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अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस 2018: डायबिटीज के लिए रामबाण का काम करेंगे ये योग

अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस (21 जून, 2018) पर पूरा देश एक साथ योग करेगा। अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के मौके पर हम आपको डायबिटीज के मरीजों के लिए योगासन बताने जा रहे हैं। डायबिटीज कई कारणों से हो सकता है। इससे बचने के लिए आप योगासन का सहारा ले सकते हैं।

अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस 2018: डायबिटीज के लिए रामबाण का काम करेंगे ये योग

अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस (21 जून, 2018) पर पूरा देश एक साथ योग करेगा। अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के मौके पर हम आपको डायबिटीज के मरीजों के लिए योगासन बताने जा रहे हैं। मधुमेह (डायबिटीज) यानी मीठा जहर, जो आपको लील लेता है। इस रोग का कारण एक नहीं, कई हैं। चाहे तनावग्रत रहना, भागमभाग वाली जीवनशैली, वक्त-बेवक्त खाने का सेवन, अनुचित भोजन का सेवन, व्यायाम की कमी हो।

आमतौर पर यह रोग जीवनशैली के कारण होता है। समय रहते इन कारणों को रोका नहीं जाए, तो मधुमेह जटिल रोग बन शरीर को नुकसान पहुंचा सकता है, जैसे आंखों की रोशनी का समाप्त होना, हड्डियों का गलना, गुर्दे का काम न करना, असमय दांतों का टूटना, गूदा व मूत्र संबंधी रोग आदि।

इससे निदान पाने के लिए नियिमत चिकित्सा के अलावा जीवनशैली में परिवर्तन लाना अति आवश्यक है। खासतौर से हम महिलाओं को। अपनी ओर नजरअंदाज रवैया अपनाते हुए हम रात-दिन हम घर-परिवार के बिना रुके खिदमत में मश्गूल रहती हैं।

नतीजतन मीठा जहर अंदर ही अंदर हमें खोखला कर देता है। समय से पहले सचेत हो जाएं। इसको खात्मा करने के लिए जीवनशैली में योग को जोड़ें और उसके प्रति अनुशासित रहें।

नियमित योग क्रियाओं को नियमित सुबह या शाम योगासन करने से मधुमेह का सामना किया जा सकता है। जानें मधुमेह में योगिक क्रियाएं-

अर्द्ध मत्स्येन्द्रासन

योगी गोरखनाथ के गुरू स्वामी मत्स्येन्द्रनाथ इस आसन में बैठा करते थे। हालांकि यह एक दुष्कर आसन है इसलिए इसे सरल करके अर्द्ध मत्स्येन्द्रासन का नाम दिया गया है।

करने का तरीका

  • सबसे पहले जमीन पर बैठकर बाएं पांव की एड़ी को दाएं तरफ से लाकर नितम्बों के पास लाएं, ताकि एड़ी का हिस्सा नतम्बों को छुएं।
  • उसके बाद दाएं पांव को बाएं पांव के घुटने के पास जमीन पर पांव के पंजे को जमाकर रखें।
  • फिर बार्इं भुजा को वक्षस्थल के पास लाकर कांख के हिस्से को दाए पांव के घुटने के नीचे जंघा के ऊपर स्थापित करें।
  • अब दाएं हाथ को पीछे की तरफ से कमर को लपेटकर और नाभि को छूने का प्रयास करें।
  • मेरूदंड को अपने अवलंब पर पूरा मोड़ दें, ताकि दोनों कंधे एक रेखा में हो जाएं।
  • जितना अधिक आप मोड़ देंगे, उतना अधिक लाभ होगा। कुछ देर इसी अवस्था में रुकें।
  • इसी प्रकार इस आसन को दूसरी ओर से टांग और हाथ को बदल कर करें।
  • दोनों ओर से कम से कम 2-2 बार अवश्य करें। श्वास की गति सामान्य रहेगी।

पश्चिमोत्तासन

पश्चिम अर्थात पीठ का भाग, उत्तान अर्थात खिंचाव। इस आसन से पीठ के पृष्ठ भाग पर खिंचाव पड़ता है इसलिए हमारे योगियों ने इसका नाम पश्चिमोत्तासन रखा है।

करने का तरीका

  • सबसे पहले जमीन पर बैठकर दोनों पैरों को सामने की ओर फैलाकर बैठ जाएं।
  • एड़ियां और अंगूठों को आपस में मिला दें।
  • अब लंबा गहरा श्वास भरकर दोनों हाथों को ऊपर की ओर ले जाएं और श्वास छोड़ते हुए सामने की ओर झुक जाएं।
  • दोनों हाथों से दोनो पैरों के अंगूठों को पकड़ने का प्रयास करें।
  • पेट को अंदर की ओर पिचकाएं और फिर कमर से झुकते हुए नाक को घुटनों पर लगाने का प्रयास करें।
  • ध्यान रहे घुटने जमीन से ऊपर नहीं उठने चाहिए।
  • कुछ देर अपनी क्षमतानुसार इस आसन में रुकें।
  • यह इस आसन का एक चक्र हुआ। कम से कम 5 चक्रों का अभ्यास करें।

भुजंगासन

इस आसन में शरीर की आकृति फन उठा, भुजंग यानी सॉप के समान होती है, इसलिए हमारे योगियों ने इसका नाम भुजंगासन रखा है।

करने का तरीका

  • इसे करने के लिए जमीन पर पेट के बल लेट जाएं, एड़ियां, पंजे और जंघा आपस में मिले हुए होने चाहिए।
  • पंजे बाहर की ओर तान कर रखें, दोनों हाथों को कंधों की बगल में रखें, कोहनियां जमीन को स्पर्श करती हुई होनी चाहिए।
  • अब कमर तक के भाग को हाथों का सहारा लेते हुए धीरे-धीरे ऊपर की ओर उठाएं।
  • ऐसा करते समय दोनों कोहनियां मुड़ी हुई व गर्दन पीछे की ओर रहेगी।
  • कुछ देर इसी अवस्था में रुकें और धीरे-धीरे समान्य अवस्था में वापस आएं।
  • ध्यान रहे इस आसन को करते वक्त श्वास की गति समान्य होनी चाहिए।
  • इस आसन के कम से कम 5 चक्रों का अभ्यास अवश्य करें।

शवासन

इस आसन में हमारे शरीर की आकृति शव-नुमा या फिर मरे हुए व्यक्ति जैसी होती है, इसलिए हमारे योगियों ने इसका नाम ‘शवासन’ रखा है।

करने का तरीका

  • इस आसन में पीठ के बल लेट जाएं। समस्त अंगों तथा मांस-पेशियों को एकदम ढीला छोड़ दें।
  • शरीर के एक-एक अव्यव व कोशिका को तनाव रहित कीजिए।
  • कहीं पर भी अकड़न या तनाव नहीं रहना चाहिए। मन और मस्तिष्क को विचार शून्य करते हुए धीरे-धीरे गहरी सांस लीजिए और छोड़िए।
  • सांसे जितनी गहरी और शांत होगी और शरीर जितना ढीला होगा, उतना ही शीघ्र लाभ मिलेगा।
  • इस आसन का अभ्यास रोज कम से कम 10 मिनट तक अवश्य करें।

उष्ट्रासन

इस आसन में शरीर की आकृति बैठे हुए ऊंट के समान होती है। इसलिए हमारे योगियों ने इसका नाम उष्ट्रासन रखा है।

करने का तरीका

  • सबसे पहले वज्रासन में बैठ जाएं। उसके बाद घुटनों पर खड़े हो जाएं। दोनों घुटने का फासला कंधे के चौड़ाई के समान्तर हो जाएं।
  • दोनों हाथों को कमर पर रखें। फिर लंबा गहरा श्वास भरते हुए कमर तक के भाग को धीरे-धीरे पीछे की ओर मोड़ने का अभ्यास करें।
  • जब कमर से ऊपर का हिस्सा मोड़ने लगे, उसी समय दोनों हाथों से अपने पैरों की पिंडलियों को पकड़ लें या फिर दोनों हाथों को पैरों के तलवे पर रखें।
  • जब तक आसानी पूर्वक श्वास रोक कर आसन में रुक सकें रुकें ना रोक पाने की स्थिति में धीरे-धीरे श्वास का रेचन कर अपने शरीर को सीधा करें और समान्य अवस्था में आएं।
  • यह इस आसन का 1 चक्र हुआ, कम से कम 3 चक्रों का अभ्यास करें।

धनुरासन

इस आसन में हमारे शरीर की आकृति धनु यानी धनुष के समान हो जाती है इसलिए योगियों ने इसका नाम धनुरासन रखा है।

करने का तरीका

  • सबसे पहले पेट के बल लेट जाएं और घुटनों तक अपनी टांगें मोड़ लें।
  • दोनों हाथों से अपनी टखने पकड़ लें, पांचों अंगुलियों को एक तरफ रखें।
  • अब अपने पैरों के टखने पकड़ लें। पैरों को बाहर की ओर खोलते हुए श्वास का रेचन करते (यानी छोड़ते) हुए घुटनों को ऊपर उठाएं।
  • हमारे शरीर को धनुष नुमा बनाएं। ज्यादा से ज्यादा शरीर को ऊपर की ओर तानें।
  • ऐसा करने से पेट का भाग जमीन को छुएगा।
  • जब तक आप आसानी पूर्वक श्वास रोककर इस आसन में रह सकते हैं रहें, ना रोक पाने पर श्वास निकालते हुए वापस आएं।
  • यह इस आसन का एक चक्र हुआ, कम से कम 3 से 5 चक्रों का अभ्यास करें।

कपालभाति प्राणायाम

योगियों ने कहा है कि इस प्राणायाम से हमारे मस्तिष्क या फिर सिर के अग्रभाग में रोशनी प्रज्जवलित होती है और हमारे अग्रभाग की शुद्धि होती है। इसे कपाल शोधन प्राणायाम भी कहा जाता है।

करने का तरीका

  • सबसे पहले जमीन पर पद्मासन या फिर सुखासन की अवस्था में बैठें।
  • फिर पूरे बल से नासिका से सांस को बाहर फेंकें।
  • श्वास लेने का प्रयास न करें, श्वास स्वत: आ जाएगा।
  • जब श्वास बाहर निकलेगा उसी समय हम अपने पेट का संकुचन करेंगे।
  • पहले धीरे-धीरे इसका अभ्यास करें, उसके बाद धीरे-धीरे श्वास छोड़ने और पेट के संकुचन की गति बढ़ा दें।
  • शुरू-शुरू में नए अभ्यासी कम से कम 20 चक्रों का अभ्यास करें।
  • एक सप्ताह उपरांत 50 चक्रों तक अभ्यास को बढ़ा दें।
  • ध्यान रहे कमर और गर्दन सीधी होए आंखें बंद हो (या खोलकर भी अभ्यास कर सकते है)। दोनों हाथ ज्ञान मुद्रा में हो।

भस्त्रिका प्राणायाम

भस्त्रिका का मतलब है धौंकनी। इस प्राणायाम में सांस की गति धौकनी की तरह हो जाती है। यानी श्वास की प्रक्रिया को जल्दी-जल्दी करना ही कहलाता है भस्त्रिका प्राणायाम।

करने का तरीका

  • इसे करने के लिए सबसे पहले पद्मासन या फिर सुखासन में बैठ जाएं।
  • कमर, गर्दन, पीठ एवं रीढ़ की हड्डी को सीधा रखते हुए शरीर को बिल्कुल स्थिर रखें।
  • इसके बाद बिना शरीर को हिलाएं। दोनों नसिका छिद्र से आवाज के करते हुए श्वास भरें।
  • फिर आवाज करते हुए ही श्वास को बाहर छोड़ें। अब तेज गति से आवाज लेते हुए सांस भरें और बाहर निकालें।
  • यही क्रिया भस्त्रिका प्राणायाम कहलाती है। हमारे दोनों हाथ घुटने पर ज्ञान मुद्रा में रहेंगे और आंखें बंद रहेंगी।
  • ध्यान रहे श्वास लेते और छोड़ते वक्त हमारी लय ना टूटे। नए अभ्यासी इस क्रिया को शुरू-शुरू में 10 बार ही करें।

सावधानियां

  • योगिक क्रियाएं योग गुरु के सान्निध्य में ही करें।
  • स्लिप डिस्क, साइटिका, उच्च रक्तचाप, हृदय, हर्निया, अल्सर, मिर्गी स्ट्रोक के रोगी व गर्भवती महिलाएं योगिक क्रियाएं नहीं करें।

अपनाएं यह भी

दो चम्मच आंवला पाउडर, आधा चम्मच मेथी पाउडर, आधा चम्मच हल्दी और आधा चम्मच अश्वगंधा पाउडर को मिलाकर रोज एक चम्मच खाने से पहलें लें।

सफेद चीजों का सेवन बिल्कुल रोक दें।

(जाने माने वरिष्ठ योग गुरु सुनील सिंह से बातचीत पर आधारित)

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