Hari bhoomi hindi news chhattisgarh
Breaking

Pelvic Pain : पीरियड्स होने वाले दर्द से निजात के लिए अपनाएं ये टिप्स

Pelvic Pain : पीरियड्स के दौरान कई महिलाओं को कम या ज्यादा पेल्विक पेन होता है। लेकिन कई बार यह दर्द असहनीय हो जाता है। ऐसे में लापरवाही ठीक नहीं। पेल्विक पेन का लगातार बने रहना, कई तरह की हेल्थ प्रॉब्लम की तरफ इशारा करता है। जानिए, पेल्विक पेन होने के कारण और उपचार के बारे में।

Pelvic Pain : पीरियड्स होने वाले दर्द से निजात के लिए अपनाएं ये टिप्सPelvic Pain Causes Period Treatment In Hindi

Pelvic Pain : नाभि के नीचे के हिस्से या लोअर एब्डोमन में होने वाला दर्द, पेल्विक पेन कहा जाता है। आमतौर पर पेल्विक पेन पीरियड्स से जुड़ा होता है। हर 6 में से 1 महिला को पीरियड्स शुरू होने से पहले या उसके दौरान पेल्विक पेन की शिकायत रहती है, जो एक्यूट पेल्विक पेन कहलाता है। हालांकि पेल्विक पेन हर महिला की हेल्थ कंडीशन के हिसाब से अलग-अलग होता है।

लेखिका रजनी अरोड़ा के मुताबिक कुछ को यह पेल्विक पेन हल्का-हल्का और रुक-रुक कर होता है, कुछ महिलाओं को लगातार और असहनीय तेज दर्द रहता है। ऐसा पीरियड्स के दौरान हमारी बॉडी में होने वाले हार्मोनल बदलावों के कारण होता है। यूटरस के सिकुड़ने और ब्लड बाहर आने से पेल्विक एरिया या लोअर एब्डोमन में दर्द रहता है। यह पेन आमतौर पर पीरियड्स के साथ खत्म भी हो जाता है। लेकिन कुछ महिलाओं को कई सीरियस हेल्थ प्रॉब्लम्स की वजह से भी पेल्विक पेन की समस्या होती है।

उन्हें पीरियड्स से 8-10 दिन पहले ही तेज दर्द शुरू हो जाता है और पीरियड्स के बाद भी 3-4 दिन तक चलता रहता है। यानी तकरीबन 10-12 दिन या उससे भी ज्यादा दिन तक लगातार असहनीय दर्द रहता है। महिलाओं को यह पेल्विक पेन जब 6 महीने से ज्यादा समय तक लगातार होता रहता है तो वो क्रोनिक रूप ले लेता है।

यह यूटरस, ओवरी, फैलोपियन ट्यूब जैसे रिप्रोडक्टिव ऑर्गन को नुकसान पहुंचा सकता है जिससे इंफर्टिलिटी या एक्टोपिक प्रेग्नेंसी का खतरा बढ़ जाता है, जिसमं् गर्भ सुरक्षित नहीं रहता। इस समस्या को नजरअंदाज बिल्कुल नहीं करना चाहिए, समय पर उपचार कराना चाहिए।




क्या होता है पेल्विक पेन

पेट के नीचे के हिस्से या लोअर एब्डोमन में होने वाला दर्द, पेल्विक पेन कहलाता है। पीरियड्स के दौरान पेट में होने वाले दर्द को ही पेल्विक पेन (Pelvic Pain)कहा जाता है। हर 6 में से 1 महिला को पीरियड्स शुरू होने से पहले या उसके दौरान पेल्विक पेन की शिकायत रहती है, जो एक्यूट पेल्विक पेन कहलाता है।

हालांकि पेल्विक पेन हर महिला की हेल्थ कंडीशन के हिसाब से अलग-अलग होता है। कुछ को यह पेल्विक पेन हल्का-हल्का और रुक-रुक कर होता है, कुछ महिलाओं को लगातार और असहनीय तेज दर्द रहता है। ऐसा पीरियड्स के दौरान हमारी बॉडी में होने वाले हार्मोनल बदलावों के कारण होता है।




समस्या के कारण

महिलाओं में पेल्विक पेन उनके ब्लैडर, रेक्टल, पेट संबंधी, यूरिनरी ट्रैक में इंफेक्शन जैसी हेल्थ प्रॉब्लम के कारण भी होता है। कई बार इसके पीछे एक या अधिक कारण भी हो सकते हैं । यह रिप्रोडक्टिव एज ग्रुप से मेनोपॉज होने तक बना रहता है।

कुछ लड़कियों को जब पीरियड्स शुरू होते हैं, तब पीरियड्स का आउटफ्लो टोरशन ठीक नहीं होता, उनके ऑर्गन में पैदाइशी बनावटी डिफेक्ट भी हो सकते हैं। ओवरी में सिस्ट हो सकती है, जिससे पीरियड्स ठीक से ड्रेन नहीं हो पाता।

यह सिस्ट ट्विस्ट होती रहती है, जो बढ़कर ओवरी टोरशन बन जाते हैं, जिससे ओवरी खराब हो सकती है। इन सभी वजहों से पेल्विक पेन होता है। ऐसी सिचुएशन में जल्द से जल्द डॉक्टर को कंसल्ट करना चाहिए।




पेल्विक इंफ्लेमेटरी डिजीज : कई बार इंटरकोर्स के दौरान पर्सनल हाइजीन का ध्यान न रखने की वजह से सर्वाइकल सर्विक्स पर जख्म हो जाते हैं। यह सेक्सुअली ट्रांसमिटेड डिजीज, बैक्टीरियल इंफेक्शन है।

यह दो बैक्टीरिया की वजह से होती है-क्लैमाइडिया और गोनोरिया। इसमें बैक्टीरिया वैजाइना के रास्ते से फैलोपियन ट्यूब से बाहर आकर यूटरस और ओवरी को प्रभावित करते हैं। इससे इंफेक्शन पेट में फैल जाता है।

कई बार इंफेक्शन अंदर ही अंदर फैल कर यूटरस को नुकसान पहुंचाता है। यूरीन में जलन, दर्द, बदबू, एब्नार्मल डिस्चार्ज होना, बुखार आना या पेल्विक एरिया में सूजन और असहनीय दर्द होना, गोनोरिया इंफेक्शन के लक्षण हैं।

एंटीबॉयोटिक्स मेडिसिन लेने के बावजूद ये इंफेक्शन अगर इस स्टेज पर ठीक नहीं होते तो ये क्रॉनिक बन जाते हैं। एंटीबॉयोटिक्स रेजिस्टेंस होने पर यह इंफेक्शन फैलोपियन ट्यूब को डैमेज कर देते हैं। जिससे लगातार पेल्विक पेन रहने लगता है और यह इंफर्टिलिटी का कारण बनता है।

पेल्विक कंजेशन सिंड्रोम : इसे पेल्विक वेन इनकॉम्पिटेंस कहते हैं। इसमें मरीज की हिप्स, वैजाइना और थाइज की वैरिकोज वेंस में सामान्य से अधिक खिंचाव आ जाता है। जो असहनीय पेल्विक पेन का कारण होता है।

पोस्ट मेनोपॉज ब्लीडिंग : मेनोपॉज के बाद बड़ी उम्र की महिलाओ में पेल्विक पेन और डिस्चार्ज कैंसर का साइन हो सकता है। उन्हें ब्राउन डिस्चार्ज या स्पॉटिंग शुरू हो जाती है और तेज पेल्विक पेन होता है।

ब्लैडर इंफेक्शन : यूटरस के आगे यूरिनरी ब्लैडर होता है, जिसकी इंटरनल ब्लैडर लाइनिंग में ई. कोलाई बैक्टीरिया के कारण इंटरस्टिशियल सिस्टाइटिस इंफेक्शन हो जाता है। यह बैक्टीरिया इंटरकोर्स में हाइजीन का ध्यान न रखने, गर्भनिरोधकों का इस्तेमाल न करने या पुरुष के मल्टीपल रिलेशंस की वजह से पीड़ित महिला में आते हैं। इसकी वजह से महिला के कोइंटरनल ब्लैडर लाइनिंग यूरेथ्रा में क्रॉनिक पेन, सूजन और यूरीन में जलन, यूटीआई की प्रॉब्लम लगातार रहने लगती है।

इरिटेबल बॉवेल सिंड्रोम : कई महिलाओं को इंटेस्टाइन या आंतों में खराबी होने पर भी पेल्विक पेन होता है। इससे उन्हें पेट फूलना, सूजन, दस्त, कब्ज, दर्द जैसी समस्याएं होती हैं, जिससे पेल्विक एरिया में दबाव पड़ता है और दर्द रहता है।

मस्कुलोस्केलेटल सिस्टम प्रॉब्लम्स : महिला को पेल्विक एरिया की हड्डियों, ज्वाइंट्स और मसल्स में चोट लगने से पेल्विक एरिया में सूजन और दर्द रहता है। इन समस्याओं के अलावा एडिनोमायोसिस, फ्राइब्रॉयड, सिजेरियन कॉर्ड इफेक्ट, एक्टोपिक प्रेग्नेंसी, जेनाइटल टीबी- एडिनोमायोसिस होने पर भर पेल्विक पेन होता है।




संभव है उपचार

पीरियड्स के दौरान होने वाले एक्यूट पेल्विक पेन को डिस्मोनेरिया कहा जाता है। डॉक्टर पीरियड्स में होने वाली समस्याओं को दूर करने के लिए पेनकिलर मेडिसिन देते हैं और डाइट का ध्यान रखने के लिए कहते हैं। ये मेडिसिन यूटरस की मसल्स को रिलैक्स करके दर्द कम करती हैं।

जरूरत पड़ने पर महिला के यूटरस में मरीना हार्मोन कॉयल या प्रोजेस्टिन-रिलीज इंट्राब्रायटरी डिवाइस लगा दी जाती है या हार्मोनल इंजेक्शन दिए जाते हैं। इससे पीरियड्स और उससे होने वाला दर्द 3-5 महीने के लिए खत्म हो जाता है।

महिला से बातचीत करके केस हिस्ट्री और पर्सनल इंटरनल चेकअप करके पेल्विक पेन की स्थिति का पता लगाया जाता है। पेट, यूटरस, वैजाइना का एग्जामिन होता है। इसके बाद सेक्सुअली ट्रांसमिटेड डिजीज की पुष्टि के लिए मरीज का यूरीन सैंपल, वैजाइनल एरिया से स्वैप लेकर उसका कल्चर टेस्ट कराया जाता है।

कल्चर से इंफेक्शन फैलाने वाले बैक्टीरिया का पता चल जाता है। इसके साथ ही अल्ट्रासाउंड, लेप्रोस्कोपिक, बॉयोप्सी, एमआरआई से भी परीक्षण किया जाता है। मरीज की स्थिति के हिसाब से दो हफ्ते का एंटीबॉयोटिक्स मेडिसिन का कोर्स दिया जाता है। इससे स्थिति में काफी सुधार होता है।


Share it
Top