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महिला और पुरुष एक-दूसरे को इस वजह से समझते हैं ना समझ

प्रकृति ने महिला और पुरुष को केवल शारीरिक तौर पर ही नहीं मानसिक रूप से भी अलग बनाया है। ऐसे में उनमें हर बात में मतभेद होना स्वाभाविक है। लेकिन इस मतभेद को न स्वीकारते हुए सामने वाले को पूरी तरह नासमझ मान लेना सही नहीं। इससे हमारे रिश्ते प्रभावित होते हैं, जीवन में अशांति आती है। समझदारी इसी में है कि प्राकृतिक भिन्नता को स्वीकारते हुए एक-दूसरे की सोच को मान दिया जाए।

जानिए महिला और पुरुष एक-दूसरे को क्यों समझते हैं ना समझ और लापरवाह
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why women and men understand each other careless or not Understanding

प्रसिद्ध दार्शनिक सिगमंड फ्रायड ने करीब एक शताब्दी पहले ही कह दिया था कि हम किसी व्यक्ति के बारे में जैसा सोचते हैं, उसे वैसा ही मानते हैं, भले हमें मालूम हो कि सच्चाई कुछ और है। यह बात सबसे ज्यादा पुरुषों और महिलाओं पर एक-दूसरे के लिए, एक-दूसरे द्वारा बनाई गई धारणाओं पर पूरी तरह से खरी उतरती है। चाहे बात किसी कॉरपोरेट ऑफिस की हो, प्रशासनिक ऑफिस की हो या किसी सामान्य घर की। महिलाएं अपने इर्द-गिर्द के पुरुषों के बारे में यही सोचती हैं कि पुरुष बड़े अजीब होते हैं, खासकर महिलाओं के संबंध में। उनको पुरुषों के संबंध में सबसे बड़ी शिकायत यह होती है कि उन्हें महिलाओं के संबंध में संवेदनशील प्रतिक्रिया व्यक्त करनी नहीं आती।

महिलाएं ही नहीं बल्कि हू-ब-हू पुरुष भी महिलाओं के बारे में ऐसी ही सोच रखते हैं। उन्हें लगता है कि चाहे घर हो या ऑफिस, महिलाएं कुछ ज्यादा ही और गैरजरूरी प्रतिक्रिया करती हैं। ऐसे मौकों में पुरुष, महिलाओं के संबंध में बड़ी सहानुभूति दर्शाते हुए सोचते हैं, 'क्या इनके पास और कोई काम नहीं है, जो छोटी से छोटी बात को भी इस तरह दिल से लगा लेती हैं।' किसी बात या घटना को लेकर इन दोनों की एक-दूसरे के संबंध में यह सिर्फ तात्कालिक प्रतिक्रियाएं भर नहीं होतीं, बल्कि इसी के चलते महिलाएं मान लेती हैं कि दुनिया के अधिकांश पुरुष नासमझ होते हैं और अपने आगे किसी की नहीं सुनते हैं और पुरुषों का निष्कर्ष होता है कि अधिकतर महिलाएं सोच-समझकर काम नहीं करती हैं।




कुछ और है हकीकत

महिलाओं और पुरुषों की एक-दूसरे के प्रति नेगेटिव सोच के पीछे की हकीकत यह है कि न तो महिलाएं और न ही पुरुष नासमझ होते हैं। बस तमाम मामलों में दोनों के सोचने का ढंग भर अलग-अलग होता है। वास्तव में इसी भिन्न ढंग के कारण ही एक ही मसले पर दोनों अलग-अलग निष्कर्षों पर पहुंचते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो दोनों के व्यवहार का फर्क, दोनों के बुनियादी नजरिए का फर्क है। महिला-पुरुष एक ही प्रकृति के द्वारा बनाए हुए दो ऐसे स्तंभ हैं, जो एक-दूसरे से तमाम मामलों में ठीक उलट हैं। हालांकि दोनों के भीतर एक ही तरह की भावनाएं जन्म लेती हैं, एक ही तरह की संवेदनाएं होती हैं, लेकिन उन्हें जाहिर करने का दोनों का तरीका इतना अलग होता है कि एक-दूसरे के बीच मतभेद पैदा कर देता है।

सोच में होता है बुनियादी फर्क

ऊपर कही गई बात पूरी दुनिया में प्राय: एक जैसे ही लागू होती है। इसमें न तो भिन्न देश-संस्कृति का कोई असर होता है और न ही पढ़ाई-लिखाई या विकास का। अमेरिका और अफ्रीका दोनों ही जगह यह बात एक जैसे ही लागू होती है। इस मामले में पूरी दुनिया में कमाल की एकरूपता है। समाज की संपन्नता और साक्षरता का इस मामले में कोई दखल नहीं होता। चूंकि महिलाएं स्वाभाविक तौर पर पुरुषों से ज्यादा संवेदनशील, दयालु और अपने परिवार का ध्यान रखने वाली होती हैं, इसलिए वे किसी भी मसले को सिर्फ हां या न, फायदा या नुकसान के नजरिए भर से नहीं देखतीं। जबकि पुरुष अकसर अपने स्वाभाविक अंदाज में आक्रामक, हर जगह प्रतिस्पर्धी और ईर्ष्यालु होते हैं। इसलिए वे अपनी तमाम प्राथमिकताएं हां या न के खांचे या ढांचे में ही चुनते हैं।




सोच में फर्क की वजह

महिला-पुरुष की सोच में उक्त बुनियादी फर्क में कुछ भूमिका शारीरिक रसायनों की भी होती है। महिलाओं का शरीर एस्ट्रोजन नामक हार्मोन का उत्पादन करता है और पुरुषों का टेस्टोस्टेरॉन नामक हार्मोन का उत्पादन करता है। इन हार्मोनों की वजह से भी दोनों में एक स्थायी किस्म का फर्क दिखता है। महिलाएं आमतौर पर भावनाओं से भरे संसार में रहना पसंद करती हैं और मानसिक तौर पर काफी हद तक कोमल होती हैं, जबकि पुरुषों के मामले में ऐसा नहीं कहा जा सकता। वे दिमाग के दूसरे हिस्से से ज्यादा सोचते हैं। इसी के चलते महिलाओं की अपेक्षा वे कहीं व्यावहारिक और विचारशील होते हैं।





















कई स्तरों पर हैं दोनों भिन्न

सच यह है कि महिलाएं और पुरुष मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक, तीनों ही स्तरों पर एक-दूसरे से बहुत भिन्न होते हैं। महिलाएं सोचती हैं कि उनका पति या ब्वॉयफ्रेंड इतना बेपरवाह कैसे हो सकता है कि उनकी सालगिरह तक भूल जाए? तो पुरुषों को लगता है कि उनकी पत्नी या गर्लफ्रेंड हर बात पर इतना ज्यादा क्यों रिएक्ट करती है? वास्तव में दोनों के बीच यह सोच का पूर्वाग्रह नहीं है, सोचने का तरीका है। लब्बोलुआब यह है कि न तो महिलाएं नासमझ होती हैं और न ही पुरुष बेपरवाह। इसलिए जब भी आपको अपनी पत्नी या महिला सहकर्मी में या किसी भी महिला में नासमझी का कोई लक्षण दिखे तो सोच लीजिएगा इसका कोई इलाज नहीं है। इसी तरह महिलाओं को यदि अपने दायरे का कोई पुरुष अपनी बात मनवाने पर अड़ा नजर आए तो सोच लीजिए यह बीमारी लाइलाज है। अगर जिंदगी को सहज बनाए रखना है तो इसी सच को स्वीकारते हुए जीना सीखना होगा।

पुरुषों से संबंधित अध्ययन

पुरुषों का मस्तिष्क अपनी दैनिक दिनचर्या में ज्यादातर समय इस गुणा-भाग में व्यस्त रहता है कि अपने प्रतिद्वंद्वी को कैसे पछाड़ें? किस तरह अपने को आगे बढ़ाएं या बातचीत में कैसे अपनी बेहतर जानकारियों का झंडा गाड़ा जाए? आप उन्हें चाहे जो भी समझें लेकिन असल बात यह है कि वे सदियों से ऐसे ही हैं। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के एक अध्ययन के अनुसार, पुरुषों के साथ सबसे बड़ी दिक्कत यह होती है कि वे अपनी जिम्मेदारियों को निभाते-निभाते इतना परेशान हो जाते हैं कि उन्हें किसी की भावनाओं से कोई मतलब ही नहीं रह जाता। वे सही मायनों में उम्र के मध्य में आते-आते ही आत्मकेंद्रित हो जाते हैं, इसलिए महिलाओं के लिए वे बेपरवाह हो जाते हैं।

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