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सिर्फ महिलाएं ही पढ़ें ये खबर, हो सकती हैं ये जानलेवा बीमारियां

मोटापे की समस्या किसी के लिए भी ठीक नहीं है। लेकिन महिलाओं में इसके साइड इफेक्ट्स ज्यादा देखने को मिलते हैं। उन्हें कई ऐसी बीमारियां मोटापे की वजह से हो जाती हैं, जिनसे वह ताउम्र परेशान रहती हैं। जानिए, मोटापे की समस्या से किस तरह की स्वास्थ्य समस्याएं होती हैं और इनका उपचार कैसे संभव है।

सिर्फ महिलाएं ही पढ़ें ये खबर, हो सकती हैं ये जानलेवा बीमारियां

आज दुनिया भर में हर तीसरा-चौथा व्यक्ति, खासकर महिलाएं मोटापे का शिकार हैं, हालांकि इस समस्या को गंभीर बीमारी की श्रेणी में नहीं गिना जाता है, लेकिन मोटापा दूसरी कई शारीरिक- मानसिक बीमारियों की वजह जरूर है। इसके कारण हार्मोनल डिसबैलेंस की समस्याएं महिलाओं को सबसे ज्यादा होती हैं।

महिलाओं में मोटापे के कारण:

मोटापा यानी ओबेसिटी एक मेटाबॉलिक सिंड्रोम है। इस समस्या के कारणों में बदलती जीवनशैली, खान-पान की गलत आदतें, जंक फूड का ज्यादा सेवन, एक जगह बैठ कर काम करना, आलस्य या शारीरिक गतिविधियों की कमी शामिल हैं। इसके अलावा जेनेटिक कारण भी हो सकते हैं।

हर उम्र में अलग समस्या मोटापे की समस्या किसी भी आयु वर्ग की महिला को हो सकती है। यंग और मिड एज की महिलाओं में मोटापे की वजह से दो तरह की समस्याएं देखने को मिलती हैं, पॉलीसिस्टिक ओवेरियन सिंड्रोम (पीसीओएस) नॉन प्रेग्नेंसी।

कई बार इसकी वजह से 11-12 साल की उम्र की लड़कियों को पीरियड्स शुरू हो जाते हैं। लेकिन यह रेग्युलर नहीं रह पाते, कभी-कभी तो 2-3 महीने के लिए बंद भी हो जाते हैं। दरअसल, हार्मोनल डिसबैलेंस की वजह से पीरियड्स तो होते हैं,लेकिन ओवरी में एग्स का ओव्यूलेशन ठीक से नहीं हो पाता है।

ओव्यूलेशन की इस स्टेज को एम्नोरिया कहा जाता है। इस दौरान टेस्टोस्टेरॉन हार्मोन की भी अधिकता हो जाती है, जिससे मुंहासे, चेहरे और शरीर पर अनचाहे बाल जैसी समस्याएं होती हैं।

कुछ युवा महिलाएं मोटापे की वजह से डिप्रेशन की शिकार भी हो जाती हैं। साथ ही हार्मोनल डिसबैलेंस की समस्या भी उन्हें हो सकती है। ऐसी महिलाओं में एग्स का ओव्यूलेशन कम होने से उन्हें कंसीव करने में प्रॉब्लम आती है,जिसे इंफर्टिलिटी कहा जाता है।

तमाम दिक्कतें होने के बावजूद अगर वे कंसीव कर भी लेती हैं तो कई बार भ्रूण का विकास ठीक तरह से नहीं हो पाता और गर्भपात होने की संभावना रहती है। मोटापे से ग्रस्त कुछ गर्भवती महिलाओं में ब्लड शुगर का लेवल बढ़ जाता है यानी, गर्भवती महिलाओं को जेस्टेशनल डायबिटीज मेलाइटिस होने से दिक्कतें और बढ़ सकती हैं।

इसमें मां और बच्चे का वजन बहुत तेजी से बढ़ता है। इससे कुछ बच्चों की यूटेरस में ही डेथ हो सकती है या बच्चा प्री-मैच्योर भी पैदा हो सकता है। जेस्टेशनल डायबिटीज मेलाइटिस के केस में बच्चे की डिलीवरी के समय भी प्रॉब्लम होती है।

डिलीवरी या तो सिजेरियन ऑपरेशन से की जाती है या फिर इंस्ट्रूमेंटल फोर्सअप डिलीवरी करनी पड़ती है। ऑपरेशन के दौरान ऐसी महिला को एक्स्ट्रा ब्लीडिंग हो सकती है। जेस्टेशनल डायबिटीज वाली प्रेग्नेंट महिलाओं को भविष्य में डायबिटीज दोबारा होने का खतरा भी रहता है।

मेनोपॉज की स्थिति पर पहुंची ऐसी महिलाएं, जिनका वजन ज्यादा होता है, उन्हें एंडोमेंट्रियल यूटराइन कैंसर, ब्रेस्ट कैंसर होने का रिस्क बढ़ जाता है। इससे कोलेस्ट्रॉल लेवल बढ़ जाता है, हाई ब्लड प्रेशर का ज्यादा खतरा रहता है और ऑस्टियोआर्थराइटिस भी हो सकता है।

हार्मोनल डिसबैलेंस की वजह से पीरियड्स इररेग्यूलर होने से यूटेरस की अंदरूनी लाइनिंग धीरे-धीरे मोटी होती जाती हैं। इससे एब्नॉर्मल ब्लीडिंग होती है, जो बहुत हैवी और कभी-कभी ब्लड क्लॉट्स लिए हुए होती है।

मोटापा कम करने के उपाय:

डॉक्टर्स मोटापे से ग्रस्त महिलाओं की काउंसलिंग करते हैं और वजन कम करने के हेल्दी-एक्टिव लाइफस्टाइल और बैलेंस्ड डाइट अपनाने की हिदायत देते हैं।

इसके अलावा डॉक्टर कुछ दवाएं भी देते हैं, जिनसे उन्हें भूख कम लगती है और कम खाने से वजन धीरे-धीरे कम होता है। कई बार डॉक्टर बेरिएट्रिक सर्जरी कराने की सलाह भी दे सकते हैं।

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