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सपनों की बुलंदियों को है छूना, तो दिव्यांगता को न समझे कमजोरी, पढ़ें ये प्रेरणा से भरी कहानियां

हौसले बुलंद हों, अपने सपनों पर यकीन हो और लगन से काम किया जाए तो हर मुकाम पाया जा सकता है। इसमें शारीरिक अक्षमता भी बाधा नहीं बनती। इस बात को कई विकलांग महिलाओं ने बड़ा मुकाम पाकर साबित किया है। इनका जीवन, संघर्ष और सफलता हर किसी के लिए प्रेरणादायी है। ऐसी ही कुछ महिलाओं के प्रेरणादायी सफर पर एक नजर।

सपनों की बुलंदियों को है छूना, तो दिव्यांगता को न समझे कमजोरी, पढ़ें ये प्रेरणा से भरी कहानियां
महिलाओं को लेकर हमारा समाज अब भी संकीर्ण सोच में बंधा है। आज भी महिलाएं अपने अधिकारों के लिए, खुद को साबित करने के लिए संघर्ष कर रही हैं। यह स्थिति तो सामान्य महिलाओं की है। अगर महिला शारीरिक रूप से अक्षम हो तो समाज का रवैया और भी निराशाजनक हो जाता है, उसे बेचारी, दया की पात्र, निर्भर, असहाय के तौर पर देखा जाता है।
2011 की जनगणना को देखें तो भारत की 2.1 फीसदी आबादी किसी न किसी तरह की विकलांगता से ग्रसित है। इसमें भी महिलाओं की तादाद 44.1 फीसदी है। इससे पता चलता है कि कितनी दिव्यांग महिलाओं को समाज के उपेक्षित व्यवहार का शिकार होना पड़ता होगा, उन्हें हीनभावना का अहसास बार-बार करवाया जाता होगा।
इस पूर्वाग्रही सोच के बावजूद कई दिव्यांग महिलाएं अपने लिए अलग राह बना रही हैं, अपने भीतर छुपी अपार क्षमता को पहचान रही हैं, खुद को सबल-सशक्त बना रही हैं। जीवन में आने वाली चुनौतियों का डटकर सामना कर रही हैं, सफलता के नए कीर्तिमान बना रही हैं। ऐसी महिलाएं अपना जीवन तो बदल ही रही हैं, दूसरों के लिए भी प्रेरणा बन रही हैं।
कुछ इसी तरह के विचार के साथ इस साल यूएनओ ने भी इंटरनेशनल-डे ऑफ डिसएबल्ड पर्सन्स की थीम रखी है-डिसएबल पर्सन्स को एंपावर करना और उन्हें बराबरी का दर्जा दिलवाना। लेकिन यह तभी मुमकिन होगा, जब विकलांग व्यक्ति, महिलाएं अपना हौसला बुलंद रखेंगी।

इरा सिंघल बदला समाज का नजरिया

साल 2015 में यूपीएससी टॉपर बनी थीं इरा सिंघल। वह स्कोलियोसिस (रीढ़ की हड्डी में टेढ़ापन, इससे छाती और पीठ के नीचे के हिस्से प्रभावित होते हैं) नाम की बीमारी से पीड़ित हैं। लेकिन शरीर से विकलांग होने के बावजूद यूपीएससी की परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त करने वाली भारत की पहली दिव्यांग महिला अधिकारी बनी हैं।
इरा ने साबित किया कि कुछ कर दिखाने का जुनून हो तो हर मुश्किल आसान हो जाती है। इरा कहती हैं, ‘मेरी सफलता में मेरे माता-पिता का बहुत बड़ा योगदान है। उनके प्यार, संबल की वजह से ही मैं आज इस मुकाम पर पहुंच पाई हूं। मुझे भी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। लेकिन मैं निरंतर प्रयास करती रही।
हम सभी जानते हैं कि अगर लड़की किसी शारीरिक बाधा का शिकार है तो लोग, इसे उसकी सबसे बड़ी कमी मान लेते हैं। ऐसे में अगर वे महिलाएं खुद को कमजोर और किसी पर निर्भर मानेंगी तो जीवन में कुछ नहीं कर पाएंगी। मैं मानती हूं कि सबसे पहले दिव्यांग महिलाओं को खुद पर विश्वास करना आना चाहिए।
किसी भी मुकाम को पाने के लिए जरूरी है कि हममें जो कमी है, हम पहले उसे स्वीकार करें, खुद से खुश रहें। दुनिया आपके बारे में क्या सोचती है, इससे आपको फर्क नहीं पड़ना चाहिए। यह भी नहीं सोचना चाहिए कि मुझसे यह काम नहीं होगा।
वैसे भी दुनिया में कोई भी ऐसा इंसान नहीं है, जो सभी काम कर पाए। इसके बजाय यह सोचना चाहिए कि आप कुछ तो कर सकती हैं। कहने का मतलब है कि पहले दिव्यांग महिलाएं खुद को काबिल और हुनरमंद बनाएं, लोगों की सोच अपने आप बदल जाएगी।’

अंजलि अग्रवाल किया असंभव को संभव

इरा की तरह ही अंजलि अग्रवाल भी महिलाओं के लिए मिसाल हैं। अंजलि को मस्क्युलर डिस्ट्रॉफी (इस समस्या में पैरों की, कूल्हों की मांस-पेशियां कमजोर हो जाती हैं, कुछ समय बाद पूरा शरीर भी प्रभावित हो जाता है) की समस्या है। लेकिन समस्या के शुरुआती दौर में ही अंजलि ने डांस करना सीखा।
खुद को शारीरिक रूप से सक्रिय रखा। अंजलि शुरू से मेधावी और प्रतिभावान होने के साथ ही आत्मनिर्भर होने का सपना देखती थीं और हमेशा से कुछ अलग करना चाहती थीं। अंजलि बताती हैं, ‘मैंने पीजी करने के बाद हैंडीक्राफ्ट और हैंडलूम का बिजनेस शुरू किया। कुछ सालों बाद सुगम्य पर्यटन की शुरुआत की।
यह कॉन्सेप्ट सुनकर लोगों ने कहा कि आप दिव्यांग हैं, आप कैसे सोच सकती हैं टूरिज्म के बारे में। आपको घर में रहना चाहिए। तब लगता था कि लोग ऐसा क्यों बोल रहे हैं? जबकि हम भी इंसान हैं। हमारा भी मन है खुशियां मनाने का, घूमने-फिरने का।
लेकिन मैंने अपना सपना पूरा किया, सामर्थ्यम संस्था की शुरू की। इसमें परिवार ने हमेशा मेरा साथ दिया। मेरे पापा कहते थे कि अगर कुछ इंपॉसिबल है तो उसे पॉसिबल बनाओ। खुद से कहो-आई एम पॉसिबल। हर परेशानी के हल ढूंढ़ो। मां भी कहती हैं, डोंट गिप अप। आज देखिए, सामर्थ्यम को शुरू हुए 25 साल हो गए हैं।
मैं विकलांग महिलाओं से कहना चाहूंगी कि खुद को किसी से कम या कमजोर मत मानो, न ही खुद को लेकर हीन भावना रखो। सबसे पहले खुद को सशक्त बनाओ। अपने सपनों को पंख दो। इफ यू ड्रीम हाई, यू अचीव हाई।’

प्रीति प्रकाश प्रजापति फैलाया शिक्षा का उजाला

एक दृष्टिहीन व्यक्ति का जीवन अंधकारमय होता है, ऐसा आम लोगों का सोचना है। लेकिन एक दृष्टिहीन महिला ही अगर शिक्षा की उजाला फैलाए तो कई लोगों के लिए यकीन करना मुश्किल होगा। साहित्य और संगीत प्रेमी प्रीति प्रकाश प्रजापति इस बात की मिसाल हैं।
वह जन्म से दृष्टिहीन हैं, उन्होंने कभी उजाला नहीं देखा है। लेकिन वह दिल्ली विश्वविद्यालय के लेडी श्रीराम कॉलेज में पढ़ाती हैं, छात्रों के सपनों में नए रंग भरती हैं। प्रीति प्रकाश प्रजापति कहती हैं, ‘हर इंसान की क्षमता अलग-अलग होती है।
उसे अपनी क्षमताओं को निखारते हुए आगे बढ़ना चाहिए। मैंने समय के साथ नए हुनर सीखे, आज मैं कंप्यूटर पर टाइपिंग, लैपटॉप पर काम और मोबाइल चला लेती हूं। मेरी मां हमेशा कहा करती थीं कि इंपॉसिबल शब्द को अपनी लाइफ की डिक्शनरी से निकाल दो।
विकलांग व्यक्ति भी बहुत कुछ कर सकता है। बस हमें खुद को सीमा बोध से ऊपर उठना होता है। नई तकनीक सीखना भी जरूरी है। अपने को जागरूक, स्वावलंबी, संघर्षशील बनाना चाहिए। साथ ही समाज को भी दिव्यांगजन को सहानुभूति नहीं, सम्मान और प्रेम देना चाहिए।’
इरा, अंजलि और प्रीति की उपलब्धियों से प्रेरणा लेकर और भी विकलांग महिलाएं अपने जीवन को बेहतर बना सकती हैं, अलग मुकाम पा सकती हैं। जरूरत है तो बस खुद पर भरोसा करने की, यह यकीन करने की कि नामुमकिन कुछ भी नहीं है।

परिवार-समाज दे संबल

विकलांगता से ग्रस्त महिलाएं अगर कुछ स्थितियों में अवसाद से ग्रस्त हो जाएं तो उससे उबर पाने के लिए उन्हें क्या करना चाहिए? इस सवाल के जवाब में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में मनोचिकित्सक डॉ. राजेश सागर कहते हैं, ‘आज भी महिला और पुरुषों को हमारे समाज में बराबर नहीं माना जाता है।
ऐसे में अगर किसी महिला के साथ विकलांगता भी जुड़ जाए तो समस्या और बढ़ जाती है।
लेकिन इसके बावजूद हार मानना, निराश होना कोई विकल्प नहीं है। विपरीत परिस्थितियों में भी खुद को बाहर निकालना आना चाहिए। इसमें परिवार सबसे अहम भूमिका निभा सकता है। अगर परिवार का संबल मिलेगा तो विकलांग महिलाएं, आत्मविश्वासी, आत्मनिर्भर बनेंगी।
ऐसी बहुत सी विकलांग महिलाएं हैं, जो सबके लिए प्रेरणा हैं, उन्हें अन्य महिलाओं को अपना आइडल बनाना चाहिए। साथ ही ऐसे कार्यक्रमों को भी बढ़ावा देना चाहिए, जो दिव्यांगता पर जागरुकता फैलाएं। जिससे समाज का, सामान्य लोगों का, दिव्यांजन के प्रति नजरिया बदले।’
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