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पार्किंसंस डिजीज़ क्या है, जानें उसके कारण, लक्षण और उपचार

Parkinson Disease : बढ़ती उम्र के साथ शरीर के विभिन्न सिस्टम्स का फंक्शन धीमा होने लगता है। इससे कई तरह की प्रॉब्लम्स का सामना करना पड़ता है। ब्रेन में सेक्रीट होने वाले केमिकल, डोपामिन के सेक्रीशन में कमी होने से कुछ लोग पार्किंसंस डिजीज से ग्रसित हो जाते हैं। इसमें बॉडी के विभिन्न अंगों पर कंट्रोल कम होने लगता है। इस डिजीज के कारण, लक्षण और उपचार के बारे में जानिए।

पार्किंसंस डिजीज़ क्या है, जानें उसके कारण, लक्षण और उपचार

Parkinson Disease : पार्किंसंस डिजीज बढ़ती उम्र के लोगों में होने वाला डिजनरेटेड डिसऑर्डर है। यह ब्रेन के सेंट्रल नर्वस सिस्टम संबंधी बीमारी है। इसमें ब्रेन के एक खास हिस्से के नर्व सेल्स कमजोर या डैमेज हो जाते हैं, जो न्यूरोट्रांसमीटर डोपामिन का निर्माण करते हैं। डोपामिन एक प्रकार का केमिकल है, जो शरीर के अन्य अंगों को कंट्रोल में रखता है और शरीर के मूवमेंट में मदद करता है।

ब्रेन में डोपामिन केमिकल का लेवल कम होने से ब्रेन के संदेश शरीर के विभिन्न हिस्सों तक नहीं पहुंच पाते और धीरे-धीरे मरीज के अंग उसके कंट्रोल से बाहर होने लगते हैं और कांपने लगते हैं। ध्यान न दिए जाने पर यह गंभीर रूप ले सकता है और मरीज को दैनिक काम-काज करने में भी परेशानी हो सकती है।

हालांकि पार्किंसंस की समस्या उम्र बढ़ने के साथ बढ़ती जाती है और एक बार पार्किंसंस होने पर पेशेंट को मेडिसिन जिंदगी भर लेना पड़ता है। लेकिन अगर इसका उपचार और एहतियात प्राइमरी स्टेज पर शुरू हो जाए, तो मरीज नॉर्मल लाइफ जी सकता है।

पार्किंसंस के लक्षण

पार्किंसंस होने पर शरीर का मूवमेंट प्रभावित होता है। यह रोग धीरे-धीरे मरीज को शिकार बनाता है। प्राइमरी स्टेज में मरीज के हाथों में झनझनाहट होना, हाथ-पैर में कंपन होना, मसल्स में अकड़न आना और दर्द महसूस होना, काम करने और चलने-फिरने में संतुलन न बिठा पाने के कारण परेशानी होना, गिरने का भय रहना, रफ्तार कम होना, मुंह और चेहरे पर कंपन होना, बोलते हुए जुबान लड़खड़ा जाना।

कई मामलों में काफी समय से चली आ रही पार्किंसंस डिजीज गंभीर हो जाती है। एडवांस स्टेज मंग मरीज के बोलने, लिखने की क्षमता में कमी आने लगती है। घबराहट रहने पर वह अपने डेली रूटीन के काम भी ठीक से नहीं कर पाता है।

पार्किंसंस के आनुवांशिक कारण

आमतौर पर 50 साल से ज्यादा उम्र के लोगों में पार्किंसंस डिजीज होने का खतरा अधिक होता है। यह डिजीज महिलाओं की अपेक्षा पुरुषों में ज्यादा देखने को मिलता है। फैमिली हिस्ट्री में किसी को यह डिजीज रही हो, तो परिवार के अन्य सदस्यों में होने का खतरा रहता है।

स्ट्रेस, हेड इंजरी में नर्व्स के डैमेज होने से भी पार्किंसंस होने की संभावना रहती है। इन वजहों से 40 साल से कम उम्र के लोगों में भी पार्किंसंस डिजीज होने की आशंका रहती है। आनुवांशिक होने के कारण कई बच्चों में भी यह रोग देखा जाता है, जिसे जुबेनाइल पार्किंसंस कहते हैं।

डायग्नोसिस

पार्किंसंस की पुष्टि के लिए हालांकि कोई फिक्सड टेस्ट नहीं है। आमतौर पर क्लीनिकल डायग्नोसिस किया जाता है। मरीज की केस हिस्ट्री, लक्षण, फिजिकल एग्जामिनेशन से ही पता चलता है कि उसमें डिग्री ऑफ डिसएबिलिटी कितनी है।

उसकी बीमारी, डेली रूटीन की एक्टिविटीज और डेली लिविंग को कितना प्रभावित कर रही है और वो किस स्टेज में है। डॉक्टर मरीज का एमआरआई या सिटी स्कैन करके इस बात की भी पुष्टि करते हैं कि पार्किंसंस की कोई दूसरी वजह तो नहीं है जैसे-ब्रेन स्ट्रोक, ब्रेन हैमरेज, ब्लड क्लॉटिंग, ब्रेन ट्यूमर।

पार्किंसंस का ट्रीटमेंट

मरीज की उम्र और पार्किंसंस डिजीज की प्राइमरी स्टेज के लक्षण डायग्नोज होने के बाद डॉक्टर ट्रीटमेंट शुरू करते हैं। यह चेक किया जाता है कि मरीज में काम करने की क्षमता धीरे हो गई है या कंपन ज्यादा है। उसी के आधार पर मेडिसिन दी जाती हैं।

मरीज के शरीर में डोपामिन सेक्रीशन के लेवल को बढ़ाने और मरीज की स्थिति को कंट्रोल में रखने के लिए एंटीकोलिनर्जिक, डोपामिन, सिनडोपा, लिवोडोपा, रोपिनरोल, ट्रायहेक्सलसेनिडिल जैसी मेडिसिन दी जाती हैं।

एडवांस स्टेज ट्रीटमेंट

पार्किंसंस की एडवांस स्टेज में ऑपरेशन करना लास्ट ऑप्शन हो जाता है। अगर मरीज को पार्किंसंस डिजीज हुए काफी साल हो चुके हों और मेडिसिन से उसकी स्थिति कंट्रोल में नहीं आ रही हो या मेडिसिन के साइड इफेक्ट आने शुरू हो गए हों, जो मरीज के लिए असहनीय हों-तभी डीप ब्रेन स्टीमुलेशन सर्जरी की जाती है। यह कहना मुश्किल है कि एडवांस स्टेज तक पहुंचने में मरीज को कितने साल लग जाएंगे।

यह मरीज की स्थिति पर निर्भर करता है-कुछ मरीज की हालात जल्दी खराब हो जाती है, तो कुछ लोगों को 10-15 साल लग जाते हैं। डीप ब्रेन स्टीमुलेशन सर्जरी में ब्रेन के विशेष ऑर्गन में इलेक्ट्रोड ट्यूब डिवाइस मशीन डाली जाती है, जिसके माध्यम से ब्रेन में इलेक्ट्रिक सिग्नल भेजे जाते हैं। इससे डोपामिन केमिकल का सेक्रीशन होने लगता है और मरीज की स्थिति में सुधार होता है।

फिजियोथेरेपी से होता है लाभ

पार्किंसंस के मरीज को मेडिसिन देने के साथ डॉक्टर उसको स्वावलंबी बनाने की कोशिश करते हैं यानी मरीज को अपने डेली रूटीन के कार्य करने योग्य बनाने का प्रयास करते हैं। वरना वे खुद को हैंडीकेप्ड या दूसरों पर निर्भर महसूस कर सकते हैं। इससे वे डिप्रेशन का शिकार हो सकते हैं।

इसके लिए उन्हें फिजियोथेरेपी कराई जाती है। जिसमें तरह-तरह की एक्सरसाइज भी कराई जाती हैं ताकि उनकी मांसपेशियों और जोड़ों में लचीलापन और फिजिकल मूवमेंट कंट्रोल में आ सके।

उनकी स्थिति को सुधारने के लिए डॉक्टर उन्हें अपनी डाइट का ध्यान रखने के लिए कहते हैं। उन्हें हाई प्रोटीन डाइट से परहेज करने और न्यूट्रीशस बैलेंस डाइट लेने की सलाह देते हैं। आत्मनिर्भर होने और नॉर्मल लाइफ जीने के लिए नियमित रूप से समुचित व्यायाम करने, अपने पसंदीदा कार्यों में बिजी रहने के लिए कहते हैं।

- डॉ. गुरबक्श सिंह

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