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स्टेम सेल ट्रांसप्लांट, जानिए कैसे संभव है आईएलडी ट्रीटमेंट

आईएलडी ट्रीटमेंट संभव है इलाज, जानिए कैसे

स्टेम सेल ट्रांसप्लांट, जानिए कैसे संभव है आईएलडी ट्रीटमेंट
इंटरस्टीशियल लंग डिजीज
लंग्स फाइब्रोसिस यानी आईएलडी आजकल के पॉल्यूशन भरे माहौल से उपजी डिजीज है। इससे लंग्स में लचीलापन कम हो जाता है, जिससे परेशानी होने लगती है। प्रकृति प्रदत्त फेफड़े से हम सभी सांस लेकर जीवन जीते हैं। वातावरण की ऑक्सीजन को शरीर में लेकर फेफड़े जीवन को स्पंदित करते रहते हैं। लेकिन वातावरण में फैले प्रदूषण के कारण इसे नुकसान भी पहुंचता है। हालांकि प्रकृति ने शरीर में हाने वाले नुकसान को ठीक करने के लिए भी हर जीव के शरीर में एक प्रणाली विकसित कर मरम्मत का प्रबंध भी किया है। वातावरण में फैले प्रदूषण से होने वाले नुकसान से फेफड़े की भी मरम्मत का कार्य शरीर करता रहता है। लेकिन ऐसा बार-बार और सीमा से कुछ ज्यादा ही होने लगे तो कठिनाई उत्पन्न हो जाती है। शरीर की प्रतिरोधक क्षमता पर नकारात्मक प्रभाव के अलावा अंगों पर प्रतिकूल असर पड़ता है। फेफड़े में होने वाली इसी अतिरिक्त मरम्मत से होने वाली बीमारी को आईएलडी (इंटरस्टीशियल लंग डिजीज) कहते हैं।
क्या है आईएलडी
प्राय: फेफड़े की कोशिकाएं अपने आप को हमेशा रिपेयर करती रहती हैं, जिससे उनका लचीलापन बना रहे और वातावरण में मौजूद ऑक्सीजन की पर्याप्त मात्रा रक्त में पहुंचती रहे। फेफड़े की रिपेयरिंग की यह प्रक्रिया अगर सामान्य रहती है तो इस पर कोई असर नहीं पड़ता लेकिन जब यह रिपेयरिंग जरूरत से ज्यादा हो जाए या जब इम्यून सिस्टम जरूरत से ज्यादा सक्रिय हो जाए, तो उसका लचीलापन खत्म हो जाता है और सांस फूलने के साथ-साथ सूखी खांसी भी आने लगती है। लचीलापन खत्म हो जाने से उत्पन्न होने वाली समस्या को आईएलडी कहा जाता है।
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