम्मेदारी निभानी है। हमें दीपावली के प्रज्ज्वलित दीए के समान ही समाज, परिवार और अपने देश के लिए ज्योतिपुंज बनना है। स्वयं को प्रकाशमय और चेतना संपन्न बनाना है। साथ ही अपनों को भी उजास की सकारात्मकता से जोड़े रखने का प्रयास करना है। उनका संबल बनना है। इस तरह की सोच और विचार के साथ ही हम कोरोना संकट काल में खुशियों भरी दीपावली मना सकते हैं।

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लक्ष्मी पूजन का निहितार्थ

दिवाली के त्योहार पर गणेश जी के साथ मां लक्ष्मी के पूजन का विधान है। पूजा-अर्चना की यह रीति स्त्री को सम्मान देने की परंपरा है। एक स्त्री ही अपने परिवार को सहेजने-संभालने का मुश्किल काम करती है। कोरोना संकट काल में तो महिलाओं पर घर-परिवार संभालने के साथ अपनों की सेहत पर ध्यान देने की दोगुनी जिम्मेदारी है। ऐसे में दीपोत्सव पर ही नहीं, हर दिन घर-परिवार की महिलाएं सम्मान और समान व्यवहार की अधिकारी हैं। मां, बहन, बेटी और पत्नी के रूप में स्त्रियां हर परिवार के आंगन को आलोकित करती हैं। ऐसे में जरूरी है कि उनके मन में भी अपनों से मिले अपनेपन की दमक सदैव बनी रहे।

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