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यही है वो कहानी, जो संकष्टी चतुर्थी पर सुहागिनें व्रत के दौरान पढ़ती हैं

संकष्टी चतुर्थी का शास्त्रों में बहुत अधिक महत्व हैं। यह दिन मनोकामना के लिए बेहद खास माना जाता है। इस दिन सुहागिनें अपने बेटे की मंगल कामना के लिए व्रत रखती हैं।

यही है वो कहानी, जो संकष्टी चतुर्थी पर सुहागिनें व्रत के दौरान पढ़ती हैं
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Sankashti Chaturthi Vrat Katha

संकष्टी चतुर्थी का शास्त्रों में बहुत अधिक महत्व हैं। यह दिन मनोकामना के लिए बेहद खास माना जाता है। इस दिन सुहागिनें अपने बेटे की मंगल कामना के लिए व्रत रखती हैं।

संकष्टी व्रत के दौरान सुहागिनें कथा-कहानी भी करती हैं। पुराणों में हर व्रत या त्योहार से जुड़ी कहानियां होती हैं। संकष्टी चतुर्थी को सकट चौथ भी कहते हैं।

संकष्टी चतुर्थी पर विशेषतौर पर भगवान गणेश की पूजा की जाती है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन भगवान गणेश की पूजा करने से सभी संकट दूर हो जाते हैं। इस व्रत में महिलाएं ज्यादातर यही कहानी सुनती और सुनाती हैं।

संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा/कहानी

  • पुराणों में विदित कथा के अनुसार एक बार भगवान शिव और माता पार्वती नदी किनारे बैठे हुए थे
  • तभी माता पार्वती का चौपड़ (एक तरह का खेल) खेलने का मन हुआ, लेकिन उस समय वहां शिव-पार्वती के अलावा तीसरा कोई मौजूद नहीं था, जो खेल में हार-जीत का फैसला कर सके।
  • इसमें एक और व्यक्ति की जरुरत थी।
  • इससे समस्या से निपटने के लिए शिव-पार्वती ने एक मिट्टी की मूर्ति बनाई और उसमें जान डाल दी।
  • साथ ही कहा कि खेल में हार-जीत का फैसला करे।
  • खेल के शुरू होते ही माता पार्वती विजय हुई। 3-4 बार उन्हीं की जीत हुई।
  • एक बार गलती से उस मूर्ति के बालक ने विजयी के रूप में भगवान शिव का नाम ले लिया।
  • इससे नाराज होकर माता पार्वती ने बालक को लंगड़ा होने का श्राप दे दिया।
  • बालक ने क्षमा मांगी पर माता पार्वती ने कहा कि श्राप वापस नहीं ले सकतीं।
  • श्राप से मुक्ति पाने का उपाय उन्होंने बालक को बताया।
  • उन्होंने कहा कि इस स्थान पर संकष्टी के दिन कुछ कन्याएं पूजन के लिए आती हैं, तुम उनसे व्रत की विधि पूछना और श्रद्धापूर्वक उस व्रत को करना।

संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा/कहानी

  • संकष्टी के दिन जब वहां कन्याएं आईं तो बालक ने उनसे व्रत विधि पूछा और उसके बाद विधिवत व्रत किया।
  • ऐसा करने से भगवान गणेश प्रसन्न हुए और दर्शन देकर बालक से इच्छा पूछी
  • बालक ने कहा कि भगवान शिव और माता पार्वती के पास जाना चाहता है
  • भगवान गणेश ने इच्छा पूरी की
  • वह भगवान शिव के पास जाता है तो वहां माता पार्वती नहीं होती, वह भगवान से रूठकर कैलाश से चली जाती हैं
  • उसके बाद भगवान शिव भी माता पार्वती को मनाने के लिए ये व्रत रखते हैं
  • व्रत के बाद माता पार्वती कैलाश लौट आती हैं
  • इस कथा के मुताबकि जो भी भगवान गणेश की सच्चे मन से इस दिन व्रत करके पूजन करता है उसकी मनोकामना पूर्ण होती है और सभी संकट दूर हो जाते हैं।

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