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अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 2019 थीम ‘बैलेंस फॉर बैटर’ से खत्म होगा महिलाओं से भेदभाव

International Women''s Day 2019 Theme : इस साल अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 2019 की थीम ‘बैलेंस फॉर बैटर’ (International Women''s Day 2019 Theme Balance For Better) रखी गई है। इसके तहत पूरे साल लैंगिक संतुलन और समानता के लिए प्रयास किए जाएगें ताकि महिलाओं की स्थिति बेहतर हो।

अंतर्राष्ट्रीय  महिला दिवस 2019 थीम ‘बैलेंस फॉर बैटर’ से खत्म होगा महिलाओं से भेदभाव
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International Women's Day 2019 Theme : इस साल अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 2019 की थीम ‘बैलेंस फॉर बैटर’ (International Women's Day 2019 Theme Balance For Better) रखी गई है। इसके तहत पूरे साल लैंगिक संतुलन और समानता के लिए प्रयास किए जाएगें ताकि महिलाओं की स्थिति बेहतर हो। इस कैंपेन की जरूरत क्यों है और किस स्तर पर अभी भी समाज में महिलाओं के साथ भेदभाव किया जाता है, इन सवालों के जवाब तलाशता आलेख। तमाम दावों और प्रयासों के बावजूद महिलाओं के साथ लैंगिक मतभेद जारी है। सही मायने में जेंडर इक्वेलिटी के लिए सिर्फ कानून बनाना काफी नहीं बल्कि उन सभी पहलुओं और मुद्दों की निशानदेही करनी जरूरी है, जिन पर अभी-भी बहुत काम करने की दरकार है।

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सेहत की अनदेखी :

अधिकतर महिलाएं घर के दूसरे सदस्यों का खूब ख्याल रखती हैं लेकिन अपने पोषण, सेहत और मानसिक परेशानियों को लेकर चुप्पी साधे रखती हैं। कुछ परिवारों में पुरुष सदस्य भी महिला सदस्य की सेहत का ध्यान नहीं रखते हैं। कुछ समय पहले ही एक संस्था द्वारा किए गए 8वें सालाना हेल्थ एंड फिटनेस सर्वे (2017-2018) और कुछ अन्य स्कूल सर्वे में पाया गया कि लड़कों की तुलना में लड़कियों का बीएमआई असंतुलित होता है। लड़कियों की शारीरिक मजबूती और ऊर्जा में भी काफी कमी पाई गई। शोधकर्ताओं के अनुसार इसका मूल कारण यह है कि व्यावहारिक रूप से अब भी बड़ी संख्या में माता-पिता अपने बेटों को ही अच्छी खुराक देना पसंद करते हैं।

शारीरिक सुंदरता :

हमारे समाज में अकसर कहा जाता है कि लड़कों की सुंदरता नहीं कमाई देखी जाती है लेकिन लड़कियों के मामले में स्थिति इसके उलट है। अच्छे वर की चिंता में बेटियों पर सुंदर, स्लिम, गोरी और दमकती-चमकती दिखने के लिए दबाव बनाया जाता है। विज्ञापन के जरिए महिलाओं की शारीरिक खूबसूरती का इतना बढ़ा-चढ़ा कर बखान किया जाता है कि वे अपने वजन, रंग और शरीर की बनावट को लेकर ओवर कॉन्शस हो जाती हैं। बेटा हो या बेटी उनमें ऐसे गुणों के विकास पर जोर दिया जाना चाहिए, जिससे वो बेहतर इंसान बने।

करियर से समझौता :

शानदार एकेडमिक रिकॉर्ड, अच्छी-खासी डिग्री और प्रतिष्ठा वाली जॉब सब होने के बावजूद ज्यादातर महिलाओं को शादी के बाद अपनी वित्तीय जरूरतों के लिए अपने पति की सहमति और स्वीकृति पर निर्भर रहना पड़ता है। बच्चे होने के बाद अधिकांश महिलाएं जॉब छोड़ देती हैं और इनमें से बहुत कम महिलाएं दोबारा जॉब ज्वाइन करती हैं। कई बार घर और ऑफिस दोनों जगह के दबाव को न झेल पाने की वजह से नौकरी छोड़ने के लिए बाध्य हो जाती हैं।

कार्य विभाजन :

हमारे समाज ने काम-काज और खेल-कूद का भी लैंगिक विभाजन कर दिया है। आज भी इलेक्ट्रिशियन, प्लंबर या मैकेनिक के रूप में लड़कियां अपवाद स्वरूप में देखने को मिलेंगी। क्रिकेट, फुटबॉल, कुश्ती, कबड्डी और कराटे जैसे खेलों में लड़कियों ने अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई है लेकिन उनकी संख्या कितनी कम है यह किसी से छिपा हुआ नहीं है। इस दीवार को गिराना है तो बेटियों से किसी काम के लिए यह न कहें कि ‘यह काम लड़कियों के लिए नहीं है।’ बेटियों को शुरू से ही हर तरह के काम और खेल में सक्रिय होने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए।

पैतृक संपत्ति को लेकर मानसिकता :

कहने को तो अपने देश में पैतृक संपत्ति पर बेटियों को बराबर का हक है और वे कानूनन इस पर दावा कर सकती हैं। लेकिन सब जानते हैं कि व्यावहारिक रूप में कोई बेटी ऐसा दावा कर ले तो उसके अपने भाई नाराज होकर संबंध तोड़ लेते हैं। समाज में ऐसी बेटियों को लालची और स्वार्थी माना जाता है।

बरकरार संकीर्ण सोच :

शिक्षा में कमी और हमारे रूढ़िगत सामाजिक ढांचे के कारण अब भी ग्रामीण भारत में लड़कियों को एक जिम्मेदारी या पराया धन माना जाता है।
पढ़ने-लिखने और खेलने-कूदने की उम्र में उनका विवाह कर दिया जाता है। कई बार तो वे किशोरावस्था में ही मां भी बन जाती हैं। तमाम जागरूकता
अभियानों के बावजूद अब भी 27 फीसदी लड़कियों का विवाह 18 वर्ष से कम की आयु में हो जाता है। इस तरह देखा जाए तो महिलाओं के साथ भेद-भाव भरी सोच आज भी बरकरार है। इस सोच को मिटाने की दिशा में ‘बैलेंस फॉर बैटर’ जैसे मुहिम कारगर हो सकते हैं।

वेतन में भेदभाव :

वेतन के मामले में भी महिलाओं के साथ भेदभाव बरता जाता है। भारत में एक ही जैसे काम के बदले पुरुषों को महिलाओं से औसतन 20 फीसदी ज्यादा वेतन दिया जाता है, ऐसा मास्टर सैलरी इंडेक्स की लेटेस्ट रिपोर्ट में बताया गया है।

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