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जानिए, कैसे बनायें रखें रिश्तों के बीच पावर बैलेंस

रिश्तों के बीच पावर बैलेंस बनाकर रखना बहुत जरूरी है।

जानिए, कैसे बनायें रखें रिश्तों के बीच पावर बैलेंस
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हर मनुष्य को पावर यानी ताकत की चाहत होती है, क्योंकि वह हमें सामाजिक रूप से श्रेष्ठ बनाती है। लेकिन यह पावर अगर रिश्तों पर हावी होने लगे यानी हम दूसरों के हिस्से का निर्णय भी खुद लेने लगें तो रिश्तों की डोर कमजोर हो जाती है। इसलिए रिश्तों के बीच पावर बैलेंस बनाकर रखना बहुत जरूरी है।
मशहूर किताब ‘द विनर इफेक्ट’ के लेखक ईयान रॉबट्सन का कहना है, ‘यह पावर का खेल ही है, जब आपसी संबंधों में एक पक्ष या व्यक्ति उस चीज पर अपना वर्चस्व स्थापित कर लेता है, जिसकी दूसरे को भी जरूरत होती है। इस तरह दोनों ही पक्ष इस पावर बैलेंस को लेकर एक डर से घिरे रहते हैं।’ रॉबट्सन की इस बुक में बिजनेस और पर्सनल सक्सेस में पावर पॉलिसी के इंपॉर्टेंस के बारे में बताया गया है। इसमें पावर को एक ऐसे हथियार के रूप में बताया गया है, जिसका वर्कप्लेस पर तो बखूबी इस्तेमाल किया जाता है लेकिन अगर पर्सनल रिलेशन में इस तरह का पावर इंबैलेंस हो जाए तो रिश्तों के डोर को टूटते देर नहीं लगती है।
बढ़ता है तनाव
हर रिश्ते की एक दास्तान होती है। जहां प्यार होता है, वहां तकरार की आशंका भी होती है। लेकिन अगर रिश्तो में पावर बैलेंस गड़बड़ हो जाए और पावर कंट्रोल किसी एक व्यक्ति के हाथ में आ जाए तो रिश्तों में तनाव आ जाता है। ऐसे में दूसरे पक्ष का हमेशा यही प्रयास रहता है कि किस तरह से वह अपनी खोई हुई पावर को दोबारा हासिल कर सके। इस पावर को हासिल करने में ही दो लोगों के बीच तकरार शुरू हो जाती है। ‘द गिफ्ट ऑफ़ पोस्ट रिलेशनशिप’ की लेखिका क्रिस्टन क्रोकैट भी इस बात को सही मानती हैं। अपनी बुक में क्रोकैट टीनएजर और पैरेंट्स के बीच के रिलेशनशिप को भी पावर से जोड़कर लिखती हैं। इस बुक की कैरेक्टर भी अपने पैरेंट्स के इस पावर के विरोध स्वरूप घर की क्लीनिंग को मना कर देती है। उनके द्वारा दिए गए आदेशों का उल्लंघन करना, तेज आवाज में म्यूजिक सुनना यानी जिस बात के लिए पैरेंट्स उसे मना करते हैं, वह उसे ही करती है। असल में उसके विरोध जताने का यह एक तरीका है, ताकि अपने मन-मुताबिक जीवन जीने की आजादी यानी अपने जीवन को निर्धारित करने की पावर को वह फिर से हासिल कर सके। क्रोकैट का मानना है कि टीनएजर्स और पैरेंट्स के बीच पावर की खींचतान एक आम बात है। जिस तरह पैरेंट्स अपने टीनएजर बच्चे की एक्टिविटीज पर नजर रखते हैं कि उनका बच्चा फोन पर किससे और कितनी देर बातें करता है, वह अपने कमरे को किस तरह से क्लीन करता है, वह पढ़ाई में कैसा है, एक तरह से अपने बड़े होते बच्चों को कंट्रोल करने का प्रयास ही है। इस तरह बच्चे की हर एक एक्टिविटीज को खुद कंट्रोल करने का रिएक्शन भी खास किस्म का होता है। यही कारण है कि पैरेंट्स के इस तरह के पावर के इस्तेमाल का बच्चे खुलकर विरोध करते हैं।
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