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क्यों बढ़ रहे हैं खुदकुशी के मामले, जानें क्या है इसका समाधान

हाल के महीनों में कोरोना संक्रमण की वजह से लोगों में डर और आर्थिक संकट बढ़ा है। इसके चलते कई लोग तनाव और डिप्रेशन के शिकार हुए हैं। कई लोगों ने तो हार मानकर सुसाइड जैसा अनुचित कदम भी उठा लिया। अगर आप भी इन दिनों परेशान हैं तो तुरंत किसी मनोवैज्ञानिक से मिलें और यहां दिए जा रहे सुझावों पर भी अमल करें।

West Bengal: कोरोना संकट के बीच एक मेडिकल छात्र ने की आत्महत्या, सुसाइड नोट बरामद
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West Bengal: कोरोना संकट के बीच एक मेडिकल छात्र ने की आत्महत्या, सुसाइड नोट बरामद

कई महीने से कोविड-19 महामारी से दुनिया भर में अनिश्चितता की स्थिति बनी हुई है। इसने जिंदगी की रफ्तार को थामने के साथ-साथ जिंदगी जीने के सलीको को भी बदल दिया है। कोरोना संक्रमण से बचना और सेहतमंद रहना, जहां सबके लिए चुनौतीपूर्ण है, वहीं वैश्विक आर्थिक संकट की स्थिति के कारण मुश्किलें और बढ़ गई हैं। बेकारी, बेरोजगारी और आर्थिक संकट तेजी से पैर पसार रहा है। इन सबके चलते लोग चाहे-अनचाहे तनाव, एंग्जाइटी और डिप्रेशन जैसी मानसिक बीमारियों का शिकार बनते जा रहे हैं। नतीजतन समाज में खुदकुशी के मामले भी बढ़ने लगे हैं।

मामले बढ़ने की वजह

देखा जाए तो आत्महत्या का रास्ता मूलतः ऐसे लोग अपनाते हैं, जिनमें कॉपिंग क्षमता अच्छी नहीं होती। यानी आत्मविश्वास की कमी होती है और जो विकट स्थिति का सामना न करने से घबराते हैं। ऐसे लोग अपने को चोट पहुंचाने या आत्महत्या करने की ज्यादा कोशिश करते हैं। व्यक्ति का अति-महत्वाकांक्षी होना भी उसकी निराशा का कारण बन सकता है। अति-महत्वाकांक्षी होने के साथ व्यक्ति का अपने निर्धारित लक्ष्य के प्रति अटल या रिजिड होना भी खतरनाक है। कई व्यक्ति चाहते हैं कि स्थितियां उनके हिसाब से हों, वो स्थिति के हिसाब से बदलने को तैयार नहीं होते। ऐसे लोग निराशा का सामना नहीं कर पाते और विपदा की घड़ी से उबरने के लिए आत्महत्या का रास्ता अपनाते हैं।

क्या है समाधान

ऐसे लोगों को सकारात्मक सोच अपनानी सबसे जरूरी है। डिप्रेशन में आकर गलत कदम उठाने के बजाय हौसला रखना चाहिए और अपनी काबिलियत पर भरोसा करना चाहिए। इनके बल पर वे दोबारा अपने पैरों पर खड़े हो सकते हैं।

-व्यक्ति को अपनी स्थिति से सामंजस्य स्थापित करना चाहिए। कोरोना वायरस से अनिश्चितता की स्थिति बनी हुई है। काम की अनिश्चितता के दौर में हर समय निराश रहने के बजाय इसके समाधान के बारे में सोचना चाहिए। नए रास्ते तलाशने चाहिए और परिस्थिति के हिसाब से स्वयं को ढालना चाहिए।

-अपनी क्षमता या योग्यता के अनुसार महत्वाकांक्षी होना चाहिए। लेकिन अति-महत्वाकांक्षी होना खतरनाक है। शोहरत और कामयाबी के उतने ही सपने देखने चाहिए, जिन्हें पूरा करने का आप दम रखते हों।

-निराशा की स्थिति से बचने के लिए रिजिड न होकर फ्लेक्सिबल होना जरूरी है। अपने तय मुकाम के साथ उसे एक या दो ऑप्शन जरूर रखने चाहिए। ताकि जरूरत पड़ने पर दूसरे ऑप्शन को आसानी से अपना ले और कामयाबी हासिल करें।

-कठिन परिस्थिति से उबरने के लिए धैर्य रखना भी जरूरी है। नौकरी चले जाने से सारी जिंदगी खत्म होने जैसे नकारात्मक विचार मन में नहीं लाने चाहिए। घबराने, परेशान होने या मन में नकारात्मक विचार लाने के बजाय सकारात्मक भावों को तरजीह देनी चाहिए।

-जरूरी है कि जिंदगी से हार मानने के बजाय संकट की इस घड़ी को एक चैलेंज की तरह लिया जाए। अगर नौकरी में सफलता नहीं मिलती तो अपनी काबलियत के बल पर कुछ नया काम शुरू कर सकते हैं। अपनी काबिलियत को परखना चाहिए। जरूरत हो तो कुछ खास तरह के कौशल सीखने चाहिए।

-हताशा की स्थिति से बाहर निकालने में परिवार अहम भूमिका अदा करता है। परिवार के सदस्यों को पूरा सपोर्ट देना चाहिए और उनके साथ समय बिताना चाहिए।

-सुबह-शाम घर पर ही 40-45 मिनट रेग्युलर एक्सरसाइज या वर्कआउट जरूर करना चाहिए। अपनी सहूलियत और पसंद के हिसाब से घर में ही वॉक, योगा, व्यायाम, मेडिटेशन कर सकते हैं। इससे न केवल आप शारीरिक तौर पर सक्रिय रहेंगे, तनावमुक्त भी रहेंगे।

-साइकोलॉजिस्ट से काउंसलिंग करके बीती बातें भूलने और नए सिरे से जिंदगी शुरू करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। जरूरत पड़े तो साइकिएट्रिस्ट से मेडिकेशनल ट्रीटमेंट भी करवाना चाहिए।

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-तनाव या डिप्रेशन में रहने वाले व्यक्ति को घर की जिम्मेदारी सौंपनी चाहिए और छोटे-छोटे काम करने पर उसकी सराहना भी जरूर करनी चाहिए। इससे उसमें आत्मविश्वास आएगा और वो संकट की स्थिति से उबरने के लिए तैयार होगा।

-निराशा से बचने के लिए यथासंभव नियमित दिनचर्या कायम रखनी भी जरूरी है। समय पर उठने और अपने काम नियत समय पर निपटाने की कोशिश करनी चाहिए।

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