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'इस गंभीर बीमारी का मिला इलाज'

उड़ीसा के संबलपुर के 18 वर्षीय मनीष भोई के माता-पिता को उम्मीद है कि उनका बेटा अब दर्द और अनिश्चतता से आजाद जिंदगी जी सकेगा।

इस गंभीर बीमारी का मिला इलाज
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स्टेमसेल से दूर हुई बीमारी है प्लोआइडेंटिकल बोन मैरो ट्रांसप्लांट ने उड़ीसा के लड़की की 18 वर्ष पुरानी तकलीफ दूर की। उड़ीसा के एक लड़के का सिकलसेल रोग ठीक हो गया, जब कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी हास्पिटल के डॉक्टर्स ने उसकी छोटी बहन के आंशिक रूप से मेल खाने वाले स्टेम सेल्स मूलकोशिका का ट्रांसप्लांट उसके शरीर में किया। पश्चिमी क्षेत्र के इस प्रकार के पहले इस बोन मैरो ट्रांसप्लांटेशन बीएमटी की काफी सराहना की गई है। सिर्फ लड़के को कष्टदायक बीमारी से छुटकारा दिलाने के लिए ही नहीं, बल्कि साथ ही ऐसे मरीजों के लिए संभावना के दरवाजे खोलने के लिए भी, जिन्हें पूरी तरह मेल खाने वाले दाता नहीं मिल पाते।

उड़ीसा के संबलपुर के 18 वर्षीय मनीष भोई के माता-पिता को उम्मीद है कि उनका बेटा अब दर्द और अनिश्चतता से आजाद जिंदगी जी सकेगा। उसके पिता अरूण कुमार एक प्राईवेट बैंक के अधिकारी ने कहा कि उनके बेटे के जन्म से छह महीनों के भीतर ही उसे सिकल सेल रोग होने का पता चल गया था और तभी से वह शरीर के कई हिस्सों में होने वाले असह्य दर्द के साथ जी रहा है। दर्द पिछले वर्ष से और भी ज्यादा बढ़ गया था। मनीष को हर दूसरे दिन असह्य दर्द के कारण अस्पताल में भर्ती होना पड़ता था। वह रात को चीखकर उठ जाता था, जैसे कोई उसकी हड्डियां तोड़ रहा हो, उसे स्कूल में, नहाते समय या कहीं पर भी दौरे पड़ जाते थे। उसके पिता ने आगे यह भी बताया कि वह स्कूल में बाधा आने के कारण दुखी रहने लगा था।

उसकी उम्मीद टूटने लगी थी, अरूण ने बताया। सिकल सेल रोग एक रक्त का विकार है, जिसमें हीमोग्लोबिन लाल रक्त कोशिकाओं में मौजूद आक्सीजन-वाहन प्रोटीन की संरचना बदल जाती है। इस आनुवांशिक खराबी के कारण लाल रक्त कोशिकाएं सख्त हो जाती है और एक सिकल दरांती का आकार ले लेती है। जिससे रक्त के बहाव में बाधा आने के कारण तेज दर्द, अंगों को नुकसान और स्ट्रोक हो सकता है। अध्ययनों के अनुसार इस बीमारी से पीड़ित 20 प्रतिशत बच्चों की 2 वर्ष की उम्र तक मौत हो जाती है।

बीएमटी इसका एक मात्र ज्ञात इलाज है। जिसमें खराब बोन मैरोको स्वस्स्थ बोन मैरो से बदलकर अनुवांशिक बीमारी दूर की जाती है, लेकिन इसके लिए ऐसे भाई-बहन को ढूंढ़ना पड़ता है, जिसे यह अनुवांशिक रोग न हो। मनीष के मामले में तलाश उसके परिवार से शुरू होते हुए यूएस और जर्मनी की रेजिस्ट्रीज तक गई, लेकिन कहीं भी पूरा मेल नहीं मिल पाया, तभी कोकिला बेन हास्पिटल के डॉक्टर्स ने उसकी 10 वर्षीया छोटी बहन की जांच की, जो पूरी तरह मेल तो नहीं खाती थी, लेकिन उसे आनुवांशिक बीमारी नहीं थी।

हैप्लोआईडेंटिकल बीएमटी आधा मेल खाने वाले भाई-बहन से संभव ट्रांसप्लांट को कहते हैं, जो हाल ही में अनुसंधान और तकनीकी विकास के कारण संभव हो पाया है। ये सिकल सेल के मरीजों को उम्मीद की एक नई किरण देते हं। कोकिलाबेन के पीड़िऐट्रिक ऑन्कोलॉजी कंसल्टंट डॉ. शांतनु सेन ने कहा कि सफल ट्रांसप्लांट के लिए प्रक्रिया का हर कदम महत्वपूर्ण होता है। खासतौर पर इन मामलों में मरीज को पहले ही तैयार करना। हमें मनीष के पूरे ब्लड प्लाज्मा को ऐल्ब्युमिन से बदला पड़ा, ताकि ऐंटीबॉडीज प्रतिरक्षी की और अस्वीकार होने की संभावना कम हो जाए।

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