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मोलर प्रेग्नेंसी क्या है, जानें इसके लक्षण और उपचार

Molar Pregnancy किसी भी महिला के लिए मां बनना जिंदगी की सबसे बड़ी खुशी होती है। लेकिन इस दौरान छोटी सी लपरवाही या गलती कई बार बेहद घातक सिद्ध हो सकती है। कई बार गर्भ के सही से विकसित न होने पर स्थिति शिशु और मां दोनों के लिए बेहद खतरनाक हो जाती है। इस स्थिति को मोलर प्रेग्नेंसी के संकेत माना जाता है। आइए जानते हैं क्या है मोलर प्रेग्नेंसी, मोलर प्रेग्नेंसी के लक्षण और उपचार।

Pregnancy Tips: मोलर प्रेग्नेंसी क्या है, जानें इसके लक्षण और उपचार
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What Is Molar Pregnancy Symptoms And Treatment

Molar Pregnancy : गर्भावास्था की सबसे मुश्किल और असफल स्थिति को मोलर प्रेग्नेंसी के नाम से जाना जाता है। ये स्थिति गर्भाधारण के समय फर्टिलाइजेशन में होने वाली आनुवांशिक वजह या जैविक गलती के कारण उत्पन्न होती है। इसमें डॉक्टर्स को प्रेग्नेंसी को पूरी तरह से समाप्त करना होता है। जिसमे शिशु और मां के लिए जानलेवा होने का खतरा बढ़ जाता है।



मोलर प्रेग्नेंसी क्या है / What is Molar Pregnancy

गर्भाधारण के वक्त ओवम के इम्प्रेग्नेंशन में होने वाली आनुवांशिक कमी या जैविक दोष की वजह से पैदा होने वाली सिचुएशन को मोलर प्रेग्नेंसी कहा जाता है। इसमें दो स्थितियां होती हैं, कंप्लीट मोलर प्रेग्नेंसी और पार्शियल मोलर प्रेग्नेंसी। ये दोनों स्थितियां समय से इलाज न मिलने पर गर्भवती महिला के लिए जानलेवा साबित होती हैं। इसे मेडिकल भाषा में गेस्टेशनल ट्रॉफोब्लॉस्टिक डिजीज (जीटीडी) कहा जाता है। जिसमें प्रेग्नेंसी में भ्रूण की जगह प्लेसेंटा के टिश्यूज मोल यानि गांठ में बदलने लगते हैं। जो समय पर इलाज न मिलने से कैंसर में तब्दील हो जाते हैं। ऐसे में मोलर प्रेग्नेंसी का पता चलने पर तुरंत इलाज करवाएं।

कंप्लीट मोलर प्रेग्नेंसी / Complete Molar Pregnancy

ये मोलर प्रेग्नेंसी की पहली स्थिति होती है। इसमें भ्रूण या तो बनती ही नहीं है या सिर्फ एब्नॉर्मल टिश्यूज ही डेवलप होते हैं। जिससे भ्रूण पूरी तरह से डेवलप नहीं हो पाता है।

पॉर्शियल मोलर प्रेग्नेंसी / Partial Molar Pregnancy

इस अवस्था में भ्रूण तो बनता है, लेकिन इसके साथ एब्नॉर्मल टिश्यूज भी होते हैं। जिसकी वजह से भ्रूण पूरी तरह से विकसित नहीं हो पाता है। इस स्थिति में भी इलाज न मिलने पर मां की स्थिति घातक हो जाती है।




मोलर प्रेग्नेंसी के रिस्क / Molar Pregnancy Risk

शोध के मुताबिक, नार्मल प्रेग्नेंसी के 1000 मामलों में से किसी 1 को मोलर प्रेग्नेंसी हो सकती है। इनमें 80 फीसदी प्रेग्नेंसी में भ्रूण विकसित नही हो पाता है। येसिर्फ एक अंगूर के गुच्छे के समान दिखाई देता है। मोलर प्रेग्नेंसी होने की आशंका अधिकतर 20 साल से कम या 35 साल से अधिक उम्र की महिला, 2 सेअधिक बार मिस्कैरेज, फोलिक एसिड, विटामिन A और प्रोटीन न लेने वाली महिलाओं को अधिक होती है।

मोलर प्रेग्नेंसी के लक्षण / Molar Pregnancy Symptoms

1. नार्मल प्रेग्नेंसी की तरह मोलर प्रेग्नेंसी में भी महिला को शुरुआती दौर में पीरियड्स नहीं आते। सुबह के समय मिचली आना, उल्टी आना जैसी परेशानियां ज्यादा होती है।

2. दूसरे महीने के बाद वैजाइनल ब्लीडिंग या ब्रॉउन डिस्चार्ज बहुत ज्यादा आना।

3. यूटेरस का आकार दुगुना होना यानि 2 महीने में 4 महीने का आकार ले लेना।

4. हाई ब्लड प्रेशर का बढ़ना, दिल की धड़कन बढ़ना।

5. बहुत ज्यादा पसीना आना, घबराहट या थकान महसूस करना

6. पेल्विक एरिया में ऐँठन होना।

7. हाइपर थॉयराइड के लक्षण आना।




मोलर प्रेग्नेंसी के लक्षण दिखने पर क्या करें / What to do if Symptoms of Molar Pregnancy

मोलर प्रेग्नेंसी के लक्षण दिखाई देने पर सबसे पहले डॉक्टर की सलाह पर सभी जरुरी टेस्ट यानि प्रेग्नेंसी टेस्ट, पेल्विक हार्मोंस के लिए ब्लड टेस्ट और अल्ट्रासाउंड करके भ्रूण की स्थिति का पता लगाएं। मोलर प्रेग्नेंसी का पता चलने पर तुरंत ही डॉक्टर से यूटेरस में मौजूद एब्नॉर्मल टिश्यूज को रिमूव करवा दें।




मोलर प्रेग्नेंसी का इलाज / Molar Pregnancy Treatment

मोलर प्रेग्नेंसी के इलाज के लिए सबसे उपयुक्त होता है उस प्रेग्नेंसी को पूरी तरह से खत्म करना। मोलर प्रेग्नेंसी को 3 तरीकों से रिमूव किया जा सकता है। पहला सक्शन इवैल्युएशन या वैक्यूम एस्पीरेशन, जिसमें महिला की योनि के जरिए गर्भ तक पतली ट्यूब डाली जाती है। जिसकी मदद से सक्शन से एब्नार्मल टिश्यूज को बाहर निकाल दिया जाता है। दूसरा मेडिसिन के जरिए और तीसरा डायलेशन एंड क्यूरेटेज सर्जरी के जरिए एब्नार्मल टिश्यूज को रिमूव किया जाता है।




मोलर प्रेग्नेंसी में इन बातों का रखें ख्याल/ Molar Pregnancy Precautions

मोलर प्रेग्नेंसी रिमूव होने के बाद भी महिलाओ को नियमित रुप से चेकअप के लिए बुलाया जाता है। महिलाओं को पूरी तरह से ठीक होने में 6-12 महीने का समय लग जाता है। लेकिन एब्नॉर्मल टिश्यूज यूटेरस के जरिए शरीर के अन्य अंगों तक फैल जाते हैं। जिससे अन्य हिस्सों में कैंसर होने की संभावना बढ़ जाती है। जिसे रुटीन ब्लड टेस्ट करवाया जाए। इसके अलावा डॉक्टर की सलाह पर कीमोथेरेपी, रेडिएशन तकनीक और मेडिसिन के जरिए महिला लगभग 1 साल बादकंसीव कर सकती है। ऐसे में भी शुरुआती दौर में रेग्युलर चेकअप करवाना जरुरी हो जाता है।

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