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इस तरह के आर्थराइटिस से टेढ़े हो सकते हैं हाथ-पैर

आर्थराइटिस का एक प्रकार ऐसा है, जिसकी वजह से शरीर के अन्य बोन ज्वाइंट्स के साथ ही स्पाइनल कॉर्ड पर भी बुरा असर पड़ने लगता है। ऐसे में बगैर देर किए लक्षणों के आधार पर तुरंत ट्रीटमेंट शुरू कर देना चाहिए।

इस तरह के आर्थराइटिस से टेढ़े हो सकते हैं हाथ-पैर
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रहेयूमेटॉइड आर्थराइटिस की वजह से शरीर के अन्य बोन ज्वाइंट्स के साथ ही स्पाइनल कॉर्ड पर भी बुरा असर पड़ने लगता है। ऐसे में बगैर देर किए लक्षणों के आधार पर तुरंत ट्रीटमेंट शुरू कर देना चाहिए। इससे बोंस को ज्यादा नुकसान से बचाया जा सकता है। इस बारे में पूरी जानकारी स्पाइन सॉल्यूशन, दिल्ली के डायरेक्टर स्पाइन सर्जन डॉ. सुदीप जैन दे रहे हैं।

रहेयूमेटॉइड आर्थराइटिस एक ऐसी बीमारी है, जिसमें हमारे शरीर का इम्यून सिस्टम, हमारे शरीर को ही नुकसान पहुंचाने लगता है। इस बीमारी में शरीर का रोग प्रतिरोधक तंत्र हमारे शरीर के खिलाफ उसमें बनने वाले प्रोटीन, हड्डियों में स्थित कणों, जोड़ों, इंटरवर्टेब्रल डिस्क और रीढ़ की मांसपेशियों को खत्म करने लग जाता है। इसकी वजह से हमारे बोन ज्वॉइंट्स खराब होने लगते हंै, जिससे रीढ़ की हड्डी यानी स्पाइनल कॉर्ड में विकार पैदा हो जाता है, जिसे हम स्पॉन्डिलाइटिस कहते है।

रोग के दुष्प्रभाव

इस रोग के कुछ प्रमुख लक्षण, जिनसे इसका पता चलता है, उनमें शामिल हैं-जोड़ों का अकड़ जाना, उनमें सूजन आना, हमेशा थकावट महसूस करना, तेज बुखार होना। यह रोग युवा और मध्य आयु में प्रारंभ हो जाता है, जिससे जल्दी ही रीढ़ की हड्डी में विकार और सूजन आने लगती है।

स्पाइनल रहेयूमेटॉइड आर्थराइटिस के कारण होने वाले अधिकतम बदलावों को पलटा नहीं जा सकता। इसकी वजह से रीढ़ की हड्डी हमेशा के लिए काम करना बंद कर देती है। ज्यादातर ऐसा माना जाता है कि ये बीमारी लाइलाज है और इसके साथ पूरी जिंदगी रहना पड़ेगा। यह रोग कम उम्र खासकर किशोरावस्था में शुरू हो सकती है। रोग की गंभीरता को देखा जाए, तो यह रोग ना सिर्फ रोगी के शरीर पर लेकिन उसके मस्तिष्क और सामाजिक स्थितियों पर भी भारी पड़ता है। आमतौर पर इसका पुराना इलाज ना ही सिर्फ महंगा है, बल्कि इससे मरीज पूरी तरह ठीक भी नहीं हो पाता। यह इलाज बस कुछ समय के लिए अस्थायी रूप से रोग के लक्षणों में आराम दिलाता है।

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रोग के प्रकार

स्पाइनल रहेयूमेटॉइड आर्थराइटिस कई प्रकार का होता है। इनमें से कुछ ऐसे हैं, जो महिलाओं में अधिक पाए जाते हैं तो कुछ ऐसे हैं, जो पुरुषों में अधिक पाए जाते हंै। रिट्रस सिंड्रोम एक ऐसी बीमारी है, जो रहेयूमेटॉइड आर्थराइटिस में सबसे ज्यादा पाई जाती है। पुरुषों में यह बीमारी ज्यादा पाई जाती है।

ट्रीटमेंट

रहेयूमेटॉइड आर्थराइटिस के पुराने इलाज के अंतर्गत शुरुआती तौर पर तेज एंटीइंफ्लेमेटरी दवाएं दी जाती हैं। दवा का असर बढ़ाने के लिए कुछ एंजइम्स (कैप्सूल या ओरल फॉर्म टेबलेट के रूप में ) भी दिए जाते हैं। इसके अलावा डॉक्टर ‘प्लस थेरेपी’ भी कुछ समय के लिए देते हैं। इसमें स्टेरॉइड्स दिए जाते हैं। यह उपचार स्थायी रूप से बीमारी को ठीक नहीं करते, बस रोगी के लक्षणों में राहत प्रदान करते हैं।

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न्यू मेथड

अगर कीमोथेरेपी से संबंधित दवाएं शुरुआती उपचार के दौरान दी जाएं तो इस बीमारी को बढ़ने से रोका जा सकता है। ये खासकर जीन थेरेपी एंकाइलोसिंग स्पोंडिलाइटिस से पीड़ित लोगों के लिए काफी फायदेमंद है। यह थेरेपी बीमारी को बढ़ने से भी बचाती है। इसी तरह स्पोंडिलाइटिस में इम्युनोमॉडुलेशन की तकनीक भी बहुत असरदार है। इस तकनीक में इम्युनोथेरेपी विशेष रूप से एंटी नुक्लीअर एंटीबाडीज, ऑटोएंटीबॉडीज को खत्म करती हंै, जो हमारे जोड़ों को नुकसान पहुंचाते हैं। यह तकनीक हानिकारक एंटीबॉडीज के बुरे प्रभाव से बचाती हैं और हमारे शरीर के रोग प्रतिरोधक तंत्र को सही करती हैं। आजकल कुछ ऐसी दवाएं भी मौजूद हैं, जो खराब हो चुके कार्टिलेज और इंटरवर्टेब्रल डिस्क के पुन: सुधार में मददगार हैं। एक अन्य मैथड ऑटोलॉगस बोनमैरो सेल ट्रांसप्लांट भी है। अगर बाकी सब विकल्प लाभदायक नहीं हैं तो सर्जरी का विकल्प भी होता है। इस रोग का उपचार इंडोस्कोपिक सर्जरी से भी संभव है।

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