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TIPS: दिल की बीमारी दूर करने एक लिए रोज करें ये योगा

अगर हम योगाभ्यास को अपनी नियमित दिनचर्या में शामिल कर लें तो काफी हद तक हृदय रोगों से बचे रह सकते हैं। जानिए, हृदय को स्वस्थ रखने में कारगर प्राणायाम के बारे में।

TIPS: दिल की बीमारी दूर करने एक लिए रोज करें ये योगा

अगर हम योगाभ्यास को अपनी नियमित दिनचर्या में शामिल कर लें तो काफी हद तक हृदय रोगों से बचे रह सकते हैं। जानिए, हृदय को स्वस्थ रखने में कारगर प्राणायाम के बारे में।

हृदय के स्वास्थ्य के लिए योगाभ्यास काफी लाभदायक साबित होता है। इसमें प्राणायाम, भुजंगासन,वज्रासन,गोमुखासन हृदय रोग से बचाने में कारगर भूमिका निभाते हैं। खासकर प्राणायाम का सकारात्मक प्रभाव हृदय समेत पूरे शरीर पर पड़ता है।

भस्त्रिका प्राणायाम

भस्त्रिका का अर्थ है धौकनी। धौकनी प्रायः लोहार के पास होती है। इस प्राणायाम में श्वांस बिल्कुल धौकनी की तरह चलने लगती है। इसलिए इस प्राणायाम को भस्त्रिका प्राणायाम कहा जाता है। प्रारंभः यह प्राणायाम स्वच्छ हवादार स्थान पर दरी या कंबल बिछाकर करना चाहिए।

पहली स्थितिः पद्मासन, सिद्धासन या सुखासन लगाकर बैठ जाएं। पीठ सीधा रखें। दाएं हाथ से दाएं नथुने को अंगूठे से दबाकर रखिए, तीसरी अंगुली को बाएं नथुने के बाजू में रखिए। बाएं नथुने से धीरे-धीरे श्वांस-प्रश्वांस कीजिए।

श्वांस की गति तेज धौकनी के समान बीस बार उदर के प्रसार एवं आकुंचन के साथ जल्दी-जल्दी कीजिए। एक लंबा श्वांस लेकर रुक जाइए। अब बाएं छिद्र को दबाकर दाएं से श्वांस को बाहर निकाल दीजिए। दाहिने ओर से ठीक यही क्रिया कीजिए।

दूसरी स्थितिः पूर्व स्थिति में बैठ जाएं। दोनों हाथ घुटनों पर रखिए। इस बार दोनों नासिका छिद्रों से एक साथ 20 बार श्वसन कीजिए। लंबा श्वांस लेकर रोक लीजिए। अब जालंधर एवं मूलबंध या किसी एक का अभ्यास कीजिए। शरीर को शिथिल कीजिए और श्वांस छोड़िए।

समयः तीन बार अभ्यास कीजिए, प्रत्येक अवस्था में आवृत्तियों की संख्या 5 तक बढ़ाई जा सकती है।

सावधानियां: बलपूर्वक श्वसन मत कीजिए। शरीर स्थिर रहे। हाफने की दशा यह सूचित करती है कि अभ्यास उचित विधि से नहीं किया जा रहा है। बेहतर है कि शुरू में योग शिक्षक के निर्देशन में ही इसे कीजिए। प्रत्येक बार विश्राम अवश्य कीजिए। प्रारंभ में अभ्यास धीरे-धीरे कीजिए। गर्मियों में इसका अभ्यास अधिक नहीं करना चाहिए।

अनुलोम-विलोम प्राणायाम

भस्त्रिका आसन के अलावा अनुलोम-विलोम भी हृदय के लिए लाभदायक है। अनु का अर्थ है सहित। अनुलोम-विलोम प्राणायाम में दोनों नासिकाओं से श्वसन बारी-बारी से पूरक और रेचक किया जाता है।

स्वाभाविक क्रम में इस प्राणायाम को करने के लिए वज्रासन को छोड़कर पद्मासन या सुखासन या किसी भी ध्यान के आसन में बैठ कर कर सकते हैं। इस प्राणायाम के माध्यम से नाड़ियों की सफाई होती है और व्याधियों पर नियंत्रण प्राप्त होता है।

स्थितिः ध्यानासन में बैठकर आंखें बंद रखिए। अब बायां हाथ घुटने पर रखिए और दाएं हाथ के अंगूठे को दाईं नासिका पर रखिए। तर्जनी अंगुली टीका पर दोनों भौंहों के बीच जहां टीका लगाते हैं पर रखिए।

विधिः अनुलोम-विलोम प्राणायाम को बाईं नासिका से चालू करना चाहिए। बाईं नासिका से श्वांस बाहर निकाल देंगे फिर दाईं नासिका से श्वांस लेकर बाईं नासिका से निकाल देंगे, यह एक चक्र होगा।

ऐसे लगभग 30 चक्र सामान्यतः करना चाहिए। अपनी सामर्थ्य के अनुसार अपनी श्वांस-प्रश्वांस की गति को घटा और बढ़ा सकते हैं। किसी भी स्थिति में थकान और तनाव महसूस नहीं होना चाहिए।

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