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तनाव और अकेलेपन को भूलकर भी न करें नजरअंदाज, हो सकती है ये खतरनाक बीमारी

हम महिलाओं के विकास के कितने ही दावे करें लेकिन आज भी हमारा समाज महिलाओं को लेकर परंपरागत सोच से बंधा है। महिलाएं दोयम दर्जे की जिंदगी जीने को मजबूर हैं। कामकाजी हों या घरेलू महिलाएं, तमाम तरह की जिम्मेदारियों के बोझ तले तनावभरी जिंदगी जी रही हैं।मानसिक रूप से अस्वस्थ होकर डिप्रेशन का भी शिकार हो रही हैं। कहीं-कहीं तो इसका अंत आत्महत्या भी सुनाई देता है। ऐसे में यह बहुत जरूरी है, महिलाएं समय रहते तनाव मुक्त हों और अपना सहज जीवन जिएं।

तनाव और अकेलेपन को भूलकर भी न करें नजरअंदाज, हो सकती है ये खतरनाक बीमारी

द लांसेट, पब्लिक हेल्थ पत्रिका में छपे एक ताजा शोध के मुताबिक पूरी दुनिया में आत्महत्या करने वाली महिलाओं में भारतीय महिलाओं का आंकड़ा 37 फीसदी है। रिपोर्ट के मुताबिक जिंदगी से हारने वालों में ज्यादातर शादी-शुदा महिलाएं होती हैं।

'द लांसेट पब्लिक हेल्थ' की जेंडर डिफरेंशियल एंड स्टेट वैरिएशन इन सुसाइड डेथ्स इन इंडिया - द ग्लोबल बर्डेन ऑफ डिजीज स्टडी 1990-2016 की रिपोर्ट में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि सुसाइड करने वाली महिलाओं में 71.2 फीसदी की उम्र 15 से 39 वर्ष के बीच है। यह वाकई चिंतनीय हैं, जो महिलाएं घर की धुरी होती हैं।

परिवार के सदस्यों का संबल होती हैं, घर की आधारशिला होती हैं, वे ही भावनात्मक स्तर पर यूं बिखर रही हैं, जीवन की उलझनों के आगे हार रही हैं। महिलाओं का यूं जीवन से हारना हमारे सामाजिक-पारिवारिक परिवेश में मौजूद कई परेशानियों की ओर इशारा करता है। उन हालातों की असलियत सामने रखता है, जिनमें सुरक्षा, समानता और सहज जिंदगी जीने की राह पर कई तकलीफें आधी आबादी के हिस्से हैं।

1.भावनात्मक उलझनें

हमारे सोशल सिस्टम में महिलाओं को अनगिनत इमोशनल उलझनों से जूझना पड़ता है। लोगों का असहज कर देने वाला व्यवहार उन्हें घर हो या ऑफिस, हर जगह झेलना पड़ता है। सच यह भी है कि पूरे घर-परिवार को संभाल रहीं महिलाएं अकसर भावनात्मक स्तर पर खुद को अकेला पाती हैं।

कभी ससुराल-मायके के रिश्ते-नातों से जुड़ी उलझनें, तो कभी घरेलू जिम्मेदारियों के निर्वहन में कमी रह जाने की फिक्र। इस तरह कुछ न कुछ उनके दिलो-दिमाग को हमेशा घेरे ही रहता है। इनमें से सहज-सी लगने वाली कई तकलीफें तो ऐसी होती हैं, जिन्हें वे अपनों से भी साझा नहीं कर पातीं।

वे मन ही मन घुटती रहती हैं, यही घुटन उन्हें भावनात्मक रूप से कमजोर करती है। जीवन को एक थकान और तनाव से घेर देती है। इतना ही नहीं पुरुषों की तुलना में महिलाओं के साथ कई तरह की शारीरिक परेशानियां भी जुड़ी होती हैं।

आज की लाइफस्टाइल में मातृत्व के सुखद अहसास के साथ पोस्टपार्टम डिप्रेशन जैसे हेल्थ इश्यूज भी जुड़ रहे हैं। भावनात्मक उलझनें जीवन में ऐसा माहौल बना देती हैं कि निराशा के भंवर में फंसकर कई बार महिलाएं कोई खतरनाक कदम उठा लेती हैं।

2.समानता आज भी नहीं

यह एक बड़ा सच है कि हमारे सामाजिक ढांचे में आज भी महिलाओं को दोयम दर्जे का समझा जाता है। समानता का जो हक उन्हें मिलना चाहिए था, वो आज भी उनके हिस्से नहीं आया है। इस पक्षपाती सोच का ही नतीजा है कि कई तरह के सामाजिक, पारिवारिक और सांस्कृतिक बंधन भी उनके लिए तकलीफदेह बने हुए हैं।

कितनी ही सामाजिक रूढ़ियां आज भी आधी आबादी के लिए दंश बनी हुई हैं। नतीजतन उनका मन हरदम एक उधेड़बुन से जूझता रहता है। महिलाएं घर और बाहर दोनों मोर्चों पर खुद को साबित करने में जुटी रहती हैं।

कामकाजी महिलाएं पारिवारिक दायित्वों के साथ ही ऑफिस की जिम्मेदारियों के स्ट्रेस से भी जूझती रहती हैं। इतना ही नहीं समाज में एक बदलाव के बाद भी महिलाएं असमानता से उपजी परेशानियों की शिकार हैं।

कई बार यही परेशानियां उन्हें भीतर से तोड़ देती हैं। आए-दिन सामने आने वाली तरह-तरह की उलझनों से कई बार मन की शक्ति क्षीण हो जाती है, ऐसे में जिंदगी से मुंह मोड़ने का रास्ता उन्हें आसान लगता है।

3.दोहरी जिम्मेदारी का भार

काम-काजी हों या गृहिणियां, वे बेशक हर घर की रीढ़ हैं। पढ़ी-लिखी और कामकाजी हैं तो देश की तरक्की में भी भागीदार हैं। महिलाएं अनगिनत ऐसे काम संभाल रही हैं, जिनका मोल नहीं आंका जा सकता। वे अपने ही स्वास्थ्य की संभाल में सबसे पीछे और दायित्वों के निर्वहन में सबसे आगे हैं।

इस भागमभाग के चलते उनकी सेहत बिगड़ जाती है। एक सर्वे के अनुसार, भारत में 78 फीसदी काम-काजी महिलाएं स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से परेशान हैं। जबकि गृहिणियां अपनी शैक्षणिक क्षमता को भुला, सब कुछ संभाल तो रही हैं लेकिन अपनों की उपेक्षा के चलते अपना आत्मविश्वास खोकर हीनताबोध का शिकार हो रही हैं।

प्रोफेशनल और पर्सनल, दोनों ही फ्रंट्स पर महिलाओं के कंधों पर कई तरह की जिम्मेदारियां हैं, जो हरदम उन्हें उलझाए रखती हैं। कई बार दोहरी जिम्मेदारी की परेशानियों से जुड़ी भावनात्मक टूटन जिंदगी से हाथ छोड़ने का कारण भी बन जाती है।

4.अकेलापन और अवसाद

रिश्ते-नातेदारों की अपेक्षाएं हों या पैरेंटिंग की जिम्मेदारियां या फिर बुजुर्गों को देख-भाल, बच्चों की चाहतों को समझना, अपने-परायों से जुड़ा ऐसा बहुत कुछ है, जो महिलाओं को हर वक़्त चिंता से घेरे रहता है।

एकसाथ इतनी जिम्मेदारी का निर्वहन आसान नहीं होता, कहीं न कहीं चूक हो ही जाती हैं, इससे उपजा अपराधबोध महिलाओं को सालता है, जो बढ़कर अवसाद का कारण भी बनता है। इतना ही नहीं, अपनी ही देहरी के भीतर होने वाला दुर्व्यवहार भी उन्हें मानसिक रूप से कमजोर करता है।

यहां तक कि महिलाओं के आर्थिक आत्मनिर्भर बनने से भी हमारे परिवारों में उनके प्रति सोच में बदलाव नहीं आया है। आंकड़े बताते हैं कि घरेलू हिंसा जैसे दंश का शिकार गृहिणियां ही नहीं, वर्किंग वूमेन भी बनती हैं।

हमारे यहां आज भी हर तीन में से एक शादी-शुदा महिला पति या उसके परिवारजनों की हिंसा की शिकार है। ये सारी स्थितियां हमारे सामाजिक ढांचे के लिए बहुत ही चिंता का विषय हैं, इनके निदान के रास्ते तब तक नहीं खुलेंगे, जब तक हम अपनी परंपरागत सोच से उबरेंगे नहीं।

5.ऐसे रहें मानसिक रूप से स्वस्थ

महिलाएं मानसिक रूप से स्वस्थ रहें, किसी प्रकार के तनाव में न रहकर सुकून से जिएं, खुशहाल रहें, इसके लिए वे स्वयं और परिवार के सदस्य कुछ बातों का विशेष रूप से ध्यान रखें, जैसे- आगे आएं अपने

1. उनकी भागीदारी के मायने समझें।

2.अपराधबोध उपजाने वाली तानेबाजी न करें।

3.उनके मन की भी बात सुनें।

4.उनकी योग्यता को सराहें।

5.सपने पूरे करने में मददगार बनें।

6.जिम्मेदारियां साझा करें।

7.महिलाएं भी सचेत रहें

8.भावनात्मक टूटन के दौर में विशेषज्ञ से सलाह लें।

9.एक्सरसाइज और मेडिटेशन करें।

10.अपनों और दोस्तों से संवाद करें।

11.अपनी लाइफस्टाइल को रिव्यू करें।

12.जिंदगी और अपनी जिम्मेदारियों को सहजता से लें।

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