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International Family Day 2019 : अंतर्राष्ट्रीय परिवार दिवस पर जानें नए दौर के नए रिश्तों की कहानी

International Family Day 2019 : नए दौर में परिवार को लेकर लोगों की सोच काफी बदली है। अब परिवार परंपरागत ढांचे से निकल कर अपना नया स्वरूप ले रहा है। आज की पीढ़ी परिवार के महत्व को समझती है। परिवार के सदस्य अपने-अपने स्तर पर सामंजस्य बैठाते हैं ताकि परिवार में आपसी प्यार बना रहे, सब एक-दूसरे का संबल बनें। परिवार के नए स्वरूप पर एक दृष्टि डालते हैं।

International Family Day 2019 : अंतर्राष्ट्रीय परिवार दिवस पर जानें नए दौर के नए रिश्तों की कहानी

International Family Day 2019 : दुनिया का कोई भी हिस्सा हो, मकान घर हो जाता है, जब अपनों का साथ हो। अपनों का यूं साथ रहना-जीना ही परिवार कहलाता है। परिवार हर किसी के जीवन की आधारशिला है। हर उम्र के लोगों के लिए दुनिया का सबसे महफूज ठिकाना है परिवार। बच्चे हों या बुजुर्ग, परिवार रूपी घरौंदे में ही जरूरी संबल पाते हैं। खुशी हो या गम, हर हालात में जीने का सहारा देने वाले परिवार का स्वरूप अब बदलता दिख रहा है। सुखद बात यह है कि घर के आंगन में अब निर्वाह की बंदिशें नहीं बल्कि सहजता देखने को मिल रही है। साथ रहने-जीने की सकुचाहट की जगह मन के जुड़ाव ने ले ली है। जिस देश के पारिवारिक ढांचे की सराहना पूरी दुनिया में होती हो, वहां समय के साथ आए इन बदलावों के चलते अपनों के बीच औपचारिकता नहीं, बुनियादी अपनापन देखने को मिल रहा है।

बदल गया है रिश्तों का रूप

परिवार रिश्तों का ताना-बाना ही तो है, जो स्नेह और संबल के धागों से गुंथा हुआ है। इन रिश्तों का रूप और स्वरूप दोनों अब काफी बदल गए हैं। अब रिश्ते ना बोझ बनते हैं और ना ही बेवजह की जिम्मेदारी। परिवार में हर उम्र के सदस्यों को एक जरूरी स्पेस दिया जाता है। इस तरह मन की बातें कहने-सुनने का माहौल बन रहा है। बंदिशों की जगह समझाइशों ने ले ली है।

हमारे बदलते पारिवारिक ढांचे में बड़ों के विचार और छोटों का व्यवहार काफी कुछ बदल गया है। आपसी तालमेल की सोच रिश्तों को नया जीवन दे रही है। हालांकि रिश्तों के रूप बदल रहे हैं पर उनसे जुड़े भाव वही हैं। अपनों से जुड़ा लगाव और चाव वही है। हां, इतना जरूर है, समय के मुताबिक़ ढलने से पारिवारिक रिश्तों में और मजबूती आई है।

रिश्तों में आई है सहजता

सास-बहू का रिश्ता हो या पति पत्नी का, अब हमारे घरों में रिश्तों को जीते हुए बरते जाने वाली सतर्कता की जगह सहजता ने ली है। वैचारिक उदारता का ऐसा परिवेश बन रहा है, जिसमें हर कोई खुलकर जी सके। कभी जिन रिश्तों के नाम से मन में भय की कंपकंपी होती थी, आज उन संबंधों से भी प्यार-स्नेह मिल रहा है, जो एक संबल भी देता है।

बड़ों की रूढ़िवादी सोच अब ना बेटियों के सपनों को पूरा करने में बाधा बनती है और ना बहुओं के प्रति कोई पूर्वाग्रह पाले जाते हैं। रिश्तों को तरजीह देने की इस नई संस्कृति में एक-दूजे का मन समझने की कोशिश जाती है। उम्र के मुताबिक एक- दूजे की जरूरतों को जानने का प्रयास किया जाता है। दिल की चाहतों को मान दिया जाता है। अपनों को समझने की ऐसी कोशिशें, रिश्तों में सहजता ले लाई है, जो पूरे परिवार को जोड़ें रखने में मददगार बन रही है।

मान्यताओं के नए मायने

नए समय में नए दस्तूर पारिवारिक जीवन का हिस्सा बन गए हैं। साथ ही पुरानी मान्यताओं को निभाने में अनिवार्यता की जगह अपनी अपनी इच्छा ने ले ली है। इसीलिए अब मिल-जुलकर व्रत-त्योहार भी मनाए जाते हैं, पार्टियां भी की जाती हैं। आपस में कोई लुका-छिपी नहीं रही। असल में देखा जाए तो आज परिवार में अनुशासन और आजादी का प्यारा-सा सतुंलन देखने को मिल रहा है, जिसमें परंपरागत मान्यताएं भी निभाई जा रही हैं, और नएपन से जीने की राहें भी खुल रही हैं। व्रत-उपवास हों या रीति-रिवाज।

अब बंदिशों और बने-बनाए नियमों की जगह आपसी प्रेम-स्नेह और सरलता ने ली है। यही वजह है कि अब युवा सदस्यों की खुशियों में बुजुर्गों की भागीदारी भी देखने को मिलती है। बुजुर्गों की परेशानी में घर के युवा सदस्यों को भी जिम्मेदारी निभाते देखा जा सकता है। मान्यताओं के नए मायने तय करती, अपनों से मिली यह छूट, नई-पुरानी पीढ़ी को करीब लाएगी। रिश्तों को बांधे और साधे रखेंगी।

परिवार अब बदलाव की बुनियाद

'वसुधैव कुटुंबकम्' की संस्कृति वाले हमारे देश में परिवार को सदा से ही अहमियत दी जाती रही है। यही वजह है कि परिवार की बेहतरी के लिए अपनी निजी खुशियों की कुर्बानी देना, व्यवहार में बदलाव लाना, अपने विचारों को वक़्त के मुताबिक ढालना, अपनों को सब स्वीकार होता है। तभी तो मौजूदा समय में कई सकारात्मक बदलावों की बुनियाद बन रहा है परिवार।

आगस्त कॉम्टे के मुताबिक 'परिवार समाज की आधारभूत इकाई है।' यकीनन इस इकाई से शुरू हुए बदलाव सार्थक और स्थाई भी होते हैं। कभी पारिवारिक बंधन ही बहू-बेटियों की तरक्की के रास्ते रोकते थे। पारिवारिक सोच ही बेटों को अहम भरे स्वभाव के साथ बड़ा करती थी।

बुजुर्ग बच्चों के मन ना-सुनकर अपनी राय मनवाने की सोच रखते थे। अब इन सभी मोर्चों पर बदलाव आया है। अपने ही आंगन में आया यह परिवर्तन समाज और देश में भी बदलाव की बुनियाद बन रहा है।

महिलाओं के लिए बेहद सुखद

परिवार का बदलता स्वरूप महिलाओं को नए संसार से रूबरू करवा रहा है। इस नई दुनिया में उनके सपनों को समझने की सोच भी है और उन्हें पूरा करने के लिए अपनों का संबल भी। यह बहुत अहम है, क्योंकि पारिवारिक बंदिशों के चलते अब ना बेटियों की पढ़ाई छूटती है और ना बहुओं की नौकरी। इतना ही नहीं, जरूरत के मुताबिक सहूलियत वाले पहनावे की बात हो या रीति-रिवाज का निर्वाह, अब उनके मन की भी सुनी जाती है।

उनकी व्यस्तता को समझने की कोशिश की जाती है। नतीजतन, उनके हिस्से भावनात्मक घुटन नहीं बल्कि व्यावहारिक खुलापन आ रहा है। पारिवारिक फ्रंट पर आए ऐसे बदलाव महिलाओं को कई मोर्चों पर जूझने और खुद को साबित करने की हिम्मत दे रहे हैं।

सोशल मीडिया का पॉजिटिव रोल

आज के हाईटेक दौर में फैमिलीज का वर्चुअल सोशल नेटवर्क होता है। जहां खुशियों के लम्हे हों या तकलीफदेह पल, सब साझा किए जाते हैं। फेसबुक, व्हाट्सअप, ट्विटर और इंस्टाग्राम समेत कई साइट्स पर फैमिली ग्रुप्स भी बने हुए हैं। इनमें अलग-अलग शहरों में बसे रिश्तेदार भी जुड़े होते हैं। शादी-समारोहों की तस्वीरें भी खूब शेयर की जाती हैं।

इन फैमिली ग्रुप्स के चलते देश के अलग-अलग हिस्सों में ही नहीं, विदेश जा बसे अपनों में भी अब दूरियां आड़े नहीं आतीं। जहां बच्चे दूर जा बसे हैं, घर के बड़ों के साथ अब वीडियो कॉलिंग की जाती है। हर अवसर की तस्वीरें शेयर की जाती हैं। यानी मौजूदा दौर में परिवार को जोड़ने में सोशल मीडिया की भूमिका वाकई पॉजिटिव है, जो कहीं ना कहीं बदलाव और स्वीकार्यता का आधार भी बन रही है।

लेखिका - डॉ. मोनिका शर्मा

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