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Health Tips: क्या होता है प्री- मैच्योर मेनोपॉज, जानें इसके लक्षण और करें बचाव

एक निश्चित उम्र के बाद मेनोपॉज होना तो स्वाभाविक है, लेकिन जब ऐसा काफी पहले हो जाए तो इसे प्री-मैच्योर मेनोपॉज कहते हैं। ऐसा कई वजहों से हो सकता है और इसका शरीर पर बुरा प्रभाव भी पड़ता है। ऐसा आपके साथ ना हो, इसके लिए कुछ जरूरी बातों के बारे में आपको पता होना चाहिए।

Health Tips: क्या होता है प्री- मैच्योर मेनोपॉज, जानें इसके लक्षण और करें बचाव
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Health Tips: हर महिला के शरीर में होने वाली एक कुदरती प्रक्रिया है, मेनोपॉज (Menopause)। आमतौर पर 45-55 साल की उम्र में महिलाओं में मेनोपॉज होता है। लेकिन कुछ मामलों में यह मेनोपॉज 40 साल से भी कम उम्र में ही हो जाता है, जिसे प्री-मैच्योर (Premature Menopause) या अर्ली मेनोपॉज (Early Menopause) कहते हैं। कई महिलाओं की ओवरी (Ovary) में अंडे की संख्या कम होने से मेनोपॉज 30-32 साल में भी हो जाता है। लेकिन केवल 1 प्रतिशत महिलाएं ही ऐसी होती हैं, जिनमें प्री-मैच्योर मेनोपॉज देखा जाता है। अपनी इस स्टोरी में हम आपके लिए लेकर आए हैं गुरुग्राम की स्त्री रोग विशेषज्ञ (Gynecologist) डॉ. रमनदीप (Dr. Ramandeep) से अर्ली मेनोपॉज से जुड़ी तमाम जानकारियां।

क्या है मेनोपॉज

आमतौर पर हर लड़की को किशोरावस्था या रिप्रोडक्टिव उम्र शुरू होने के बाद से हर महीने मासिक रक्तस्राव यानी पीरियड्स होते हैं, जो एस्ट्रोजन हार्मोन के प्रभाव से होता है। इस प्रक्रिया में हर महीने महिला की ओवरी में एक अंडा बनता है। यह अंडा मासिक चक्र के साथ धीरे-धीरे बड़ा होकर फूट जाता है। इसे ओव्यूलेशन कहा जाता है। जिसके 14 दिन के अंदर पीरियड्स शुरू हो जाते हैं और अगला मासिक चक्र शुरू हो जाता है। उम्र बढ़ने के साथ-साथ शरीर में एस्ट्रोजन हार्मोन का स्राव कम होता जाता है और प्रोजेस्ट्रोन हार्मोन की मात्रा बढ़ने लगती है, जिससे ओवरी में अंडे के निर्माण की प्रक्रिया कम हो जाती है। पीरियड्स अनियमित होने लगते हैं और धीरे-धीरे बंद हो जाते हैं यानी मेनोपॉज की स्थिति आ जाती है।

समय पूर्व मेनोपॉज के कारण

  • फैमिली हिस्ट्री में यह प्रॉब्लम रही हो, जिसकी रोकथाम संभव नहीं है।
  • हार्मोनल असंतुलन यानी एस्ट्रोजन और प्रोजेस्ट्रॉन हार्मोन का लेवल कम होना।
  • शारीरिक वजन सामान्य से ज्यादा होना।
  • कैंसर के उपचार के लिए रेडियोथेरेपी या कीमोथैरेपी कराने से।
  • हाइपोथायरॉयड, डायबिटीज जैसी ऑटोइम्यून डिजीज या डिप्रेशन या साइकोसिस की लंबे समय से दवाइयां लेने पर।
  • एंडोमैट्रियोसिस या ओवेरियन सिस्ट के उपचार के लिए हिस्टेरेक्टॉमी सर्जरी हुई हो, जिसमें यूटरस या ओवरी को निकालना पड़ता है।
  • अनहेल्दी डाइट और अनहेल्दी लाइफस्टाइल होना।
  • ज्यादा धूम्रपान करना या एल्कोहल लेना।

रिस्क फैक्टर्स

अर्ली मेनोपॉज होने से महिलाओं के ओवरी में बनने वाले अंडों की क्वांटिटी और क्वालिटी खराब हो जाती है, इससे प्रेग्नेंसी में समस्या होती है और गर्भधारण के लिए उन्हें आईवीएफ जैसी तकनीक का सहारा लेना पड़ सकता है। इसके अलावा अर्ली मेनोपॉज होने से महिलाओं को ऑस्टियोपोरोसिस, जोड़ों में दर्द, ओवेरियन कैंसर, हार्ट संबंधी बीमारियां होने का खतरा भी रहता है।

प्रमुख लक्षण

अर्ली मेनोपॉज होने पर महिलाओं में शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य संबंधी कई तरह की समस्याएं होने लगती हैं जैसे-इररेग्युलर पीरियड्स होना, बेचैनी महसूस करना, चिड़चिड़ापन, घबराहट, स्किन में ड्रायनेस, वेजाइना एरिया में इचिंग, यूरिन इंफेक्शन, हाथ-पैर सुन्न हो जाना, सांस फूलना, बाल झड़ना, वजन बढ़ना, हड्डियां कमजोर होना, जोड़ों में दर्द रहना। इनके अलावा नींद ना आना, डिप्रेशन, अकेलापन, हॉट या कोल्ड फ्लैशेज, मूड स्विंग, याद्दाश्त कम होना जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं।

उपचार के तरीके

अर्ली मेनोपॉज होने पर डॉक्टर पेशेंट को हार्मोन रिप्लेसमेंट थेरेपी लेने की सलाह देते हैं ताकि इन लक्षणों पर कंट्रोल किया जा सके। कुछ महिलाओं में ये लक्षण बहुत ज्यादा होते है, जिसके लिए डॉक्टर उन्हें एस्ट्रोजन थेरेपी भी देते हैं। हार्मोंस की ओरल टैबलेट दी जाती है या हार्मोन पैच लगाए जाते हैं। लेंकिन हार्मोन रिप्लेसमेंट थेरेपी एक नियत समय तक दी जाती है। ज्यादा देने से कैंसर या हार्ट संबंधी बीमारियां होने का रिस्क बढ़ जाता है। बोन डेंसिटी बनाए रखने के लिए कैल्शियम और विटामिन डी की दवाइयां दी जाती हैं।

ऐसे हो सकता है बचाव

हालांकि मेनोपॉज नेचुरल प्रक्रिया है, इसे टाला नहीं जा सकता है। लेकिन अपने हेल्थ को सही रखकर प्री-मैच्योर मेनोपॉज से बचाव जरूर किया जा सकता है। इसके लिए साल में एक बार होल बॉडी चेकअप जरूर कराएं ताकि किसी भी बीमारी की आशंका होने पर समुचित उपचार किया जा सके। इसके साथ ही अपनी लाइफस्टाइल को सही रखना भी जरूरी है। संतुलित और पौष्टिक तत्वों से भरपूर डाइट लें, जो प्रोटीन, फाइबर, विटामिन-मिनरल्स और कैल्शियम रिच हो। ड्राई फ्रूट्स और सीड्स जरूर लें। विटामिन डी की कमी को पूरा करने के लिए रोजाना 30 मिनट धूप सेंकें। मीठी चीजों का सेवन ज्यादा ना करें। धू्म्रपान और एल्कोहल से परहेज करें। इसके साथ ही रेग्युलर एक घंटा एक्सरसाइज करें, जिससे आपकी मसल्स स्ट्रॉन्ग रहें, शरीर में फ्लेक्सिबिलिटी बनी रहेगी, जिससे हार्मोन रिलीज होने में मदद मिलती है। योगा-प्राणायाम करें। तनाव से बचने के लिए अपनी हॉबीज को भी जरूर टाइम दें।

प्रस्तुति : रजनी अरोड़ा (Rajni Arora)

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