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सिजेरियन से पैदा हुए बच्‍चे को अस्‍थमा का खतरा ज्‍यादा, ऐसे करें बचाव

पेनलेस डिलिवरी की चाह में आजकल सिजेरियन के मामले बढ़ रहे हैं। सिजेरियन के केस में कई बार शिशु के फेफड़े सही से विकसित नहीं हो पाते। ऐसे में उन्हें विकसित करने के लिए स्टेरॉयड दिया जाता है। इन शिशुओं के फेफड़े डेवेलप तो हो जाते हैं लेकिन सामान्य बच्चों की अपेक्षा कमजोर रहते हैं।

सिजेरियन से पैदा हुए बच्‍चे को अस्‍थमा का खतरा ज्‍यादा, ऐसे करें बचाव

पेनलेस डिलिवरी की चाह में आजकल सिजेरियन के मामले बढ़ रहे हैं। सिजेरियन के केस में कई बार शिशु के फेफड़े सही से विकसित नहीं हो पाते। ऐसे में उन्हें विकसित करने के लिए स्टेरॉयड दिया जाता है।

इन शिशुओं के फेफड़े डेवेलप तो हो जाते हैं लेकिन सामान्य बच्चों की अपेक्षा कमजोर रहते हैं। इन बच्चों को अस्थमा होने की आशंका ज्यादा रहती है। सिर्फ पेनलेस डिलिवरी के लिए सिजेरियन करवाना ठीक नहीं।

इन्हेलर से सीधे फेफड़े तक पहुंचती है दवा

चेस्ट स्पेशलिस्ट डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने बताया कि इन्हेलर अस्थमा का सबसे बेहतर इलाज है। इसके प्रयोग से दवा सीधे फेफड़े तक पहुंचती है। इससे दवा का प्रभाव शरीर के अन्य हिस्सों में नहीं पड़ता है।

इन्हेलर प्रयोग के बाद मरीज पानी से कुल्ला जरूर करें ताकि मुंह में रह गई दवा नुकसान न पहुंचा सके। दुनिया में केवल 20 प्रतिशत मरीज ही इन्हेलर का सही तरीके से इस्तेमाल करते हैं।

फेफड़ों की करवाएं नियमित जांच

धूम्रपान करने, कसरत न करने, जंक फूड और प्रदूषण से फेफड़े कमजोर हो जाते हैं। कमजोर फेफड़ों के कारण सांस लेना बहुत मुश्किल हो जाता है। इसलिए लोगों को अपने फेफड़ों की नियमित जांच करवानी चाहिए। ताकि लोगों को पता चल जाए कि उनका फेफड़ा कितना स्वस्थ है।

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ऐसे कर सकते हैं बचाव

  • प्रदूषण से बचें
  • ऐंटीबायोटिक दवा का उपयोग कम करें
  • जंक फूड का प्रयोग कम करें
  • प्रेग्नेंसी के दौरान तंबाकू का सेवन न करें

लगातार बढ़ रही मरीजों की संख्या

केजीएमयू के पल्मोनरी ऐंड क्रिटिकल केयर मेडिसिन विभाग के कार्यवाहक विभागाध्यक्ष डॉ. वेद प्रकाश ने अस्थमा के बारे में काफी जानकारियां दीं। डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने बताया कि देश में अस्थमा से पीड़ित मरीजों की संख्या बढ़ती जा रही है। बढ़ता प्रदूषण इसका मुख्य कारण है।

करोड़ों लोग दमा से प्रभावित

डब्लयूएचओ के अनुसार, दुनिया में 33.4 करोड़ लोग दमा से प्रभावित हैं। इसमें दवा जीवनभर चलती है। इस बीमारी का बेहतर इलाज इन्हेलर है, लेकिन लोगों में यह भ्रांतियां हैं कि इसका प्रयोग अस्थमा के अंतिम पड़ाव पर किया जाता है, जो गलत है।

योग से भी इस बीमारी को नियंत्रित किया जा सकता है। धूल-मिट्टी में खेलने वाले बच्चों की अपेक्षा धूल मिट्टी में नहीं खेलने वाले बच्चे अस्थमा की चपेट में जल्दी आ जाते हैं।

अस्थमा के केस बढ़ने का कारण

डॉ. वेद प्रकाश ने बताया कि ऐंटीबायॉटिक दवाओं के कारण अस्थमा के केस बढ़ रहे हैं। दरअसल, बच्चों में इस दवा से रोग प्रतिरोधक क्षमताएं कम हो जाती हैं।

इसलिए एक वर्ष से कम आयु के बच्चों को ये दवाएं नहीं दी जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि गर्भवती सिजेरियन के बजाए नॉर्मल डिलिवरी को प्राथमिकता दें, ताकि बच्चा स्वस्थ रहे। साथ ही बच्चों को ब्रेस्ट फीडिंग जरूर करवाएं।

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