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श्रीमद् भगवद्गीता में भी है योग का वर्णन, जानें योग के लिए श्री कृष्ण ने क्या-क्या कहा

अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस (International Yoga Day) (21 जून 2018) के लिए न सिर्फ भारत में बल्कि विदेशों में भी तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। योग का संबंध केवल शरीर से ही नहीं, हमारे मन, हृदय और आत्मा से भी होता है।

श्रीमद् भगवद्गीता में भी है योग का वर्णन, जानें योग के लिए श्री कृष्ण ने क्या-क्या कहा
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अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस (International Yoga Day) (21 जून 2018) के लिए न सिर्फ भारत में बल्कि विदेशों में भी तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। योग का संबंध केवल शरीर से ही नहीं, हमारे मन, हृदय और आत्मा से भी होता है।

यानी अगर हम योगमय जीवनशैली अपनाएं तो स्वास्थ्य लाभ तो मिलेगा ही, साथ ही हमारी मानसिक चेतना विकसित होगी, हम और अधिक ऊर्जावान होंगे और हम अपनी आत्मा यानी स्वयं को बेहतर तरीके से पहचान पाएंगे। इसलिए योग के मूल स्वरूप, इसकी महत्ता और इसके उद्देश्य को समझना आवश्यक है।

हाल के वर्षों में योग के प्रति लोगों की रुचि बढ़ी है लेकिन आमतौर पर योग को आसन, व्यायाम और प्राणायाम तक सीमित कर दिया जाता है। जबकि ये योग की मात्र शुरुआती कलाएं हैं और मूल रूप से शरीर को स्वस्थ रखने पर केंद्रित हैं।

यह ठीक है कि शरीर से इतर के सूक्ष्म अनुभव भी उनके लिए अधिक सुलभ होते हैं, जो शरीर से स्वस्थ हैं। किंतु यहीं पर ठहर जाना योग की प्राथमिक कक्षा में ही रह जाने जैसा है।

इसलिए, स्वयं पतंजलि ने भी अष्टांग मार्गों को जिस क्रम में रखा है, उनमें भी शारीरिक क्रियाएं प्रारंभिक चरणों में ही हैं। ध्यान और समाधि जैसे उच्चतम यौगिक अनुभव तभी हो पाते हैं, जब आप सारी शारीरिक चेष्टाएं बंद कर दें।

क्या है योग

गीता में श्री कृष्ण ने कहा है, ‘योगःकर्मसु कौशलम्’ अर्थात् योग से कर्म में कुशलता आती है। एक अन्य स्थान पर वे कहते हैं, ‘सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते’ यानी अंतःकरण की शुद्धि से ज्ञान मिले, न मिले-दोनों ही दशाओं में सम रहें, यही योग है।

पतंजलि ने चित्तवृत्तियों के निरोध को योग माना। स्पष्ट है कि योग केवल संन्यासियों का विषय-क्षेत्र नहीं है, हर संसारी व्यक्ति भी योगी हो सकता है। वास्तव में, योग हमारे दैनिक जीवन को शारीरिक और मानसिक ही नहीं, हार्दिक और आत्मिक स्तर पर भी प्रभावित करने वाली विधा है।

इन चारों स्तरों पर ही व्यक्ति का संपूर्ण अस्तित्व होता है और इनकी शुद्धता परमयोग है। यह जीवन की अनेक कठिनाइयों का कुशलतापूर्वक सामना करने और कठिनाइयों से उबरने की कला भी सिखाता है।

हमारी प्रायः सभी समस्याओं की जड़ हमारा मन है। मन का जितना विस्तार होता जाता है,आत्मा का स्थान उतना सिकुड़ता जाता है। योग से हम अ-मनी दशा की ओर बढ़ते हैं।

मन के पार जाने की कला सीखते ही ध्यान और समाधि घटित होती है, परमात्मा से साक्षात्कार होता है और परमानंद की प्राप्ति होती है।

वास्तव में योग अध्यात्म का विज्ञान है। जीवन के परम सत्य को अनुभव करने का इसके अतिरिक्त कोई मार्ग ही नहीं है। परमसत्य कोई विश्वास मात्र नहीं है।

यह एक वैज्ञानिक प्रयोग है, जो आपका अनुभव भी बन सकता है। इसी अर्थ में ओशो यहां तक कहते हैं कि बगैर श्रद्धा के भी व्यक्ति योगी बन सकता है क्योंकि विज्ञान के लिए श्रद्धा कैसी? लेकिन इस प्रयोग में वही उतर सकता है, जिसकी आंखें खुली हों।

जीवन जीने की कला

मनुष्य का होना एक ऊर्जा-क्षेत्र का होना है। केवल ऊर्जा ही है, जो कभी नष्ट नहीं होती। किंतु इस ऊर्जा का असली अनुभव केवल योगियों को हो पाता है। योगी वही है, जिसके शरीर का मन से, मन का हृदय से और हृदय का आत्मा से जुड़ाव हो गया है।

योग बुद्धि, धैर्य, पुरुषार्थ, साहस और संतुलन तो देता ही है, जीवन जीने की कला सिखाता है। यह भी ठीक से समझ लें कि योग का किसी धर्म से कोई लेना-देना नहीं है। हर परंपरा किसी न किसी व्यक्ति से ही शुरू होती है।

इस अर्थ में,यह ठीक है कि योग हिंदुओं की देन है। किंतु योगी कोई भी हो सकता है-यहां तक कि नास्तिक भी। यम, नियम, आसन, प्राणायाम,प्रत्याहार, धारणा,ध्यान और समाधि इसी अनुभूति के माध्यम हैं।

योग आपके भीतर के असमंजस को समाप्त करता है और आपकी दृष्टि को साफ करता है। जाहिर है, योगी वह नहीं है जो पानी पर चलने की सिद्धि होने का दावा करता हो।

योगी के पास आशीर्वाद अथवा शाप भी नहीं होते। जिसे अपने पास कुछ भी होने का भ्रम न रह जाए, जिसकेलिए बाहर-भीतर सब एक हो गए, वही योगी है।

हमारा जीवन बहिर्मुखी ही न हो, हमारी इंद्रियां भीतर के प्रति भी उतनी ही सजग हों, हम एक साथ ही संसारी भी हों और संन्यासी भी,यही योग है।

योग हमारे अंतःकरण को शुद्ध करता है, जिससे अदृश्य शक्तियों का सहयोग मिलता है और इसके कारण ही योगियों का व्यक्तित्व चमत्कारी प्रतीत होता है। इसलिए, जो योगी है, वही संसार को सुसंस्कृत बनाने, श्रेष्ठ बनाने में कुछ अवदान कर सकता है।

योग का उद्देश्य

उपनिषद ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ यानी अंधकार से प्रकाश की ओर जाने की बात करते हैं। अंधकार क्या है? अंधकार है अपने शरीर को ही सबकुछ समझना। प्रकाश है- शरीर से शुरू कर आत्मा में थिर हो जाना, यही योग का लक्ष्य है।

हाल के वर्षों में आसन-व्यायाम,प्राणायाम आदि का अभ्यास में लोगों की जिज्ञासा बढ़ी है किंतु यह जिज्ञासा भी रोगमुक्त होने या रोगमुक्त रहने की कला सीखने भर के लिए है किंतु योग का मूल प्रयोजन यह है ही नहीं।

योग केवल रोगियों के लिए नहीं, स्वस्थ लोगों के लिए है। खासकर आसनों का प्रतिदिन प्रयोग उनके लिए अधिक सहज है, जो बचपन से इसका अभ्यास करते रहे हैं।

अन्यथा, वयस्क होने पर मांसपेशियां और हड्डियां सख्त होने लगती हैं और शरीर को खास तरीके से मोड़ना बहुत मुश्किल हो जाता है। योग की उच्चतर विधियां इसका विकल्प हैं।

कई व्यायामों के लाभ प्राणायाम से भी मिल जाते हैं। 84 प्राणायाम प्रमुख माने गए हैं लेकिन उनमें भी अनुलोम-विलोम, भस्त्रिका, कपालभाति, उद्गीत, नाड़ीशोधन, भ्रामरी, बाह्य और प्रणव प्राणायाम का महत्व अधिक है। मुद्रा चिकित्सा योग साधना का पांचवां सोपान है।

‘घेरंड संहिता’, ‘शिव संहिता’, ‘गोरक्ष पद्धति’ आदि ग्रंथों में मुद्रा और बंध का विस्तार से उल्लेख है। बंधों में ‘मूल बंध’, ‘जालंधर बंध’ और ‘उड्डियान बंध’ का महत्व अधिक है।

महाबंध और त्रिबंध इन्हीं के संयोग से बनते हैं। मुद्राओं में ज्ञान मुद्रा, शक्ति चालिनी मुद्रा, प्राण मुद्रा, महामुद्रा, शांभवी मुद्रा, अपान मुद्रा, उन्मनी मुद्रा, अश्विनी मुद्रा, योनि मुद्रा, खेचरी मुद्रा विशेष उपयोगी हैं। खेचरी मुद्रा (जीभ को तालु से लगाना) साधना की दृष्टि से अधिक महत्वपूर्ण है।

योग और मानसिक शांति

मनोकामनाएं योग के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा हैं। इनसे जो जिस अनुपात में मुक्त है, वह योग की ओर उतनी ही सहजता से मुड़ता है। जो योगी है, वही संन्यासी भी हो सकता है।

हमें राजनीतिक नहीं, आध्यात्मिक समाज चाहिए। इसके लिए स्वाध्याय,चिंतन और सत्संग काफी नहीं है। ज्ञान के साथ कर्म भी चाहिए। अपनी आसक्तियों-आकांक्षाओं को प्रभु के चरणों में समर्पित कर जीना ही कर्मयोग है।

मन को नियंत्रित करने के लिए एकाग्रता को साधना यानी किसी एक विषय का चिंतन या अभ्यास उपयोगी है,चाहे वह एकाग्रता किसी मंत्र पर ही क्यों न हो।

धीरे-धीरे इसी एकाग्रता का उपयोग अतींद्रिय क्षमता को जागृत करने के लिए किया जा सकता है, जिससे आध्यात्मिक सफलताएं अर्जित की जा सकती हैं। यदि आप भी मन की शांति चाहते हैं, तो भीतर मुड़ना ही होगा।

भौतिक समृद्धि से शांत होने का प्रयास मृगतृष्णा ही साबित होगा। शांति तभी मिलेगी, जब आप संकल्पनाओं तक से मुक्त हो जाएं और अहंकार विदा हो।

अध्यात्म की ओर उन्मुख हुए बिना, मन शांत हो ही नहीं सकता। योगमय जीवन इसी शांति और आनंद की ओर लेकर जाता है।

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