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महिलाओं में बांझपन और आईवीएफ से जुड़े ये झूठ हमेशा माने जाते हैं सच

वैसे तो फैमिली प्लानिंग करना पति-पत्नी का एक बेहद निजी फैसला होता है, लेकिन शादी के कुछ समय बाद ही परिवार और रिश्तेदारों का बेबी प्लान करने का प्रेशर कई बार कपल्स को सच को झूठ और झूठ को सच मानने पर मजबूर कर देता है। महिलाओं में बांझपन और संतान उत्पति वाली तकनीक आईवीएफ से जुड़े कुछ झूठ को अक्सर लोग सच मान लेते है, जिससे कपल्स अक्सर कंफ्यूजन की स्थिति महसूस करते हैं। ऐसे में आज हम आपको महिलाओं में बांझपन और आईवीएफ से जुड़े उन झूठों के बारे में बता रहे हैं जिन्हें अक्सर सच माना जाता है। आइए जानते हैं महिलाओं में बांझपन और आईवीएफ से जुड़े मिथ और उनका सच।

महिलाओं में बांझपन और आईवीएफ से जुड़े ये झूठ हमेशा माने जाते हैं सच
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महिलाओं में बांझपन और आईवीएफ से जुड़े मिथ और सच

आज के दौर में दुनिया की लाखों महिलाएं बांझपन यानि इन्फर्टिलिटी की समस्या का सामना कर रही हैं, ऐसे में मेडिकल तकनीक के बढ़ते प्रसार की वजह से आईवीएफ और सरोगेसी जैसी तकनीकें अस्तित्व में आईं और निसंतान दंपतियों के लिए संतान प्राप्त करना आसान हो गया है, लेकिन इन तकनीकों और बांझपन से जुड़े कुछ झूठ यानि मिथ कपल्स को नई तकनीकों को अपनाने से रोकते हैं, इसलिए आज हम उन बांझपन और आईवीएफ से जुड़े झूठ और उनके सच को बता रहे हैं, जिन्हें जानने के बाद आप फैमिली प्लानिंग से जुड़ा एक सही फैसला ले सकेगें।

महिलाओं में बांझपन और आईवीएफ से जुड़े झूठ और सच


1. केवल महिलाएं ही होती हैं बांझ, पुरुष नहीं

चिकित्सा विज्ञान के मुताबिक, बेबी प्लानिंग के लिए पति-पत्नी दोनों ही लोगों का शारीरिक और मानसिक रुप से स्वस्थ होना बेहद जरुरी होता है, लेकिन ये कहना कि महिलाएं ही बांझ होती हैं पुरुष नहीं, तो ये सोच गलत है, क्योंकि बांझपन के 20 फीसदी मामलों को छोड़कर अन्य में महिला और पुरूष दोनों ही समान रुप से जिम्मेदार होते हैं।

अहमदाबाद स्थित नोवा आईवीएफ फर्टिलिटी के मेडिकल डायरेक्टर और कंसल्टेंट डॉ. मनीष बैंकर के मुताबिक, अधिकांश मर्द होने की परिभाषा को फर्टिलिटी को ही मानते हैं जिसकी वजह से वो इन्फर्टिलिटी टेस्ट करवाने से भी हिचकते हैं, जबकि स्पर्म काउंट और इन्फर्टिलिटी दोनों अलग चीजें होती है। जिससे आमतौर पर एक माना जाता है।

2. स्ट्रेस से होता है बांझपन

डॉक्टर्स अक्सर महिलाओं को प्रेग्नेंसी प्लान करने से पहले और उसके दौरान स्ट्रेस लेने से बचने की सलाह देते हैं। ऐसा वो ब्लड प्रेशर को नियंत्रित रखने के लिए करते हैं। मेडिकल साइंस के मुताबिक, स्ट्रेस और इन्फर्टिलिटी का कुछ मामलों में संबंध जरुर हो सकता है, लेकिन तनाव की वजह से कभी भी बांझपन यानि इन्फर्टिलिटी की समस्या नहीं होती है। इसकी पुष्टि साल 2011 में इन्फर्टिलिटी का इलाज करा रहीं कुल 3500 महिलाओं पर किए गए शोध से होता है, जिसमें पाया गया कि प्रेग्नेंसी के इलाज के दौरान स्ट्रेस होने का कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ा।


3. बांझपन समस्या है बीमारी नहीं

आमतौर पर बीमा कंपनियां हेल्थ इंश्योंरेस में इन्फर्टिलिटी को कवर नहीं करती हैं, क्योंकि ये जानलेवा बीमारी नहीं होती है। वो उसे एक समस्या मानती हैं, बीमारी नहीं। जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने बांझपन यानी इन्फर्टिलिटी को रिप्रॉडक्टिव सिस्टम वाली डिजीज मान चुका है। क्योंकि इससे कपल्स शारीरिक और मानसिक रुप से प्रभावित होते हैं।

4. आईवीएफ से मल्टी प्रेगे का होता है खतरा

आईवीएफ तकनीक में महिला के गर्भ में पुरुष के स्पर्म्स को तकनीक के माध्यम से डाला जाता है, लेकिन इस प्रक्रिया में सिंगल और मल्टीपल प्रेग्नेंसी के ऑप्शन का चुनाव करने की अनुमति कपल्स को होती है। आमतौर पर लोग प्रेग्नेंसी के चांस को बढ़ाने के लिए ज्यादा संख्या में भ्रूण यानि स्पर्म्स को गर्भ में इंजेक्ट करवाते हैं।


5. आईवीएफ से होने वाले बच्चे में होता है डिफेक्ट

आमतौर पर आईवीएफ का इस्तेमाल निसंतान दंपतियों को संतान प्राप्ति के लिए किया जाता है, लेकिन इस बारे में पूरी जानकारी न होने की वजह से लोगों में इस तकनीक से उत्पन्न होने वाले बच्चों में जन्म से ही शारीरिक या मानसिक दोष होने का कारण माना जाता है। जो बात पूरी तरह से गलत है, क्योंकि आईवीएफ गर्भ में भ्रूण यानि स्पर्म्स को इंजेक्ट करने वाली एक सामान्य प्रक्रिया होती है, जबकि उसके आगे की प्रेग्नेंसी सामान्य होती है।

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