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भूलकर भी महिलाओं में समय से पहले पीरियड्स बंद होने को न करें इग्नोर, जानें इसके लक्षण और उपचार

मेनोपॉज एज से पहले ही कुछ महिलाओं में पीरियड साइकल बंद हो जाता है। इसके कारण उन्हें कई तरह की शारीरिक-मानसिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है, लेकिन समय रहते ट्रीटमेंट करवाया जाए तो प्री-मैच्योर मेनोपॉज की समस्या ठीक हो सकती है। जानिए, प्री-मैच्योर मेनोपॉज के कारण, लक्षण और उपचार के बारे में।

भूलकर भी महिलाओं में समय से पहले पीरियड्स बंद होने को न करें इग्नोर, जानें इसके लक्षण और उपचार

सामान्य तौर 48 से 50 साल की उम्र में महिलाओं को मेनोपॉज या रजोनिवृत्ति का सामना करना पड़ता है, यह एक नेचुरल प्रोसेस है। हमारे देश में मेनोपॉज की औसत उम्र 49 साल आंकी गई है, जबकि यूरोपीय देशों में 51 साल तक महिलाओं में यह पड़ाव आता है। असल में मेनोपॉज वह स्थिति है, जब महिला की ओवरी काम करना बंद कर देती है, उनके अंडाशय में अंडे बनना बंद हो जाते हैं। अंडाशय से ही हर महीने एक अंडा रिलीज होता है और वहां से आकर फेलोपियन ट्यूब में रुकता है।

अगर महिला उस पीरियड में इंटरकोर्स करती है तो पुरुष के स्पर्म के साथ अंडा फर्टिलाइज होकर भ्रूण का रूप लेकर ओवरी में आ जाता है। अगर अंडा फर्टिलाइज नहीं हो पाता तो माहवारी या पीरियड्स होते हैं।

ऐसा हर महीने तब तक होता है, जब तक सारे अंडे खत्म न हो जाएं जिसे मेनोपॉज कहते हैं। मेनोपॉज के बाद माहवारी या पीरियड्स आना बंद हो जाते हैं या बहुत कम हो जाते हैं और महिला कंसीव नहीं कर पाती है।

लेकिन कई महिलाओं को ये अंडे समय से पहले (45 वर्ष या उससे भी पहले) खत्म हो जाते हैं, जिसे मेडिकल टर्म में प्री-मैच्योर मेनोपॉज कहा जाता है। प्री-मैच्योर मेनोपॉज होने से महिलाओं के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर असर पड़ता है।

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क्या हैं लक्षण

प्री-मैच्योर मेनोपॉज के शुरुआती लक्षण में महिलाओं में पीरियड्स अनियमित होने लगते हैं। कभी-कभी महीने में एक बार तो कभी 3-4 महीने में एक बार ही पीरियड्स होते हैं या धीरे-धीरे बंद भी हो जाते हैं।

ऐसी महिलाओं में आमतौर पर कुछ लक्षण दिखाई देते हैं- हॉट फ्लैशेज होना या बहुत गर्मी लगना, घबराहट रहना, रात को सोने में दिक्कत होना, स्वभाव में चिड़चिड़ापन आना, लगातार मूड चेंज होना, वेजाइनल पार्ट में ड्रायनेस आने से बहुत ज्यादा ईचिंग होना, खांसते हुए यूरीन न रुक पाना, ब्रेस्ट में सूजन और हल्का दर्द रहना।

इसके अलावा महिलाओं में कई तरह के शारीरिक बदलाव भी आने लगते हैं। मानसिक रूप से इसके लिए तैयार न होने के कारण उनमें तनाव, अवसाद जैसे भावनात्मक विकार भी देखे जाते हैं। प्री-मैच्योर मेनोपॉज के कारण ऑस्टियोपोरोसिस और हृदय रोगों का खतरा भी बढ़ जाता है।

रक्त धमनियों में एस्ट्रोजन हार्मोन का लेवल कम होने और लिपिड ब्लड फैट बढ़ने के कारण महिलाओं को हार्ट स्ट्रोक का खतरा रहता है। हड्डियों में कैल्शियम की कमी हो जाती है, बोन डेंसिटी या हड्डियों में सघनता कम होने से वे कमजोर होने लगती हैं, जिससे फ्रैक्चर के चांसेस बढ़ जाते हैं।

क्या हैं कारण

प्री-मैच्योर मेनोपॉज कई कारणों से हो सकता है, इसमें शामिल हैं-

1.देर से शादी करने और बच्चे देर से पैदा होना। इससे महिला की फर्टिलिटी पर असर पड़ता है और प्री-मैच्योर मेनोपॉज की संभावना ज्यादा बढ़ जाती है।

2.ओवेरियन फैल्योर बहुत देखने को मिलता है। कई महिलाएं आईवीएफ, आईवीआई करवा रही हैं, जिससे एक ही टाइम में 5-5 अंडे रिलीज हो जाते हैं।

ऐसी महिलाओं में भी प्री-मैच्योर मेनोपॉज बहुत हो रहा है क्योंकि ओवरी से एग जल्दी खत्म हो जाते हैं।

3.आनुवांशिक कारणों की वजह से यानी जिनकी मां या बहन को ऐसा हुआ है तो उन महिलाओं में प्री-मैच्योर मेनोपॉज होने की संभावना बढ़ जाती है।

4.ऑटोइम्यून विकार या थायरॉयड, डायबिटीज, ब्लड प्रेशर, वायरल इंफेक्शन, ओवरी इंफेक्शन जैसी बीमारियों का असर ओवरी पर भी पड़ता है, जिससे

महिला को प्री-मैच्योर मेनोपॉज हो सकता है।

5.कैंसर ट्रीटमेंट में दी जाने वाली रेडियोथेरेपी या कीमोथेरेपी से प्रभावित ओवरी भी प्री-मैच्योर मेनोपॉज का एक बड़ा कारण है। इन गंभीर बीमारियों के इलाज में ली जाने वाली मेडिसिन भी ओवरी को नुकसान पहुंचाती हैं।

6.कैंसर या किसी तरह की सिस्ट होने के कारण महिला का गर्भाशय रिमूव करना पड़े और उसके साथ ओवरी भी निकाल दी गई हो तो प्री-मैच्योर मेनोपॉज हो जाता है।

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क्या है उपचार

सबसे पहले डॉक्टर महिला की पूरी जांच करते हैं और उसकी फैमिली हिस्ट्री, स्थिति के हिसाब से इलाज किया जाता है। ब्लड टेस्ट करके पता चलता है कि हार्मोंस कितने हैं। मेमोग्राफी कराते हैं, जिससे पता चले कि ब्रेस्ट पर कोई बुरा असर तो नहीं है। बोन डेंसिटी टेस्ट कराते हैं कि महिला ऑस्टियोपोरोसिस की शिकार तो नहीं है। अल्ट्रासाउंड से लिवर, किडनी ठीक होने का पता लगाया जाता है।

महिला अगर आगे मां बनना चाहती हैं तो उसके लिए एक नई थेरेपी इस्तेमाल की जा रही है, जिसे स्टैम सेल कहते हैं। इसमें जरूरतमंद महिला की दूरबीन या लेप्रोस्कोपी तकनीक के द्वारा बोन मैरो से वेजाइनरी अंडों को स्टीमुलेट करके निकाल लिया जाता है। उन्हें प्रोसेस करके दोबारा उस महिला की ओवरी में डाला जाता है।

इससे महिला की ओवरी फिर से काम करना शुरू कर देती है यानी अंडे बनने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है,लेकिन जिन प्री-मैच्योर मेनोपॉज से पीड़ित महिलाओं को आगे बच्चे नहीं चाहिए, लेकिन वे शारीरिक और मानसिक तकलीफों को कम करना चाहती हैं, ऐसी महिलाओं को हार्मोन रिप्लेसमेंट थेरेपी (एचआरटी) दी जाती है जो काफी कारगर साबित हुई है।

इस थेरेपी के नियमित प्रयोग से महिला को काफी फायदा होता है। इसके साइड इफेक्ट कम होते हैं और मेडिसिन कम मात्रा में दी जाती है। यह थेरेपी पेशेंट की स्थिति के हिसाब से दी जाती है। उन्हें कैल्शियम, विटामिन डी जैसे सप्लीमेंट खाने के लिए दिए जाते हैं।

इसमें पेशेंट को ओरल टेबलेट्स के साथ-साथ जैल और क्रीम भी दिए जाते हैं। वेजाइना एरिया में इंफेक्शंस को कम करने के लिए जैल या क्रीम इस्तेमाल होती हैं। तनाव, अवसाद जैसी स्थिति को कम करने के लिए एंटी डिप्रेशन मेडिसिन भी दी जाती हैं।

सावधानियां

प्री-मैच्योर मेनोपॉज में होने वाली तकलीफों से निजात पाने के लिए पेशेंट को हार्मोन रिप्लेसमेंट थेरेपी नियमित रूप से 2-3 साल तक लेनी पड़ती है। हालांकि शुरू में इसके साइड इफेक्ट भी देखने को मिलते हैं जैसे-सिर दर्द होना, ब्रेस्ट में हल्का दर्द होना, पाचन प्रक्रिया में गड़बड़ी होना, लिवर प्रभावित हो सकता है। इससे घबराना नहीं चाहिए क्योंकि ये शॉर्ट पीरियड के लिए ही होते हैं, धीरे-धीरे सब कुछ एडजस्ट होने लगता है।

रखें ध्यान

अच्छे रिजल्ट्स पाने के लिए पेशंट को अपने लाइफ स्टाइल में भी परिवर्तन करना पड़ेगा जैसे-तनावमुक्त रहने के लिए खुद को व्यस्त रखें, अपने पसंदीदा काम करें, पौष्टिक और बैलेंस डाइट लें। फिट रहने के लिए फिजिकल एक्टिविटीज या एक्सरसाइज करें। नियमित रूप से अपना मेडिकल चैकअप कराती रहें और किसी भी तरह की समस्या हो तो डॉक्टर को कंसल्ट करें।

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