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सोशल मीडिया पर सक्रियता से टूट रहे हैं संबंध

इंटरनेट ने तमाम सुविधाएं देकर हमारे काम आसान जरूर किए हैं लेकिन सोशल मीडिया ने हमारे रिश्तों को भी काफी प्रभावित किया है। हम अपने वर्चुअल दोस्तों को इतना ज्यादा समय देते हैं कि अपनों के लिए हमारे पास समय नहीं रहता। सोशल मीडिया पर ज्यादा सक्रिय रहने पर किस तरह रिश्ते बिखर रहे हैं, एक पड़ताल।

मेंटल हेल्थ के लिए बहुत बुरा नहीं है सोशल मीडिया
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सोशल मीडिया (फाइल फोटो)

आज की तारीख में शायद ही कोई ऐसा शख्स हो, जो इंटरनेट और मोबाइल-लैपटॉप अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में इस्तेमाल न करता हो। एक साधारण शख्स भी सोशल मीडिया पर एक्टिव है, उसके दोस्तों की संख्या कुछ सौ से लेकर कई हजार तक हो सकती है। यह अलग बात है कि सब आभासी या वर्चुअल दोस्त होते हैं। लेकिन दोस्त चाहे आभासी हों या वास्तविक, दोस्ती जिनसे भी होती है, उसका तो मतलब यही है कि आपकी जान-पहचान और संबंधों का दायरा बढ़ रहा है। इस मायने में सोशल मीडिया को यह श्रेय दिया जा सकता है, उसने आम से आम आदमी को सोशलाइज किया है। उसे सिर्फ अपने इर्द-गिर्द के समाज से ही नहीं, देश-दुनिया से भी जोड़ा है। लेकिन इस बात से बहुत ज्यादा खुश होने की जरूरत भी नहीं है, सोशल मीडिया मीडिया से जुड़ने के परिणाम घातक भी साबित हो रहे हैं।

हो रहे हैं ब्रेकअप : आम आदमी को सोशल मीडिया ने सोशलाइज जरूर किया है। लेकिन इसके चलते परिवार में तनाव पैदा हो रहा है। साफ लहजे में कहें तो सोशल मीडिया परिवार तोड़ रहा है। जहां हम फेसबुक और व्हाटसएप से नए-नए दोस्त ढूंढ़ रहे हैं, वहीं ये माध्यम बड़े पैमाने पर ब्रेकअप करा रहे हैं। ये सोशल मीडिया ही है, जिसके प्रभाव में लोग बड़े पैमाने पर मैरिज से सिंगल स्टेटस की ओर बढ़ रहे हैं। सोशल मीडिया के कारण पति-पत्नी के बीच काफी बड़े पैमाने पर शक-शुबहा बढ़ गए हैं, खासकर उन पति-पत्नी के बीच, जो वर्किंग हैं, जिनके घर के बाहर के लोगों के साथ कामकाजी रिश्ते हैं।

रिश्तों में दरार ला रही है मोबाइल चैटिंग : मोबाइल चैटिंग ने जहां एक तरफ हमें बहुत तरह की सुविधाएं दी हैं, डेटिंग का नया और रोमांचक अहसास दिया है, वहीं इसी मोबाइल चैटिंग ने रिश्तों में दरार पैदा की है। जो चैटिंग अजनबी लोगों से रिश्ते बनाती है, वही चैटिंग बने-बनाए रिश्तों को तोड़ रही है। देशभर में पिछले दो-तीन सालों के भीतर जो पारिवारिक झगड़े और मारपीट की वारदातें दर्ज हुई हैं, उनमें से 30 फीसदी से ज्यादा की वजह सोशल मीडिया है। हैरानी की बात तो यह है कि सोशल मीडिया के कारण ही हत्या जैसे अपराध में 10 फीसदी तक इजाफा हुआ है।

खत्म हो रही है सामाजिकता : आमतौर पर मजाक में कहा जाता है कि सोशल मीडिया के वर्चस्व ने लोगों की सामाजिकता को खत्म कर दिया है। अगर पूरे परिवार को एक साथ किसी बात के लिए इकट्ठा होना हो तो आज यह बहुत मुश्किल काम हो जाता है। क्योंकि लोग पूरी दुनिया से तो हर समय जुड़े रहते हैं, लेकिन सोशल मीडिया के कारण लोगों के पास आपस में एक साथ मिलने-बैठने के लिए समय नहीं है। लोग एक-दूसरे के साथ अब पहले से कई गुना ज्यादा 'हाय हैलो' कर रहे हैं, लेकिन मिलकर नहीं, सोशल मीडिया में क्लिक करके।

बढ़ गए तलाक के मामले : अगर 2018-19 और 2017-18 के तलाक संबंधी आंकड़ों को ध्यान से देखें और उनकी वजहों को पढ़ें तो हैरान करने वाली सच्चाई यह है कि करीब 40 प्रतिशत तक तलाक के मामलों का कारण सोशल मीडिया है। भोपाल के कुटुंब न्यायालयों में पिछले तीन साल के उन मामलों को एकत्र करके अध्ययन करने की कोशिश की गई है, जो तलाक के लिए आते हैं। इस व्यापक अध्ययन में यह तथ्य सामने आए हैं कि एसएमएस, फेसबुक, व्हाटसएप, ट्वीटर के कारण तलाक के मामलों में 30 से 40 फीसदी तक की बढ़ोत्तरी हो गई है। यही नहीं प्रेम-विवाह अब पहले के मुकाबले बहुत जल्दी असफल होने लगे हैं, क्योंकि उनमें सोशल मीडिया के कारण अविश्वास की स्थितियां बहुत जल्दी फैलने लगी हैं। (सोशल मीडिया के कारण ज्यादातर कामकाजी दंपतियों में एक-दूसरे के प्रति बड़े पैमाने पर अविश्वास बढ़ा है। अब ऐसी खबरें सुर्खियां नहीं हासिल करतीं, जिनकी मूल में यह हो कि चैटिंग की वजह से पति-पत्नी ने तलाक लिया, क्योंकि ऐसे उदाहरण बहुत आम होते जा रहे हैं। )

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क्यों कमजोर होते हैं संबंध : सवाल है, जो सोशल मीडिया संबंधों को मजबूत बनाने के लिए जाना जाता है, आखिरकार वह पहले से मजबूत संबंधों को इस कदर कमजोर क्यों करता है? इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि सोशल मीडिया लोगों को अपने में इतना ज्यादा उलझाए रखता है कि लोगों के पास अपने प्रियजनों के साथ वक्त गुजारने का समय नहीं रहता। जब लोग एक-दूसरे से दूर होने लगते हैं, तो उनके बीच के संबंधों की तमाम भावनाएं भी कमजोर पड़ने लगती हैं। चूंकि आज की तारीख में तेज रफ्तार करियर आधारित जीवनशैली में अपने काम-काज और सोशल लाइफ के दबाव में हम लगातार सोशल मीडिया में इतने ज्यादा सक्रिय रहते हैं कि वास्तविक जीवन के लिए हमारे पास समय ही नहीं बचता। जब लोग एक-दूसरे से इस तरह वास्तविक स्तर पर दूर होने लगते हैं तो जल्द ही यह दूरी रिश्तों को औपचारिक बना देती है और फिर बड़ी सहजता से इन औपचारिक रिश्तों की भी जरूरत खत्म हो जाती है। इसलिए पश्चिम के देशों में लोग ऑनलाइन लाइफस्टाइल से डरने लगे हैं और फिर से ऑफलाइन लाइफस्टाइल की तरफ जाने की कोशिश कर रहे हैं। यह सिर्फ रिश्तों के अंतिम परिणति के स्तर पर ही खतरनाक नहीं है बल्कि सच्चाई यह है कि सोशल मीडिया अगर हमें इस हद तक नहीं भी ले जाता कि रिश्ते टूटें तो भी रिश्तों को बेहद सुस्त और ठंडा बनाने में अपनी भूमिका निभा रहा है। क्योंकि आभासी गतिविधियां हमारा हर वह वक्त ले रही हैं, जिनसे हम अपने वास्तविक रिश्तों को समृद्ध और आत्मीय बनाते हैं।

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