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अगर महिलाएं चाहती हैं पुरूषों से बराबरी का हक, तो गांठ बांध लें ये चार बातें

घर-परिवार में महिलाओं को तो इमोशनल सपोर्ट मिलता रहता है लेकिन पुरुषों को नहीं मिलता, यह मान लिया जाता है कि वे मेंटली स्ट्रॉन्ग हैं। इसके चलते जब किसी बड़ी परेशानी में उनका मन उद्विग्न होता है, उन्हें जरूरी इमोशनल सपोर्ट नहीं मिल पाता, वे अकेले पड़ जाते हैं। जबकि ऐसे में उन्हें मां, पत्नी बहन या बेटी के रूप में संबल मिलना चाहिए। यह सिर्फ पुरुषों को तनावमुक्त रखने के लिए ही नहीं, घर की खुशहाली के लिए भी जरूरी है।

अगर महिलाएं चाहती हैं पुरूषों से बराबरी का हक, तो गांठ बांध लें ये चार बातें
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हमारे सामाजिक ढांचे में जाने क्यों और कैसे मान लिया गया कि घर के पुरुष सदस्यों को भावनात्मक सहारे की दरकार नहीं होती। आमतौर पर उनके मन की जद्दोजहद को समझने की ना तो कोशिश की जाती है और ना ही यह जरूरी समझा जाता है। जबकि इमोशनल सपोर्ट की जरूरत तो हर इंसान को होती है। बेटे, पति, भाई और पिता की भूमिका निभाते हुए अपनी दूसरी जिम्मेदारियों और उलझनों से जूझ रहे घर के पुरुष सदस्यों की भी मन:स्थिति समझने की जरूरत होती है। आपको मां, बेटी, पत्नी और बहन की भूमिका में उनका सपोर्ट सिस्टम बनना चाहिए, यह आपका पारिवारिक दायित्व भी है।

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1.इमोशनल सपोर्ट क्यों है जरूरी

प्राय: देखा जाता है कि हमारे घरों में पुरुष सदस्य अपनी भावनाओं का इजहार कम ही करते हैं। हमारा सामाजिक-पारिवारिक माहौल ही ऐसा है कि उनके लिए इमोशनल और सेंसेटिव होने की मानो मनाही ही है। इतना ही नहीं, हमारे सोशल सिस्टम में पुरुषों के जीवन से जुड़े कई संवेदनशील मुद्दों पर गौर ही नहीं किया जाता।
यही वजह है कि खुलकर अपनी तकलीफ साझा ना करने की स्थिति में फैमिली के मेल मेबर्स कई बार अपनों के होते हुए भी अकेले पड़ जाते हैं। ऐसे में हमें यह समझना चाहिए कि सख्ती ओढ़े रहने वाले घर के पुरुषों के मन को भी समय-समय पर इमोशनल सपोर्ट की जरूरत होती है।
कभी प्रोफेशनल फ्रंट पर तो कभी घरेलू मोर्चें पर, भावनात्मक टूटन का शिकार वे भी होते हैं। अकेलेपन, तनाव और अवसाद जैसी समस्याएं उन्हें भी घेरती हैं। अपना सुख-दुख बांटने की चाहत उनके मन में भी होती है।
स्पेस, आपसी समझ, तारीफ या सम्मान, इन सब की जरूरत पुरुषों को भी होती है। महिलाओं की तरह पुरुषों को भी फीलिंग्स के आधार पर ही समझने की कोशिश होनी चाहिए। घर के पुरुषों पर सब कुछ संभाल लेने का दबाव इतना भी ना हो कि उनके जीवन एक बोझ बन जाए।

2.उनके मन की भी सुनिए

बेटे, पति, भाई या पिता, ये घर के वे सदस्य हैं, जिन्हें आमतौर पर मन की कहने की आदत नहीं होती। हमारे सामाजिक ढांचे में उनकी परवरिश ही इस तरीके से की जाती है कि खुलकर अपने मन की पीड़ा नहीं कह पाते। अपनी चिंताओं को साझा नहीं करते। उन पर अपनों का ही नहीं, परायों का भी संबल बनने का दबाव होता है।
यही वजह है कि उनके मन की बात पूछना जरूरी है। उनसे घर या दफ्तर में चल रही परेशानियों के बारे में बात करनी जरूरी है, ताकि वे अपना मन खोल सकें। इसलिए घर-बाहर की सारी परेशानियों और बातों का जिक्र करने से पहले ना सिर्फ उनकी मन:स्थिति समझें, बल्कि उनके मन की बात को भी समझने की पूरी कोशिश करें।
इतना ही नहीं, पुरुष सदस्यों की सेहत को लेकर भी आपकी सजगता जरूरी है। क्योंकि ये घर के वे सदस्य हैं, जो दूसरों की फिक्र तो करते हैं पर अपने स्वास्थ्य की चिंता नहीं करते। मां की स्नेहभरी डांट हो या पत्नी की समझाइश, उनकी केयर करने के लिए घर की महिलाओं का साथ और सहयोग बहुत जरूरी है।

3.दें साथ होने का संबल

हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि खुद अपने जज्बातों को जाहिर करने में पीछे रहने वाले घर के पुरुष सदस्यों का साथ घर में हर उम्र के लोगों के लिए बड़ा संबल होता है। पिता का साथ सुरक्षा का भाव लिए होता है तो भाई और बेटे का साथ जिंदगी को प्यार-स्नेह से सराबोर रखता है।
पति का साथ जीवन की हर परिस्थिति का सामना करने की हिम्मत देता है। ऐसे में इस ओर भी गौर करना जरूरी है कि बेटे, पति, भाई या पिता का भी संबल बना जाए। उन्हें भी यह महसूस हो कि हम हर हालात में उनके साथ हैं।
भावुक पलों में उनका संबल बनने के लिए भी और जिंदगी की कठिन परिस्थितियों में साथ देने के लिए भी। फाइनेंस से लेकर फैमिली से जुड़े मामलों तक उनके मन में भी कई परेशानियां जब तब आती रहती हैं। कितनी ही तरह की परिस्थितियां चिंता का सबब बनती हैं।
करियर में आगे बढ़ने और सबकी उम्मीदों पर खरा उतरने की उम्मीदों का बोझ भी उनके सिर पर होता है। परिवार-रिश्तेदार, बॉस-नौकरी, दोस्ती अपनों में सामंजस्य बैठाने के फेर उनको कई तरह की उलझनें घेरे रहती हैं।
बच्चों, बड़ों की खुशियों का ख्याल करते हुए घर के पुरुष सदस्य अपने शौक, अपनी खुशियां कुर्बान करते हैं। ऐसे में घर के पुरुषों के उद्विग्न मन को समझने और उनका संबल बने की जिम्मेदारी आपकी है।

4.क्या हैं साइड इफेक्ट्स

हालिया बरसों में पुरुषों में भी ना केवल आत्महत्या के आंकड़े बढ़े हैं बल्कि वे स्ट्रेस और भाग-दौड़ के कारण डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, डिप्रेशन और हार्ट डिजीज की चपेट में भी आ रहे हैं। इस कॉम्पिटिटिव दौर में प्रोफेशनल फ्रंट पर तो उनकी परेशानियां बढ़ी ही हैं और परिवार में अनगिनत अपेक्षाओं का बोझ उनके हिस्से है।
साथ ही मन में दबी भावनाएं और जिंदगी की उलझनें भी उनके लिए तकलीफदेह साबित हो रही हैं। करियर और घर-परिवार से जुड़ी एंग्जाइटी अकसर उनके दिल-दिमाग को भी घेरे रहती हैं। ऐसे में उनके मन को समझना और साथ देना बेहद जरूरी है।

ध्यान रखें...

1.हर बात को स्त्री-पुरुष के एंगल से ना देखें।
2.संभव हो तो फाइनेंसियल सपोर्ट भी करें।
3.रिश्तों की उलझनों का ब्लेम पुरुष के हिस्से ही ना आए।
4.महिलाएं घर से बाहर के कामों में भी हाथ बंटाएं।
5.ठेस पहुंचाने वाली बातें ना करें।

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