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सावधान ! वायु प्रदूषण से आप हो सकते हैं हिंसक, रिसर्च में हुआ खुलासा

लगातार बढ़ता प्रदूषण हम सभी को कई गंभीर बीमारियों का शिकार बना रहा है, लेकिन क्या आप जानते हैं, कि प्रदूषण से इंसान हिंसक भी हो सकता है, ये खुलासा चीन के शंघाई में हुई एक रिसर्च में सामने आया जबकि ऑस्ट्रेलिया में हुई रिसर्च में वायु प्रदूषण को मौत के सबसे बड़े कारणों में से एक पाया है। आइए जानते हैं क्या कहती हैं, वायु प्रदूषण पर की गई शोध...

Delhi Air Pollution: दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण को लेकर बैठक का दौर शुरूवायु प्रदूषण (फाइल फोटो)

आज के दौर में बढ़ता प्रदूषण दुनिया में एक गंभीर चिंता का विषय बना हुआ है, इसलिए विश्व के कई देशों में वायु प्रदूषण के साइड इफेक्ट्स और नुकसान पर वैज्ञानिक लगातार शोध कर रहे हैं। हाल ही में शंघाई और लंदन में हुई रिसर्च के मुताबिक, वायु प्रदूषण के संपर्क में आने से शरीर में सल्फर डाइऑक्साइड का स्तर बढ़ जाता है, जिससे मस्तिष्क पर बेहद नकारात्मक असर पड़ता है। जिसमें युवाओं में बढ़ती हिंसक प्रवृति और गुस्सा प्रमुख है।

रिसर्च के मुताबिक, वायु प्रदूषण के कारण मस्तिष्क में सूजन और लगातार लंबे समय तक पारटिकुलेट मैटर (हवा में तैरने वाले अदृश्य और नुकसानदेह कण) की बढ़ी हुई मात्रा मस्तिष्क और तंत्रिकाओं के तंत्र को नुकसान पहुंचा कर हमारे व्यवहार पर असर डाल रहे हैं।

अमेरिका के 9,360 शहरों में भी वायु प्रदूषण पर किए गए अध्ययन से भी इस बात की पुष्टि होती है कि वायु प्रदूषण से एंग्ज़ाइटी बढ़ती है। जिससे लोगों में खासकर युवाओं में आपराधिक और अनैतिक व्यवहार की घटनाओँ में इजाफा होता है।

रिसर्च में पाया गया कि जिस शहर की हवा सबसे ज्यादा प्रदूषित थी वहां का क्राइम रेट भी बढ़ा हुआ था। आपराधिक घटनाओं और व्यवहार के अलावा एयर पॉल्युशन में मौजूद हानिकरक पार्टिकल्स दिल और सांस की बीमारियों से होने वाली मौतों को बढ़ाने में अहम भूमिका निभाता है।

इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन में प्रकाशित हुई एक शोध को पूरा होने में लगभग 30 साल लगे, जिसमें 24 देशों और क्षेत्रों के 652 शहरों में वायु प्रदूषण और मृत्युदर के आंकड़ों का अध्ययन किया गया।

ऑस्ट्रेलिया में मोनाश विश्वविद्यालय में प्रोफेसर युमिंग गुओ ने बताया कि 'पार्टिकुलेट मैटर (पीएम) और मृत्युदर के बीच कोई सीधा संबंध नहीं है, लेकिन लंबे समय तक इनहेल करने योग्य कणों (पीएम10) और फाइन कणों (पीएम2.5) की अधिक मात्रा के संपर्क में रहने से वायुमंडलीय रासायनिक परिवर्तन की वजह से मौत का खतरा बढ़ सकता है।

गुओ ने कहा, एयर पॉल्युशन के जरिए जितने छोटे कण सांस (श्टॉक्सिक कॉम्पोनेंट) के साथ शरीर में पहुंच जाते हैं उतनी ही तेजी से फेफड़ों को नुकसान और मौत की संभावना बढ़ जाती है।

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