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फ्रेंडशिप डे स्पेशल: एक कला है दोस्त बनाना

दरअसल, यह दोस्ती का भाव ही है, जिसने हमसे ईश्वर की रचना करवाई है।

फ्रेंडशिप डे स्पेशल: एक कला है दोस्त बनाना
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नई दिल्ली. इंसानी सभ्यता के विकास के पहले चरण में ही हमने दोस्ती की महत्ता को समझ लिया था। अपने घर-परिवार से बाहर अंजान व्यक्ति से संबंध स्थापित करने की दिशा में बढ़ाए गए दोस्ती के कदम ने ही सामाजिक ढांचे की नींव रखी। यही वजह है कि सदियां बीत जाने के बाद भी इस अनोखे रिश्ते की खूबसूरती और इसकी हमारे जीवन में महत्ता बरकरार है।
मार्क ट्वेन ने अपनी एक कविता ‘युद्ध भूमि में प्रार्थना’ में लिखा है, ‘भगवान से पहले युद्ध के समय दोस्त काम आते हैं।’शहीद भगत सिंह ने समाजवादी दर्शन की विवेचना करते हुए कहा था, ‘किसी भी इल्म से, दर्शन से, बड़ा फलसफा है दोस्ती का।’ शायद यही वजह है कि चाहे दुनिया पहिए से रॉकेट युग में पहुंच गई हो, लेकिन दोस्ती की संवेदना में, दोस्ती की भावना में जरा भी फर्क नहीं आया।
पहला सामाजिक रिश्ता
समाज विज्ञान का इतिहास लिखने वाले समाजशास्त्री कहते हैं, ‘दुनिया का सबसे पहला रिश्ता दोस्ती का था।’ आदमी ने जब अपने आपको जानवरों से अलग किया तो उसे जिस नजदीकी रिश्ते के बोध ने जानवरों से अलग किया और बाद में आज तक के सफर का हमसफर बनाया वह बोध, दोस्ती का ही था। यह अलग बात है कि वह दोस्ती सहयोग और फायदे का सौदा थी। जब इंसान ने अपने को जानवरों से अलग किया तो उसके दिमाग में यह विचार आया कि आखिर वह कौन सा तरीका हो सकता है, जिससे जानवरों से बचा जा सकता है और तब इस बात पर आकर दिमाग रुका कि अगर आदमी आपस में एकजुट होकर रहे तो जानवरों का सामना आसानी से किया जा सकता है। दोस्ती की यही बुनियाद थी, जो बाद में विकसित होते-होते तमाम भावनात्मक एवं संवेदनात्मक सीढ़ियों को चढ़ते हुए आज यहां तक पहुंची है कि कुछ लोगों के लिए दोस्ती से बड़ा दुनिया में कोई रिश्ता नहीं है।
दोस्ती पर आधारित महान साहित्य
महान विचारक कार्ल मार्क्स के बारे में एंगेल्स ने लिखा है कि उन्हें दो ही लोग विचलित कर सकते थे या तो उनकी पत्नी जेनी, जो पत्नी से ज्यादा दोस्त थीं और खुद एंगेल्स जिनकी दोस्ती मार्क्स के साथ वैसी ही थी, जैसे महाभारत में कर्ण और दुर्याेधन की दोस्ती। मजे की बात यह है कि दुनिया में जितना साहित्य रचा गया है, उसमें सबसे ज्यादा साहित्य दोस्ती पर ही है। चाहे दोस्त की महानता पर हो, दोस्त के त्याग पर हो या फिर दोस्ती के विश्वासघात पर। दुनिया के तमाम महान ग्रंथ दोस्तों के त्याग और दोस्ती में हुए छल-कपट के ही ब्यौरे हैं। होमर का ओडेसी, कृष्ण द्वैपायन वेद व्यास का महाभारत सबके सब दोस्ती की जय और विजय गाथाओं के ब्यौरे हैं।
नहीं बदला दोस्ती का भाव
समय बदलता है, सोच बदल जाती है और जरूरतें भी, लेकिन सामाजिक इतिहास इस बात की तस्दीक करता है कि समय बदलने के साथ न तो दोस्ती की जरूरत बदलती है और न ही दोस्ती का भाव। सवाल है दोस्ती इतना अजर-अमर रिश्ता क्यों है? इसके कई जवाब हैं। कुछ विज्ञान से, कुछ भावनाओं से। महान वैज्ञानिक अलबर्ट आइंस्टीन ने एक बार कहा था, ‘अगर ईश्वर है (...और मैं समझता हूं भले ईश्वर वैसे ही न हों जैसे कि माना जा रहा है; लेकिन कुछ न कुछ तो है) तो इंसान के जैविक संरचना में दोस्ती का एक स्थाई भाव भी है।
दरअसल, यह दोस्ती का भाव ही है, जिसने हमसे ईश्वर की रचना करवाई है।’
दोस्ती के बारे में भारत के सबसे क्रांतिकारी विचारक और देशभक्त भगत सिंह ने कहा था, ‘यह कुछ न कुछ तो है, जो दिलों में तूफान पैदा करती है। दोस्ती में पहाड़ों से कूद जाने का दिल करता है और हंसते-हंसते जान देने में जरा भी असहजता नहीं महसूस होती। इसलिए यह कुछ न कुछ तो है।’
कुछ समाजशास्त्रियों का 80 के दशक में विचार था जिसमें आल्विन टोएफलर (फ्यूचर शॉक) प्रमुख थे, जो मानते थे कि जैसे-जैसे तकनीक का विकास होगा, दोस्ती का खात्मा हो जाएगा। दोस्ती की जरूरतें खत्म हो जाएंगी। मगर ऐसा नहीं हुआ और न ही कभी होगा। दोस्ती आज भी है, कल भी रहेगी और सदियों-सदियों कायम रहेगी।
एक कला है दोस्त बनाना
आप भले यकीन न करें लेकिन सच है कि दोस्ती करना वाकई एक कला है और यह भी तय है कि यह कला सबको नहीं आती। लेकिन इसकी जरूरत सभी को पड़ती है। दोस्ती करने का गुण जिसमें होता है, उसे जिंदगी में बहुत सारी परेशानियों से स्वत: मुक्ति मिल जाती है। कुल मिलाकर दोस्ती करने का गुण जिंदगी के लिए एक फायदेमंद सौदा ही है। इसलिए अगर आपको यह कला नहीं आती तो यहां बताए जा रहे टिप्स फॉलो करें, ये जरूर आपको दोस्ती करने में मददगार साबित होंगे।
- जब भी किसी नए व्यक्ति से मिलें और उससे दोस्ती का हाथ बढ़ाना चाहें तो कुछ सामान्य शिष्टता का पालन करें। मसलन, किसी अपिरिचित को भूलकर भी ‘तुम’ या ‘तू’ जैसे शब्दों से संबोधित न करें। भले वह कितना ही अनौपचारिक लग रहा हो।
-किसी नए व्यक्ति से मिलते ही उस पर अपनी काबिलियत, एजुकेशन या दौलत का रौब न डालें।
- किसी अपरिचित व्यक्ति के साथ बातचीत करते हुए उबासियां न लें, क्योंकि अगर आपने किसी अपरिचित के साथ बातचीत करते हुए उबासी ली तो इसका मतलब होगा कि आप बोर हो रहे हैं। ऐसे में वह तुरंत समझ जाएगा कि आप अब और ज्यादा बातचीत नहीं करना चाहते।
-किसी भी नए व्यक्ति के साथ बातचीत करते हुए न तो आप उसे लगातार सुनाते रहें और न ही लगातार सिर्फ उसे सुनते रहें। अगर आप नए-नए परिचित हुए व्यक्ति को बोलने का मौका ही नहीं देंगे तो वह आप से किस तरह जुड़ पाएगा। लेकिन अगर आप चुप्पे बने रहे और वही एकालाप के स्वर में बोलता रहा तो यह भी बोरियत भरा बर्ताव होगा।
- ध्यान रखें नए-नए परिचित व्यक्ति की वैयक्तिक जिंदगी के बारे में जानने की कभी उत्सुकता न दिखाएं।
- किसी नए परिचित व्यक्ति की तारीफ में कंजूसी न करें लेकिन उसे इतना भी महिमामंडित न करें कि आपकी तारीफ चापलूसी लगने लगे।
- हमेशा पहल की अपेक्षा ही न करें। दोस्ती करना चाहते हैं तो पहल भी करना सीखें।
- पहली बार परिचित हुए किसी व्यक्ति पर अपने ज्ञान का रौब भी न डालें।
- उससे उसकी सैलरी (यदि पुरुष हो) और उम्र (यदि औरत हो) के बारे में बिल्कुल न पूछें।
- संतुलित व्यवहार करें। बातचीत का संदर्भ वही रखें, जिसमें इस नए व्यक्ति की भी रुचि हो।
-उसके कपड़ों की क्वालिटी और उनकी कीमत के बारे में कतई न पूछें।
-अगर महिला है तो आप उसके मोबाइल का नंबर मांगने की बेतकल्लुफी न दिखाएं और अगर पुरुष हो तो पहली मुलाकात में ही
कोई योजना बनाने का उत्साह न दिखाएं।
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