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पैरेंट्स अपने बच्चों के लाइफस्टाइल को ऐसे रखें हेल्दी

आज के बच्चे फास्टफूड और अनहेल्दी डाइट पर अधिक पसंद करते हैं।

पैरेंट्स अपने बच्चों के लाइफस्टाइल को ऐसे रखें हेल्दी

आजकल एडल्ट्स तो अपनी हेल्थ और फिटनेस पर बहुत ध्यान देते हैं लेकिन बच्चों-किशोरों की हेल्थ-फिटनेस पर उतना ध्यान नहीं दिया जाता, जितना दिया जाना चाहिए, जबकि यह उनके फ्यूचर के लिए बहुत जरूरी है।

इसलिए पैरेंट्स बच्चों को ऐसी लाइफस्टाइल दें, जो उनकी हेल्दी लाइफ के लिए जरूरी है, इसके लिए कुछ बातों का ध्यान रखना बहुत जरूरी है।

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यह बात किसी से छुपी हुई नहीं है कि आज के बच्चे फास्टफूड और अनहेल्दी डाइट को अधिक पसंद करते हैं। वे टेलीविजन-कंप्यूटर पर अपना इतना ज्यादा समय गुजारते हैं कि फिजिकल एक्सरसाइज के लिए समय ही नहीं बचता है।
इस वजह से बच्चों में मोटापा निरंतर बढ़ता जा रहा है। इस खराब जीवनशैली के कारण बच्चों में अन्य रोग भी देखने को मिल रहे हैं, जो वास्तव में चिंता का विषय है।
यह धारणा भी गलत है कि बच्चे चारों ओर घिरे हुए तनाव से प्रभवित नहीं होते। वास्तविकता यह है और जो शोधों से भी साबित होती है कि अपने आस-पास के तनाव से बच्चे भी प्रभवित होते हैं।

स्वास्थ्य को प्रभवित करने वाले कारक

प्रतिस्पर्धात्मक शिक्षा की मांग, टेक्नोलॉजी के बढ़ते प्रभव, खुली जगहों की कमी या उनकी सीमित उपलब्धता, सुरक्षा चिंताएं, आसानी से उपलब्ध फास्टफूड/जंकफूड के विकल्प, घर/स्कूल का बदलता वातावरण और इन जरूरतों को पूरा करने वाले लोगों की अज्ञानता, यह तमाम ऐसे कारक हैं, जिन पर ध्यान देने की जरूरत है।

पैरेंट्स के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि आजकल बच्चे खेलकूद की गतिविधियों से खुद को दूर रखते हैं, ऐसे में उन्हें किस तरह खेलकूद की गतिविधियों की तरफ मोड़ने के लिए प्रेरित किया जाए?

स्थितियां हो गई हैं भिन्न

पैरेंट्स अपना बचपन याद करें तो ध्यान आएगा कि उनका ज्यादातर समय बड़े समूह के साथ आउटडोर गेम्स खेलते हुए गुजरा था। उस समय मोबाइल फोन, आॅनलाइन गेमिंग और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने धावा नहीं बोला था। इस खेलकूद के अतिरिक्त स्पोर्ट्स में भी हिस्सा लिया जाता था।

आमतौर से हम पैदल चलते थे, साइकिल पर जाते थे और जहां चाहते थे, वहां दौड़ लगा लेते थे। आज के मानकों के अनुसार तो वह लंबी दूरी की दौड़ थी। हमारे सोने और जागने के पैटर्न भी टाइम टेबल के अनुसार थे, क्योंकि हमारा मन भटकाने के लिए बहुत सी चीजें मौजूद ही नहीं थीं।

आज की स्थितियां एकदम भिन्न हैं। स्कूल में शिक्षा और करियर में गला काट प्रतिस्पर्धा है, जिससे पैरेंट्स भी परेशान हैं और बच्चे भी तनावग्रस्त हैं, खासकर टाइट शेड्यूल से। खेलने-कूदने के लिए तो समय नाम की कोई चीज है ही नहीं। इस बात पर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है कि बच्चों का खेलना स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए जरूरी है।

वयस्कों जैसी हो गई है आज के बच्चों की स्थिति

आज के बच्चों की स्थिति वयस्कों जैसी हो गई है। उन्हें पर्याप्त नींद नहीं मिल पा रही है। लैपटॉप, स्मार्टफोन, टीवी आदि की वजह से उनके दिल और दिमाग दोनों की (आंतरिक जैविक घड़ी) बिगड़ गई है, जिससे उनका दिमाग अधिक सक्रिय रहता है और उन्हें पर्याप्त नींद नहीं मिल पाती है।

विशेषज्ञों का कहना है कि किशोरों को भी कम से कम 8 घंटे की नींद दिन में मिलनी चाहिए। पूरे सप्ताह की व्यस्त दिनचर्या के कारण पर्याप्त नींद न ले पाना और उसे सप्ताहांत पर पूरा करना एक आम सी बात हो गई है।

इससे बच्चा सप्ताह के शुरू में तो तरोताजा महसूस करता है, लेकिन इससे जो नुकसान होते हैं, उनकी भरपाई नहीं हो पाती। पर्याप्त नींद और आराम का न मिल पाना हमारे प्रदर्शन और स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर डालता है। इसकी वजह से बच्चे पढ़ाई पर ध्यान नहीं लगा पाते, मानसिक और शारीरिक थकान महसूस करते हैं।

गलत डाइट का असर

पौष्टिक आहार ना मिल पाना बच्चों के लिए एक अन्य बड़ी चुनौती है। सही समय पर खाना न खाना, बहुत ज्यादा जंक फूड का सेवन करना, जिसमें शुगर या नमक की मात्रा ज्यादा होती है, डिब्बाबंद जूस, सोडा, कंफेक्शनरी, चॉकलेट, प्रोसेस्ड फूड आदि का सेवन करना, बच्चों की सेहत से खिलवाड़ करने जैसा ही है।

बच्चों को उनकी आयु के अनुसार पौष्टिक आहार देने की आवश्यकता है, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि उनका भोजन उनके शरीर में आने वाले बदलावों और उनकी गतिविधियों के अनुरूप है। जो बच्चे वजन की समस्या से जूझ रहे हैं, उनके लिए आप उसी योजना का इस्तेमाल नहीं कर सकते, जो वयस्कों के लिए की जाती है।

बच्चों की सोच प्रक्रिया अलग होती है, उनकी जरूरतें भी अलग होती हैं। उनके लिए विकल्प, उनके अनुसार होने चाहिए ना कि वयस्कों की डाइट भी उन पर थोप दी जाए। अब सवाल यह है कि आधुनिक युग की जो सीमाएं हैं, बच्चों पर जो ध्यान नहीं दिया जा रहा है, इसके संदर्भ में क्या किया जा सकता है?

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क्या करें पैरेंट्स

सबसे पहली बात तो यह है कि शुरुआत परिवार ईकाई के रूप में की जाए। पूरे परिवार को शारीरिक गतिविधियों में नियमित मनोरंजन के तौरपर शामिल होना चाहिए न कि कठिन रूटीन एक्सरसाइज के रूप में, खासकर जब वजन बढ़ जाए या स्वास्थ्य समस्याएं सामने आने लगें।

अपने बच्चों के साथ मिलकर खेलें-कूदें और इसमें अपने जैसे ही वयस्कों और बच्चों को भी शामिल कर लें। जब समूह बड़ा होता है तो चीजें अधिक मनोरंजक हो जाती हैं और बच्चों को सक्रिय लोगों से जुड़ने में अच्छा लगता है। उन चीजों पर ध्यान दें, जो नींद को प्रभवित कर रही हैं। इसीलिए टीवी कभी बेडरूम में नहीं रखना चाहिए।

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