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नए-नए खाने को कहना ''न'', मतलब आपके बच्चे को है ये बीमारी

नए-नए खाने को खाने से बच्चों का मना करना खराब पेरेंटिंग की निशानी नहीं होती है।

नए-नए खाने को कहना
नई दिल्ली. अक्सर देखा जाता है कि कुछ बच्चे किसी चीज को बेहद आसानी से खा लेते हैं तो वहीं कुछ बच्चे इसे खाने से बहुत कतराते हैं। क्या इस बारे में कभी जानने की कोशिश की है नहीं न। कई बार बच्चों का खाना नहीं खाने को पेरेंट्स की गलती बताई जाती है लेकिन वास्तव में ऐसा कुछ भी नहीं होता है, बच्चों का खाने के प्रति ऐसा व्यवहार फूड नियोफोबिया होता है। क्या आपका बच्चा भी खाने के समय दिखाता है नखरा तो जान लें यह बात।
चाइल्ड साइकोलॉजी और साइकिएट्री र्जनल में लिखते हुए उन्होंने कहा, जन्म के कुछ दिनों बाद बच्चें नए-नए तरह के खानों के संपर्क में आते हैं, कुछ तो उन्हें खाने के लिए तैयार हो जाते हैं लेकिन कुछ कतराते हैं। इस स्टडी में जुड़वा बच्चों को इसलिए शामिल किया गया क्योंकि जुड़वा बच्चे एक तरह के माहौल में पले-बढ़े होते हैं। एक ही पेरेंट्स दोनों को पालते हैं।
एक अध्ययन में यह बात सामने आई है कि बच्चों की खाने की आदत उनके जेनेटिक्स पर निर्भर करता है ना कि पेरेंटिंग पर। यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के वैज्ञानिकों ने 1,900 जुड़वा बच्चो के खाने की आदत पर अध्ययन किया। 16 महीनों के बच्चों ने अलग-अलग खाने की तरफ अपनी चिलचस्पी दिखाई।
बच्चों का खाने के लिए नखरे दिखाना खराब पेरेंटिंग का परिणाम माना जाता है। नए तरह के खाने को खाने से कतराने को फूड नियोफोबिया कहा जाता है। अध्ययन के मुताबिक, यह खराब पेरेंटिंग की वजह से नहीं बल्कि जीन्स की वजह से होती है। लेकिन इसका यह मतलब नहीं होता कि बच्चों की आदतों को बदला नहीं जा सकता। बच्चों की इन आदतों से पेरेंट्स काफी तनाव में आ जाते हैं। लेकिन इससे परेशान होने की जरूरत नहीं है क्योंकि समय के साथ बच्चों की यह आदतें बदल जाती हैं।
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