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अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस 2018: क्रोध पर नियंत्रण से लेकर स्वस्थ तन-मन के लिए लाभकारी है योग

अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस हर साल 21 जून को मनाया जाता है। 2018 में अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस चौथी बार मनाया जाएगा। आज की भाग-दौड़ वाली जिंदगी में अधिकतर लोग अपने शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य को लेकर चिंतित रहते हैं।

अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस 2018: क्रोध पर नियंत्रण से लेकर स्वस्थ तन-मन के लिए लाभकारी है योग

अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस हर साल 21 जून को मनाया जाता है। 2018 में अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस चौथी बार मनाया जाएगा। आज की भाग-दौड़ वाली जिंदगी में अधिकतर लोग अपने शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य को लेकर चिंतित रहते हैं। भारतीय जीवनशैली की परंपरा हमेशा से ही जीवन को समग्र और संतुलित रूप से जीने की दृष्टि देती रही है।

भारतीय चिंतन और परंपरा का आधार रहा है, योग-शास्त्र। योग केवल शारीरिक व्यायाम नहीं है, वरन यह जीवन को संतुलित रूप से जीने का शास्त्र भी है।

यह निरंतर बढ़ती हुई भाग-दौड़ में व्यक्तित्व को एक ठहराव, एक गहराई देने की विद्या है। ऐसे में आज न केवल भारत बल्कि विश्व के दूसरे देश भी योग को जीवनशैली में सुधार लाने का एक प्रमुख उपाय मान रहे हैं।

योग एक ऐसी विधा है, जिससे हम अपने मन को स्थिर कर सकते हैं। जब तक मन शुद्ध और स्थिर नहीं होता, हमारा तन भी अशुद्ध रहता है।

योगाभ्यास द्वारा ही तन और मन की शुद्धि होती है और हमारा तन-मन निरोगी हो जाता है।

क्रोध पर नियंत्रण

आमतौर पर देखा गया है कि हमारी शारीरिक बीमारियों के मानसिक आधार होते हैं। उदाहरण के तौर पर क्रोध हमारे मन को विकृत करता है, जिससे हम विभिन्न प्रकार की शारीरिक बीमारियों से भी घिर जाते हैं फिर भी क्रोध से बिल्कुल अनभिज्ञ रहते हैं।

योगाभ्यास क्रोध पर नियंत्रण रखने में अहम भूमिका निभाता है। क्रोधी व्यक्ति यदि नियमित रूप से योगाभ्यास करे तो क्रोध पर अतिशीघ्र नियंत्रण और आवेगों पर संतुलन प्राप्त किया जा सकता है।

योगाभ्यास से क्रोधी व्यक्ति में सकारात्मक विचार उत्पन्न होने लगते हैं, मन परिवर्तित होने लगता है। क्रोध को नियंत्रित करने में पवनमुक्तासन सीरीज नंबर 1 और 2, शशकासन, योगमुद्रासन काफी कारगर साबित होते हैं।

तनाव से राहत

आधुनिक युग में काफी लोग तनाव के शिकार हो रहे हैं। इसका कारण भाग-दौड़, धीरज न होना, असंयम, तेजी से आगे बढ़ने की होड़ आदि हैं। वैसे तनाव का कारण कुछ भी हो सकता है जैसे मानसिक, शारीरिक, सामाजिक आदि।

बढ़ता तनाव-घटती जिंदगी, एक अटल सत्य है फिर भी लोग इसकी चपेट में आकर शरीर-मन को कमजोर बना डालते हैं। तनाव बीमारियों के निमंत्रण की पहली सीढ़ी है यानी, चिंता या तनाव आते ही बीमारियों का सिलसिला शुरू हो जाता है।

तनाव 40 प्रतिशत जिंदगी कम कर देता है और 30 प्रतिशत अधिक बीमारियां आमंत्रित करता है। आज के दौर में हर उम्र के लोग तनावग्रस्त हो रहे हैं।

तनावग्रस्त व्यक्ति को चाहिए कि वह हीन विचारों को अपने भीतर से निकालने का प्रयास करे। अपनी स्थिति और उपलब्धियों के बारे में नकारात्मक न सोचे। प्रसन्न मुद्रा में रहने का प्रयास करे।

जिस कार्य में खुशी मिले, आपको अच्छा लगे उस कार्य को अवश्य करें। स्वयं को कमजोर न समझते हुए हौसलों के साथ आगे बढ़ें। तनाव मुक्ति के लिए आवश्यक है कि हम अपनी अपेक्षाओं पर नियंत्रण रखें, अंकुश लगाएं।

सकारात्मक विचार ही तनाव से मुक्ति दिला सकते हंै। जिंदगी को कैसे बेहतर बनाया जाए, यह व्यक्ति के अपने हाथ में होता है। ऐसे में हमेशा बेहतर सोचकर ही तनाव से दूर रहा जा सकता है।

तनाव को दूर भगाने में योग बहुत उपयोगी हो सकता है। तनाव की स्थिति में पवनमुक्तासन सीरीज 1, 2 और 3, प्राणायाम, यौगिक श्वसन क्रिया, वज्रासन, उदर आसन, तितली आसन, गोमुखासन, ताड़ासन, योग निद्रा जैसे आसन कारगर हैं।

अवसाद से मुक्ति

अवसाद यानी डिप्रेशन बहुत तेजी से लोगों में फैल रहा है। इससे ग्रस्त व्यक्ति खुद को हीन महसूस करने लगता है। सफल से सफल व्यक्ति चाहे वह उच्चाधिकारी हो, सफल व्यापारी हो या कुशल गृहिणी हो, इससे ग्रस्त होने पर खुद को ऐसा समझने लगते हैं, मानो कुछ कर ही नहीं सकते हैं।

डिप्रेशन यूं तो किसी को भी हो सकता है, पर महिलाओं और संवेदनशील पुरुषों में यह अधिक पाया जाता है। यह मर्ज कोई पागलपन नहीं है और न ही लाइलाज है, यह किसी को भी हो सकता है।

यह रोग आपसी संबंधों की गड़बड़ी, किसी ΄प्रियजन की मृत्यु या किसी अन्य कारण से हानि या किसी प्रियजन का अभाव, प्रेम संबंधों का टूट जाना, किसी क्षेत्र में असफलता आदि किसी भी कारण से हो सकता है।

ऐसा व्यक्ति आवश्यकता से अधिक उदास रहता है, उसके लिए दैनिक कार्य को सही ढंग से कर पाना असंभव होता है, उन्हें गहरी नींद नहीं आती और किसी भी कार्य को तन्मय होकर नहीं कर पाता।

व्यक्ति निराशावादी हो जाता है, चिड़चिड़ा हो जाता है और उदासीन रहने लगता है। इस रोग में प्राय: रोगी इस बात की शिकायत करता है कि उसने गलतियां की हैं और कभी-कभी अपनी स्थिति के लिए दूसरों पर दोष मढ़ता रहता है।

इसका इलाज कराने में देर नहीं करनी चाहिए। डिप्रेशन के उपचार में योग काफी कारगर है। डिप्रेशन के रोगियों को योगाभ्यास सामूहिक रूप से करना लाभकारी होता है। सामूहिक रूप से योगाभ्यास करने से उनमें आत्मविश्वास पैदा होता है।

मन में सकारात्मक विचार आते हैं। ऐसा विचार मन में आते ही व्यक्ति में आत्मविश्वास की झलक दिखने लगती है। योगासन और विशेषकर मेडिटेशन मस्तिष्क के उन भागों को क्रियाशील करता है, जिससे डिप्रेशन ठीक होने में सहायता मिलती है।

डिप्रेशन से मुक्ति दिलाने में पवन मुक्तासन सीरीज नंबर 1 और 2, पद्मासन, वज्रासन, शिथिलासन, सूर्य नमस्कार, हलासन, शशकासन, भुजंगासन, शवासन, योगनिद्रा आदि काफी कारगर साबित होते हैं।

रखें ध्यान

  • योग करने के लिए सबसे अच्छा समय सूर्योदय के आधा घंटा पहले से लेकर सूर्योदय के एक घंटे बाद तक का होता है। क्योंकि उसके बाद वातावरण और हवा नीरस हो जाती है।
  • योगाभ्यास कभी भी जल्दबाजी में ना करें और जब भी करें, इसको महसूस करते हुए पूरी चेतना के साथ करें, तभी आप इसका पूरा फायदा ले पाने में सक्षम होंगे।
  • गर्भवती और पीरियड्स के दौरान महिलाएं, योग गुरु के निर्देशानुसार ही योग करें।
  • अगर आप योग के प्रति गंभीर हैं, तो अपने भोजन संबंधी आदतों को भी आपको सुधारना होगा। इसलिए भोजन ऐसा ग्रहण करें, जो पचने में ज्यादा समय न ले।
  • योग करने से पहले 2-3 गिलास पानी पी लें। किसी भी प्रकार का योगासन उचित योगाचार्य की देख-रेख में ही करें।

(योगाचार्य डॉ. सुरक्षित गोस्वामी, योगाचार्य उदयजी और दीपक तेजस्वी से बातचीत पर आधारित)

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