Hari bhoomi hindi news chhattisgarh

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 2019 : जानिए लैंगिक असमानता क्या है और कैसे ये महिला सशक्तिकरण की राह में है बाधा

घर-परिवार से लेकर समाज, देश और दुनिया में महिलाओं को सशक्त बनाने में सबसे बड़ा अवरोध लैंगिक असमानता ही है। इसके लिए आवश्यक है कि हर स्तर पर उनके प्रति जेंडर इनइक्वेलिटी (लिंग असमानता या लैंगिक असमानता) को समाप्त किया जाए। हालांकि यह एक ऐसी समस्या है, जिसके लिए लगातार लंबे समय तक प्रयास करते रहना होगा। लेकिन समाज और खासकर पुरुषों की मानसिकता को बदलकर यह किया जाना संभव है।

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 2019 : जानिए लैंगिक असमानता क्या है और कैसे ये महिला सशक्तिकरण की राह में है बाधा
X
समाज और परिवार में समानता का अधिकार हर स्त्री का मानवीय हक है। लेकिन हर मोर्चे पर दोयम दर्जा ही महिलाओं के हिस्से आया है। संघर्ष के
बावजूद कामयाबी और बराबरी का वो अधिकार आज भी उनके जीवन से नदारद है, जो उन्हें इस देश की नागरिक होने के नाते बिन मांगे मिलना चाहिए था। ऐसे में जरूरत है परिवार, समाज की सोच में ऐसे बदलाव की, जो ना केवल लैंगिक समानता लाए बल्कि पूरे परिवेश में महिलाओं के अस्तित्व की सम्मानजनक स्वीकार्यता का माहौल बनाएं।

दोयम दर्जे का दंश

संविधान से समान हक पाने के बावजूद आज भी स्त्रियां दोयम दर्जे की नागरिक बनी हुई हैं। यह स्थिति देहरी से लेकर दफ्तर तक, हर जगह मौजूद है।हमारे देश में महिलाओं को ना तो समान वेतन मिल रहा है और ना ही आर्थिक, राजनीतिक नेतृत्व में पर्याप्त प्रतिनिधित्व। इतना ही नहीं, अपने ही घर के भीतर भी उन्हें महिला होने के नाते कई तरह के भेदभाव का शिकार होना पड़ता है। इस दोहरे रवैए के चलते वे आज भी अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही हैं। गैर बराबरी की ऐसी स्थितियां ना केवल महिलाओं की दुश्वारियां बढ़ा रही हैं बल्कि उनके मन को भी ठेस पहुंचाती हैं। काबिल होने के बावजूद जिंदगी के किसी भी मोर्चे पर महिला होने के नाते पीछे छूट जाना महिलाओं के साथ यह अन्याय ही है। दुखद है कि असमानता का यह व्यवहार सशक्त होने की राह पर भी उनका मनोबल भी तोड़ता है। यह गैर बराबरी की सोच का नतीजा है कि महिलाओं के लिए सम्मान और सुरक्षा के मोर्चे पर भी हालात तकलीफदेह बने हुए हैं। घर और बाहर वे हिंसा और अपमान झेलने को विवश हैं। यही वजह है कि परिवार से लेकर परिवेश तक जेंडर इक्वेलिटी के बिना महिलाओं की बुनियादी समस्याओं का हल नहीं निकल सकता।

ग्लोबल समस्या है जेंडर इनइक्वेलिटी (लैंगिक असमानता)

भारत ही नहीं, दुनिया भर में आज भी पुरुषों और महिलाओं के बीच असमानता की खाई मौजूद है। गैर बराबरी का यह दंश ग्लोबल समस्या बना हुआ है। यही वजह है कि इस बार यूएनओ के द्वारा महिला दिवस की थीम ‘थिंक इक्वल, बिल्ड स्मार्ट, इनोवेट फॉर चेंज’ रखी गई है। जिसका उद्देश्य महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए ऐसे प्रयास किए जाने का है, जो लैंगिक असमानता की खाई भी पाट सकें ताकि दुनियाभर में स्त्रियां हर क्षेत्र में अपनी भागीदारी सुनिश्चित कर सकें। यह विषय खासकर इनोवेशन और टेक्नोलॉजी से जुड़े क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने से जुड़ा है, जो वर्किंग वर्ल्ड के लिए भी फायदेमंद हो। यकीनन श्रम शक्ति में वूमेन वर्कफोर्स का बढ़ना हर देश की बेहतरी के लिए अहम कदम है। इक्वल सोच के साथ काम-काजी दुनिया में भी महिलाओं को समान अवसर मिलें तो यह स्त्रियों के जीवन में हर मोर्चे पर बदलाव ला सकता है।

लंबा है सफर

महिलाओं के लिए इक्वेलिटी का इंसानी हक दिलाने का सफर संघर्ष भरा तो है ही, यह बदलाव लाने में काफी समय भी लगेगा। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की ताजा ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट के मुताबिक दुनियाभर में कार्यस्थल पर महिलाओं को पुरुषों की बराबरी तक पहुंचने में दौ सौ साल से ज्यादा लगेंगे। यह रिपोर्ट आर्थिक अवसरों के मामलों में महिलाओं और पुरुषों की स्थिति में भारी अंतर को सामने रखती है। इस अध्ययन के मुताबिक भारत ही नहीं,
दुनियाभर में बढ़ती आर्थिक असमानता से सबसे ज्यादा लड़कियां और महिलाएं प्रभावित हो रही हैं। वर्कप्लेस पर महिला-पुरुष समानता के मामले में दुनिया में 149 देशों की लिस्ट में भारत 108वें नंबर पर हैं। इतना ही नहीं हमारे यहां महिलाओं के श्रम को घर के भीतर भी कम ही आंका जाता है। गैरबराबरी की सोच हर जगह, हर स्तर पर देखने को मिलती है, जिसे दूर किया जाना आवश्यक है। इस बार यूएनओ ने भी अपने लक्ष्य ‘प्लेनेट 50-50’ (जिसके मुताबिक दुनिया में पुरुष और महिलाएं बराबर का हक रखें, लैंगिक समानता हो जाए) के लिए 2030 तक का समय तय किया है। इसके लिए हर उस बाधा को दूर करने के प्रयास किए जाएंगे, जो महिलाओं को बराबरी के हक से वंचित किए हुए हैं।

सोच बदलने से हो शुरुआत

जेंडर इक्वेलिटी के लिए महिलाओं के प्रति बनी सोच का बदलना जरूरी है। उस तयशुदा खांचे से बाहर आना जरूरी है, जो महिलाओं के इस मानवीय हक को छीनने वाले विचारों की बुनियाद है। बराबरी की ओर बढ़ने के लिए सोच में इस बदलाव की शुरुआत अपने घर से होनी चाहिए। बेटे-बेटी के फर्क को मिटाने और समानता की नई सोच गढ़ने की कोशिशें हर परिवार को करनी होंगी ताकि असमानता के व्यवहार को जड़ से मिटाया जा सके। महिलाओं के अस्तित्व और हर क्षेत्र में भागीदारी की स्वीकार्यता भी जेंडर इक्वेलिटी की राह आसान बना सकती है। भेदभाव भरी सोच की जगह नए विचारों को अपनाना होगा। जिनमें स्त्री-पुरुष के भेद से परे इंसानी तौर पर बराबरी की बात हो।

जेंडर इक्वेलिटी (लैगिंक समानता) के लिए

- महिलाओं की भागीदारी को मान मिले।
- घर से दफ्तर तक बदले सोच।
- क्षमता और योग्यता पर भरोसा किया जाए।
- बचपन से दी जाए समानता की सीख।
- उनके अस्तित्व की सहज स्वीकार्यता हो।
- बदलाव में भागीदार बनें पुरुष

जेंडर इक्वेलिटी (लैगिंक समानता) की मुहिम में पुरुष भी आएं साथ

जेंडर इक्वेलिटी की लड़ाई महिलाएं अकेले नहीं लड़ सकतीं। महिलाओं से जुड़े हालातों में बदलाव लाने के लिए पुरुषों की भूमिका भी अहम है। लैंगिक
समानता हासिल करने की इस लड़ाई में अपनी सोच और व्यवहार के बदलाव से लेकर सामाजिक, पारिवारिक परिवेश तक, पुरुष प्रभावी भूमिका निभा सकते हैं। लैंगिक भेदभाव को लेकर बनी धारणाओं को तोड़ने में पुरुषों की भागीदारी से हर स्तर पर बुनियादी बदलाव लाया जा सकता है। एक सहज और सम्मानजनक माहौल बनाया जा सकता है। जो स्त्रियों को समानता का मानवीय हक दे। उनके अस्तित्व को आर्थिक, सामाजिक और पारिवारिक स्तर पर बराबरी का मान दे।

और पढ़े: Haryana News | Chhattisgarh News | MP News | Aaj Ka Rashifal | Jokes | Haryana Video News | Haryana News App

Next Story