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पापा की लाडली होती हैं बेटियां, जानें इन फेमस हस्तियों की सफलता के पीछे कैसे रहा पिता का साथ

फादर्स डे इस साल 17 जून को मनाया जाएगा। फादर्स डे जून का तीसरे रविवार को मनाया जाता है। फादर्स डे के मौके पर हम एक स्पेशल रिपोर्ट पेश कर रहे हैं, जिसमें कुछ फेमस हस्तियों की सफलता में उनके पिता ने भरपूर साथ दिया है।

पापा की लाडली होती हैं बेटियां, जानें इन फेमस हस्तियों की सफलता के पीछे कैसे रहा पिता का साथ
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Father's Day 2018

फादर्स डे इस साल 17 जून को मनाया जाएगा। फादर्स डे जून का तीसरे रविवार को मनाया जाता है। फादर्स डे के मौके पर हम एक स्पेशल रिपोर्ट पेश कर रहे हैं, जिसमें कुछ फेमस हस्तियों की सफलता में उनके पिता ने भरपूर साथ दिया है। पिता और बेटी का रिश्ता बहुत ही अनोखा और प्यारा-प्यारा होता है। अपनी लाडली को अथाह स्नेह तो वे देते ही हैं, साथ ही उसके जीवन को संवारने का हर संभव प्रयास भी करते हैं।

समय-समय पर छोटी-बड़ी सीख देते, आगे बढ़ने का हौसला मन में भरते और मुश्किल समय में बेटी का संबल भी बनते हैं।

अपने पिता से जुड़े भीने-भीने कुछ ऐसे ही अहसासों को हरिभूमि से साझा कर रही हैं, अलग-अलग क्षेत्रों की जानी-मानी हस्तियां-

नलिनी-कमलिनी, कथक नृत्यांगनाएं

कथक नृत्य के क्षेत्र में नलिनी-कमलिनी बहनों का नाम बहुत प्रतिष्ठित है। दोनों का ही मानना है कि वे इस मुकाम को हासिल न कर पातीं, अगर उनके पिता (स्व. भगवान प्रसाद अस्थाना) ने प्रोत्साहन न दिया होता, आगे बढ़ने का हौसला मन में न भरा होता।

आज भी दोनों के मन में अपने पिता से जुड़ी हर याद गहरे तक बसी हुई है। नलिनी कहती हैं, ‘पिता जी हमारे आदर्श थे। उनके व्यक्तित्व से, जीवन से हमने बहुत कुछ सीखा। पिता जी एयरफोर्स में थे, बहुत ही अनुशासन प्रिय।

पिता के कारण ही हमने भी अपने जीवन में अनुशासन के महत्व को समझा। आज अगर हम नृत्य के क्षेत्र में इतनी ऊंचाई पर हैं, सफल हैं तो इसका कारण भी पिताजी हैं।

उन्होंने ही हमें प्रोत्साहित किया कि हम अपने शौक को अपना हुनर बनाएं। जबकि उस दौर में लड़कियों के नृत्य सीखने का चलन नहीं था। लेकिन पिताजी ने किसी की परवाह नहीं की, वे बस हमारी खुशी को महत्व देते थे।’

नलिनी की बात को आगे बढ़ाते हुए कमलिनी बताती हैं, ‘मुझे याद है पिताजी ने ही हमें हमारे गुरु जी से मिलवाया था। इसके बाद हमारे नृत्य की शिक्षा शुरू हुई। हमें आगे बढ़ते हुए देखकर पिता जी बहुत खुश होते थे।

वह चाहते थे कि हम नृत्य के क्षेत्र में शिखर तक पहुंचें। एक बार मां ने मुझे बताया कि जब मैं बहुत छोटी थी तो पिताजी अकसर आगरा की उस सड़क पर मुझे साथ लेकर पैदल चलते थे, जो सड़क ताजमहल की तरफ जाती थी।

दरअसल, वह चाहते थे कि हम भी ताज की तरह दुनिया भर में प्रसिद्ध हों। इस बात को जब भी मैं याद करती हूं तो लगता है कि पिता जी कितना बड़ा और कितना आगे का सोचते थे। हमारे जीवन को संवारने में, बनाने में पिताजी की भूमिका बहुत बड़ी रही है।’

अपने पिता की सीखों को याद करते हुए कमलिनी कहती हैं, ‘हमारे पिताजी की सोच बहुत बड़ी थी। सिर्फ डांस में करियर बनाने को लेकर प्रोत्साहन देने की बात नहीं है, पिताजी की दी हुई कई सीखें हमारे जीवन को आज भी संवार रही हैं।

पिताजी ने हमें बचपन में ही अच्छे और बुरे की सीख दी थी। वह हमसे हमेशा कहते थे कि अच्छे काम करो, लोगों की मदद करो, इसी में जीवन की सार्थकता है। कभी हम कोई गलती करते तो पिताजी डांटते नहीं थे, बस हमसे बात करना छोड़ देते थे।

इस बात का अहसास जैसे ही हमें होता तो हम अपनी गलती सुधार लेते थे या उनसे माफी मांग लेते थे। हम चाहते ही नहीं थे कि पिताजी हमसे नाराज हों। उनकी नाराजगी हमसे सहन नहीं होती थी। हम बस उनके चेहरे पर हमेशा मुस्कुराहट देखना चाहते थे।’

कमलिनी की बात को आगे बढ़ाते हुए नलिनी कहती हैं, ‘हां, पिताजी की नाराजगी हमें अच्छी नहीं लगती थी। स्कूल के दिनों की बात है, मैं स्पोर्ट्स में भी हिस्सा लिया करती थी लेकिन स्टेज पर ट्रॉफी लेने के लिए जाने में मुझे झिझक होती थी, मैं स्टेज पर बोल भी नहीं पाती थी।

एक बार मुझे किसी गेम की विनर ट्रॉफी लेने स्टेज पर जाना था, लेकिन मैं झिझक की वजह से वहां नहीं गई। उस दिन स्कूल में पापा भी आए हुए थे। मेरे ऐसा करने पर वह नाराज हुए।

इसके बाद उन्होंने मुझे समझाया कि खुद पर भरोसा रखो, आत्मविश्वासी बनो। पिताजी की इन बातों का मुझ पर गहरे तक असर हुआ।

तब से लेकर आज तक किसी भी मंच या जगह पर मुझे बोलने में झिझक नहीं होती है, मैं अपने विचार बहुत अच्छे से रख पाती हूं। यह सब संभव न होता, अगर पिताजी ने हौसला न दिया होता।’

आज भले ही नलिनी-कमलिनी के साथ उनके पिताजी नहीं हैं। लेकिन दोनों ने उन्हें कभी अपने से दूर महसूस नहीं किया। नलिनी बताती हैं, ‘आज भी मैं जब किसी उलझन में होती हूं, पिताजी की बताई बातों को याद करती हूं, इससे मेरी उलझन दूर हो जाती है, मुझे समाधान मिल जाता है। इस तरह देखा जाए तो वे आज भी हमारे साथ हैं। हम हमेशा उनके ऋणी रहेंगे, शायद ही यह ऋण हम चुका पाएं।’

कमलिनी भी मानती हैं कि पिताजी ने उनके लिए जो कुछ भी किया उसका आभार व्यक्त करना सरल नहीं है। वह कहती हैं, ‘पिताजी ने ही हमें नृत्य के क्षेत्र में आने के लिए प्रोत्साहन दिया था तो हमने अपने डांस इंस्टीट्यूट का नाम उनके नाम आनंद पर ही रखा है।

मैं तो सबसे यही कहना चाहूंगी कि अपने पिता को कभी दुख न पहुंचाएं, क्योंकि वे हर पल हमारी खुशी के लिए संघर्षरत रहते हैं। हमेशा ही पिता के प्यार, समर्पण का आभार व्यक्त करते रहें। इससे पिता को तो खुशी मिलेगी ही, आपका मन, जीवन भी खुशियों से भर जाएगा।’

शारदा सिन्हा, लोकगायिका

मुझे बाऊजी यानी अपने पिताजी स्व. सुखदेव ठाकुर का संरक्षण ना मिला होता तो मेरी जिंदगी का रुख कुछ और ही होता। उन्होंने मेरा जीवन संवारा है। बाऊजी संस्कृत और अंग्रेजी के विद्वान थे।

मैंने संस्कृत के कई श्लोक सिर्फ उनके मुंह से सुनकर याद किए हैं। यही कारण है कि बचपन में मैं कोई भी कविता या पंक्ति सीधे-सपाट पढ़ने के बजाय गुनगुनाने लगती थी। तभी मेरे बाऊजी ने महसूस किया कि मेरा रुझान गायन की तरफ है।

उनका मानना था कि हमारे अंदर अगर कोई कला है, तो उसे विकसित करना चाहिए। तभी जीवन में खुश रहा जा सकता है, सफल हुआ जा सकता है। उन्होंने मेरे लिए घर पर संगीत सीखने की व्यवस्था की। संगीत सिखाने वाले गुरुजी सप्ताह में तीन दिन मुझे संगीत सिखाते थे।

इसके अलावा बाऊजी ने मेरे व्यक्तित्व को संवारने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मुझे याद है उन दिनों पिताजी की डाक गांव के पोस्टऑफिस में आया करती थी। उसे लेने के लिए बाऊजी हमेशा मुझे भेजते थे। मैं साइकिल चलाकर उनकी डाक लेने जाती थी।

मुझे साइकिल चलाते देखकर गांव के लोग उनसे कहते थे बेटियों का इस तरह साइकिल चलाना अच्छा नहीं लगता है। तब वह बहुत शालीनता से जवाब देते, लड़की है तो क्या साइकिल नहीं चला सकती? इस तरह बाऊजी ने मुझे आत्मविश्वासी बनाया। वह हमेशा समय की कद्र करते थे।

समय के बहुत पाबंद थे। हर जगह समय से पहले पहुंचते थे। मैं बचपन में उनसे अकसर कहती थी कि एक-दो मिनट से क्या फर्क पड़ जाएगा? तब वह कहते थे कि एक मिनट भी कीमती होता है। यही सीख मैंने अपने बच्चों को भी दी है।

मेरे लिए बाऊजी ने जो कुछ किया, जो संस्कार मुझे दिए, उसके लिए तो मैं उनका आभार व्यक्त नहीं कर सकती। सच कहूं तो मैं खुद को उनका ऋणी महसूस करती हूं।

मैं उनके लिए कुछ भी कहूं, वह कम ही होगा। पिता दिवस पर मैं सहेली की पाठिकाओं से कहना चाहूंगी कि आपके पास चाहे वक्त बहुत कम ही क्यों न हो, लेकिन अपने पिता को समय जरूर दें।

उम्र के बढ़ने के साथ-साथ उन्हें अपने बच्चों की ज्यादा जरूरत होती है। आप अपने व्यस्त दिनचर्या में से उनके लिए समय जरूर निकालें। मेरी तरफ से सबको -हैप्पी फादर्स डे!

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