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सुपर वुमन हैं आज की महिलाएं, 8 हाथों वाली देवी की तरह करती हैं सारे काम

देखा जाए तो स्त्रियों के पास ऐसी अद्भुत शक्तियां हैं, जो इस बात की ओर इंगित करती हैं, अगर उनके पास मां दुर्गा की तरह आठ हाथ हों तो वे क्या नहीं कर सकतीं। वैसे भी पारिवारिक जीवन की धुरी के रूप में या फिर कामकाजी महिला के रूप में भी जिस तरह से वे संयोजन करती हैं, विलक्षण शक्ति वाले ही लोग कर सकते हैं।

सुपर वुमन हैं आज की महिलाएं, 8 हाथों वाली देवी की तरह करती हैं सारे काम
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देखा जाए तो स्त्रियों के पास ऐसी अद्भुत शक्तियां हैं, जो इस बात की ओर इंगित करती हैं, अगर उनके पास मां दुर्गा की तरह आठ हाथ हों तो वे क्या नहीं कर सकतीं। वैसे भी पारिवारिक जीवन की धुरी के रूप में या फिर कामकाजी महिला के रूप में भी जिस तरह से वे संयोजन करती हैं, विलक्षण शक्ति वाले ही लोग कर सकते हैं।

अगर लड़कियों को सही ढंग से परिवार का संबल मिले और वे भी पारिवारिक मूल्यों को अपनाते हुए अपने विकास के रास्ते तय करें तो वे अनंत ऊंचाइयां छू सकती हैं। अत: नवरात्र के अवसर पर स्त्री अपनी आंतरिक शक्ति को अवश्य पहचानें।

नवरात्र या आम भाषा में कहा जाने वाला नौ दुर्गा यानी स्त्री के नौ रूप। सोचिए कि अपने दो हाथों से ही जब एक स्त्री घर, बाहर, तमाम दुनिया की जिम्मेदारियां संभाल लेती है, तो अगर देवी दुर्गा की तरह उसकी आठ भुजाएं हों, तो वह क्या नहीं कर सकती। निश्चित ही स्त्री के पास अगर उसके कई हाथ हों, तो उसकी ताकत में बहुत ज्यादा वृद्धि हो जाएगी।

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विलक्षण शक्तियां हैं स्त्रियों के पास

मां दुर्गा के बारे में कहा जाता है कि देवताओं ने उनको अपने-अपने भाग और अपने-अपने हिस्से की शक्ति देकर आसुरी शक्तियों से लड़ने की क्षमता सौंपी थी। आज की स्त्री पर नजर डालिए तो सचमुच उसके पास भी विलक्षण शक्तियां दिखाई देती हैं।

ब्रम्हा की तरह वह सृष्टि की जनक है। विष्णु की तरह पालनकर्ता है। शिव की तरह वह बुरी शक्तियों की संहारकर्ता है। ये तीनों देव अपनी इन्हीं विशिष्टताओं के कारण पूजे जाते हैं। इसी तरह स्त्री जो घर को चलाती है, मामूली आमदनी में भी सबको खुश रखने का प्रयास करती है, वह अन्नपूर्णा, विश्वकर्मा और लक्ष्मी भी है।

इसके अलावा नौकरी करने वाली हो तो वह साक्षात कुबेर का अवतार है, जिसके कारण घर धन-धान्य से भरा रहता है और कुबेर के खजाने की चाबी उसके पास ही रहती है। तभी तो जब दुनिया भर में मंदी फैली तो अपना देश उससे अछूता रहा। स्त्रियों द्वारा की गई बचत पूरे परिवार, समाज और देश के बहुत काम आई।

हर वर्ग की महिला के लिए जरूरी है कामयाबी

जिस तरह देवताओं ने दुर्गा को ताकत सौंपी थी, हमारे समाज ने भी स्त्रियों को तरह-तरह से शक्ति दी है। पढ़-लिखकर वे कामयाबी की कोई भी उड़ान भरने को तैयार हैं। वे क्षेत्र जो कल तक उनके लिए वर्जित थे, वहां उनकी हर रोज की दस्तकें सुनाई दे रही हैं।

यानी कि अगर अवसर हों और समाज, परिवार का समर्थन भी, तो कोई भी लक्ष्य उनके लिए ऐसा नहीं, जिसे छुआ न जा सके, प्राप्त न किया जा सके। लोकतांत्रिक मूल्य भी महिलाओं की राह को आसान बनाने में आगे हैं।

लेकिन वे महिलाएं, जो पीछे छूट गईं, उन्हें कैसे आगे बढ़ाया जाए। हर गरीब स्त्री भी वही कामयाबी पा सके, जो उच्च मध्यवर्ग और मध्यवर्ग की स्त्रियां पाती हैं तो समाज की तस्वीर ही दूसरी होगी। इस दिशा में भी देश-समाज में निरंतर प्रयास जरूरी हैं।

बदली है तस्वीर

देवताओं की दी ताकत से अगर एक अकेली दुर्गा दुष्टों से लोहा ले सकती हैं, तो बाकी स्त्रियां क्यों नहीं? इसलिए सवाल यही है कि इस ताकत को उन स्त्रियों तक कैसे पहुंचाया जाए, जो कम साधन संपन्न हैं, जिनका परिवार भी कई बार उनकी राह में दीवार बनकर खड़ा हो जाता है, तरह-तरह के रोड़े अटकाता है। हालांकि अब बदलाव भी देखने को मिलता है।

यह वह दौर नहीं है, जिसे हमारी दादी-नानियों ने जीवन भर भोगा और उफ न कर सकीं। परिवार और समाज ने उन्हें कभी शक्तिवान नहीं समझा। वे हमेशा रोने-बिसूरने को मजबूर रहीं।

आज की महिलाएं उस पीढ़ी से बहुत आगे निकल गई हैं। अब शायद ही कोई लड़कियों को पढ़ाने-लिखाने और उनके आगे बढ़ने का विरोध करता हो। तभी तो एक ‘दंगल’ फिल्म क्या आती है, हरियाणा में लड़की पहलवानों के लिए अनेक अखाड़े खुल जाते हैं और वहां की लड़कियां अंतरराष्ट्रीय स्पर्धाओं में अपने परचम लहराती हैं। ध्यान से देखें तो यह उस परिवार की ताकत ही है, जिसके सहारे वे अपने सपनों को पूरा करती हैं।

स्त्री के विकास में अहम भूमिका परिवार की

इन दिनों अकसर इस बात का शोर सुनाई देता है कि लड़कियों और स्त्रियों की राह में परिवार सबसे बड़ी बाधा है, जबकि यह सच नहीं है। आज भी ऐसा कोई संस्थान नहीं बन सका, जो परिवार की तरह हो और स्त्रियां वहां सुरक्षित महसूस कर सकें। परिवार में मुश्किलें हो सकती हैं, उन्हें दूर भी किया जा सकता है लेकिन परिवार को सिरे से नकारना ठीक नहीं है।

स्त्री का अकेली रहना, आत्मकेंद्रित होना, सिर्फ अपने ही बारे में सोचना, यह ठीक नहीं है। अकेलापन चाहे दूर से कितना भी अच्छा लगे, कितने भी आजादी के सुनहरे सपने दिखाए लेकिन अकेले रहकर भी आप अकेले नहीं होतीं। जीवन है, तो समाज है। उसकी जरूरत भी है। और इस जरूरत का अहसास तब होता है, जब कोई विपत्ति आती है।

जब आप किसी मुसीबत में पड़ती हैं, तो सबसे पहली गुहार अपने परिवार की तरफ ही लगाती हैं। परिवार जैसी इकाई मोतियों की माला की तरह होती है। हर मोती अलग रूप-रंग का हो सकता है, लेकिन उन सबको मिलाकर ही एक माला बनती है, जो आसानी से नहीं टूटती। यानी परिवार की कड़ियां अगर जुड़ी रहें तो वह स्त्री को अधिक ताकत सौंपती हैं।

जिस परिवार के खिलाफ पश्चिमी देशों ने इतने आंदोलन चलाए और उसे तहस-नहस किया, वही लोग आज पुकार रहे हैं कि अगर समाज को बचाना है, बच्चों को नशे की लत से दूर करना है, उन्हें अपराधी और आतंक की राह से मोड़ना है, तो परिवार को वापस लाओ। इसलिए हर स्त्री के लिए परिवार वह छाया है, जिसके तले उसका सर्वांगीढ़ विकास होता है।

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स्त्रियां संजोएं परिवार की शक्ति

परिवार की शक्ति को महिलाओं को उसी तरह संजोना चाहिए, उसकी कीमत पहचाननी चाहिए, लड़ाई के मुकाबले सहमति से आगे बढ़ना चाहिए, जैसे कि दुर्गा ने सबके भाग लेकर अपनी ताकत को बढ़ाया और सर्वशक्तिमान देवी दुर्गा कहलाईं। क्योंकि लड़ाई से कोई समस्या हल नहीं होती। बड़े से बड़े युद्ध के बाद भी लड़ाई रोकनी पड़ती है।

हां, अन्याय हो तो विरोध ठीक है, लेकिन मामूली बातों को अपने आत्मसम्मान से जोड़ना और उसके लिए आपसी कलह, वाद-विवाद, छोटा-बड़ा ठीक नहीं है। आखिर प्यार और हितैषी होकर ही इस दुनिया को जीता जा सकता है।

प्यार करें तो प्यार मिलता है, दूसरे का सम्मान करें तो सम्मान। एक हाथ दूसरे को झटकने के मुकाबले स्नेह से पकड़ें तो यह दुनिया सभी स्त्रियों के लिए कितनी सुंदर हो सकती है। इस नवरात्र पर क्यों न हम ऐसा कुछ करें कि हम भी खुश हों और बाकी सब भी।

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