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फैटी लीवर : जानिए इसके लक्षण, कारण और उपचार

इन दिनों नॉन एल्कोहलिक फैटी लीवर डिजीज से ग्रसित होने वालों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। इसकी कई वजहें हो सकती हैं। अगर इसमें लापरवाही बरती जाए तो कंडीशन बिगड़ सकती है। ऐसे में इसके कारण और लक्षणों को पहचानकर तुरंत प्रॉपर ट्रीटमेंट कराना चाहिए।

फैटी लीवर : जानिए इसके लक्षण, कारण और उपचार

Fatty Liver Disease

वर्तमान समय में डबल्यूएचओ (WHO) के अनुमान के हिसाब से दुनिया भर में एक अरब से अधिक लोग ओवरवेट हैं। मोटे रोगियों में नॉन एल्कोहलिक फैटी लीवर डिजीज (एनएएफएलडी) की संभावना 75 से 100 प्रतिशत तक हो सकती है। आपके लीवर में फैट जमा होने का मतलब है भविष्य में डायबिटीज (Diabetes) होने का खतरा। लेकिन इस स्तर पर आपको घबराने की नहीं बल्कि अलर्ट होने की जरूरत है। सिर्फ ज्यादा शराब पीने से ही लीवर खराब नहीं होता। बहुत अधिक सॉफ्ट ड्रिंक्स और पैक्ड जूस पीने वालों में भी लीवर सिरोसिस बीमारी (Liver Cirrhosis Disease) होने की आशंका होती है।
कुछ सालों से नॉन एल्कोहलिक फैटी लीवर के मामले भी तेजी से सामने आ रहे हैं। मोटापा (Obesity) और डायबिटीज (Diabetes) भी एनएएफएलडी के कारण हो सकते हैं। आज के दौर में एनएएफएलडी, लीवर संबंधी परेशानियों का बड़ा कारण है। इसमें लीवर का साइज सामान्य से बड़ा हो सकता है और सामान्य कोशिकाओं का स्थान डेमेज्ड कोशिकाएं ले सकती हैं, जो आगे चलकर लीवर सिरोसिस(Liver Cirrhosis), लीवर फेलियर (Liver Failure) लीवर कैंसर (Liver Cancer) का कारण बन सकता है।

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क्या है डिजीज

एनएएफएलडी टर्म उन लोगों के लिए इस्तेमाल किया जाता है, जो बहुत कम एल्कोहल लेते हैं या बिल्कुल नहीं लेते। इसके बावजूद उनके लीवर में फैट जमा हो जाता है। इसका संबंध कमर की चौड़ाई, इंसुलिन रेजिस्टेंस, रक्त में फैट की मात्रा ज्यादा होने, हाई कॉलेस्ट्रॉल आदि से होता है। साथ ही लीवर में फैट जमा होने से इंसुलिन की उत्पादन क्षमता पर असर पड़ता है।
इसे नॉन एल्कोहलिक फैटी लीवर डिजीज के नाम से जाना जाता है क्योंकि इसके लिए एल्कोहल जिम्मेदार नहीं होता। ऐसे ज्यादातर लोगों को भविष्य में डायबिटीज तो होती ही है, कई मामलों में लीवर सिरोसिस भी देखा जाता है।

प्रमुख लक्षण

एनएएफएलडी में शराब पीने वालों के मुकाबले लक्षण बहुत कम या होते ही नहीं हैं। मरीज सिर्फ थकान, पेट के ऊपरी हिस्से में हल्की सी तकलीफ और कुछ मामलों में हल्की पीलिया होने के लक्षणों की शिकायत करता है। प्रारंभिक अवस्था में इसमें कोई खास लक्षण उत्पन्न नहीं होते हैं। कभी-कभी पेट की दाहिनी ओर हल्का दर्द महसूस होता है, जो लीवर में फैट की वृद्धि के कारण उत्पन्न होता है।
बाद में यह बढ़ते हुए लीवर सिरोसिस की स्थिति उत्पन्न कर देता है, जिसे फूले हुए पेट, त्वचा में खुजलाहट, उल्टी, मांस-पेशियों में कमजोरी और आंखों में उत्पन्न पीलेपन से पहचाना जा सकता है। पेट के ऊपरी हिस्से में दर्द, बदहवासी और वजन तेजी से कम होना आदि लक्षण भी हो सकते हैं।

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कारण

कुछ परिवारों में यह रोग आनुवांशिक रूप से देखा जाता है। अत्यधिक दवाओं के सेवन, वायरल हेपेटाइटिस, अचानक वजन कम होने और कुपोषण के कारण भी यह रोग उत्पन्न हो सकता है। हाल के अध्ययनों के अनुसार आंतों में कुछ विशेष प्रकार के जीवाणुओं की वृद्धि भी एनएएफएलडी का कारण बन सकती है। एनएएफएलडी के अधिकांश मामलों में लोग सॉफ्ट ड्रिंक्स या पैकेट वाले जूस के साथ रोजाना 10-12 चम्मच शुगर लेते हैं।

पॉसिबल है ट्रीटमेंट

फैटी लीवर का सबसे ज्यादा खतरा ओवरवेट और डायबिटीज से होता है। इसलिए डायबिटीज होने या वजन बढ़ने पर समय-समय पर मरीजों को लीवर फंक्शन टेस्ट कराते रहना चाहिए। जैसे ही लीवर में चर्बी के लक्षण दिखें तो सतर्क हो जाना चाहिए। तुरंत विशेषज्ञ से मिलना चाहिए। खान-पान और जीवनशैली को नियंत्रित करना चाहिए। नियमित व्यायाम और प्राणायाम आदि भी आपके उपचार में मददगार साबित होंगे।
फैटी लीवर का शुरुआती दौर में पता चल जाए तो इसका इलाज संभव है। बाद में धीरे-धीरे लीवर सिरोसिस का खतरा बढ़ जाता है। कई बार निडिल बायोप्सी की भी जरूरत होती है। वहीं बैरिएट्रिक सर्जरी एक प्रभावी उपचार विकल्प है, उनके लिए जो मोटापे से ग्रसित होते हैं। इन रोगियों में बेरिएट्रिक सर्जरी से यकृत में सूजन और फाइब्रोसिस के ग्रेड में कमी की जा सकती है।
(लेखक मैक्स सुपर स्पेशिएलिटी हॉस्पिटल, दिल्ली में डायबिटीज-मेटाबॉलिक डिजीजेज के सीनियर कंसल्टेंट हैं)
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