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नेत्र दान महादान: आई डोनेट कर दूर करें दूसरों के जीवन का अंधेरा

देश-दुनिया में नेत्रहीन यानी देखने में अक्षम लोगों की संख्या लाखों में है। इनमें से कई केवल इसलिए नहीं देख सकते क्योंकि उन्हें डोनेट की हुई आंखें उपलब्ध नहीं हो पाती हैं। ऐसे में यह जानना जरूरी है कि नेत्रदान क्यों जरूरी है और इसके लिए किन बातों का ध्यान रखना जरूरी है?

नेत्र दान महादान: आई डोनेट कर दूर करें दूसरों के जीवन का अंधेरा
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प्रोजेक्ट विजन एनजीओ के अनुसार भारत में 15 मिलियन लोग आंख की बीमारी से पीड़ित हैं, जिसमें से 20 फीसदी लोग कॉरनियल ट्रांसप्लांट के बाद देख सकते हैं। इसमें प्रत्येक साल 25 हजार नए मामले जुड़ते जाते हैं।

60 फीसदी मामलों में लोग मोतियाबिंद से पीड़ित हैं, जिसे 15 से 20 मिनट की सर्जरी के बाद ठीक किया जा सकता है। वहीं 20 फीसदी लोग रिफ्रैक्टिव इरर से ग्रसित हैं। ऐसे लोगों का उपचार से हो सकता है। चिंताजनक बात यह है कि कॉर्नियल ब्लाइंडनेस से पीड़ित अधिकांश युवा और बच्चे हैं।

वर्ष 1944 में टाउनली पेटन और डॉक्टर जॉन मैकलियन ने न्यूयॉर्क में पहले आई बैंक की स्थापना की थी। अपने देश में पहले आई बैंक की स्थापना 1945 में चेन्नई में की गई थी। डॉक्टर आरईएस मुथैया ने इसकी स्थापना की थी। इसके बाद से ही आंख दान को लेकर डॉक्टर्स और एक्टिविस्ट जागरुकता अभियान चला रहे हैं।

आई डोनेशन प्रोसेस

किसी पुरुष या महिला द्वारा मृत्यु के बाद आंख दान करने की क्रिया को आई डोनेशन कहा जाता है। समाज के हित में किया जाने वाले यह चैरिटी पूरी तरह से स्वैच्छिक होता है। यह समाज सेवा का बेहतरीन माध्यम है।

ऐसे में इसे प्रोत्साहित किया जाना चाहिए ताकि लोग इस तरह की चैरिटी के लिए आगे आएं। एक व्यक्ति के आंख दान से कई बार दो व्यक्तियों की जिंदगी में उजाला होता है। कोई जरूरी नहीं है कि इसके लिए पहले से रजिस्ट्रेशन कराया जाए।

कौन कर सकता है डोनेट

किसी भी उम्र के पुरुष या महिला आंख दान कर सकते हैं। हाइपरटेंशन, डायबिटीज, अस्थमा और ट्यूबरक्यूलोसिस आदि से पीड़ित भी स्वेच्छा से मृत्यु के बाद आंख दान कर सकते हैं। चश्मा पहनने वाले भी दूसरे के जीवन में रोशनी ला सकते हैं।

मोतियाबिंद का ऑपरेशन करा चुके लोग भी नेत्र दान कर सकते हैं। रेबीज, कैंसर, ब्रेन ट्यूमर, फूड प्वॉइजनिंग और ज्वॉइंडिस के रोगी के नेत्र ट्रांसप्लांटेशन के बजाय दूसरे कार्यों में उपयोग होते हैं।

रखना होता है ध्यान

दिल्ली स्थित गुरु गोविंद सिंह इंटनेशनल आई सेंटर एंड आई बैंक के सीनियर ऑपथैलमोलोजिस्ट डॉक्टर हंसपाल सिंह भिंडर बताते हैं, ‘किसी व्यक्ति के मृत्यु के बाद 6 से 8 घंटे के भीतर निकाले गए आंख ही उपयोग में आते हैं।

किसी के आंख दान करने की सहमति के बाद उसके आंख में नमी बनाए रखने के लिए उस पर लगातार पानी का छींटा डालना जरूरी होता है। नमी के लिए कॉटन के दो टुकड़ों को भीगाकर दोनों आंखों पर रखा जा सकता है।

ऐसा करने से आई सर्जन के आने तक कॉर्निया सूखता नहीं है। आंखों को हटाने के बाद आईलिड्स को स्टिच कर दिया जाता है। इससे यह पता नहीं चल पाता है कि आंखें हटाई गई हैं। पूरी प्रक्रिया में 15 मिनट के आस-पास का समय लगता है।’

ब्लाइंडनेस होती है दूर

कॉरनिया साफ टिश्यू होता है, जो आंख के बाहरी हिस्से को कवर करता है। कॉर्निया के धुंधला होने से दृष्टि प्रभावित होती है। इससे दृष्टि कम या समाप्त हो जाती है। दृष्टि समाप्त होने को कॉरनियल ब्लाइंडनेस कहा जाता है।

प्रभावित या क्षतिग्रस्त कॉर्निया को सर्जरी के द्वारा हटाकर स्वस्थ कॉरनिया का ट्रांसप्लांट कर इसे दूर किया जा सकता है। डॉक्टर हंसपाल सिंह भिंडर बताते हैं कि पूरी प्रक्रिया में 40 मिनट का समय लगता है।

आई बैंक के कार्य

आंख दान से संबंधित विभिन्न क्रिया-कलापों के लिए आई बैंक जिम्मेदार होते हैं। दानकर्ताओं से आंख कॉरनिया एकत्रित करना साथ ही उन्हें जरूरतमंदों को उपलब्ध कराना ऐसे बैंक के कार्यों में शामिल होता है। ऐसे बैंक में टिश्यू की ग्रेडिंग और मूल्यांकन भी किया जाता है।

उचित भंडारण और इस्तेमाल सुनिश्चित करना आई बैंक का ही काम होता है। शोध के लिए आंख के दूसरे हिस्सों का संग्रह और वितरण करना भी आई बैंक के कार्य में शामिल है। टेक्निशियंस को ट्रेनिंग भी आई बैंक में दी जाती है। आंख दान और इससे संबंधित गतिविधियों का आयोजन भी आई बैंक द्वारा किया जाता है।

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