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दमा रोग में भी लाभकारी है भ्रमणासन

यह आसन रीढ़ की हड्डी और नर्वस सिस्टम को लचीला और मजबूत बनाकर उसमें सुधार लाता है।

दमा रोग में भी लाभकारी है भ्रमणासन

भ्रमणासन, मत्स्येंद्रासन से मिलता जुलता आसन है। भ्रमणासन के बाद शवासन की स्थिति में लेटना तथा गहरी सांस लेना और छोड़ना लाभकारी होता है। इस आसन के अभ्यास की तीन स्थितियां हैं। इसका अभ्यास स्वच्छ वातावरण और नीचे दरी या चटाई बिछाकर करें।

यह आसन रीढ़ की हड्डी और नर्वस सिस्टम को लचीला और मजबूत बनाकर उसमें सुधार लाता है। यह आर्डीनल ग्रंथियों पर प्रभाव डालता है, जिसके यकृत, प्लीहा और गुर्दे ठीक रहते हैं। इसके अभ्यास से झुके कंधे, झुकी पीठ और गलत बैठने से होने वाले दर्द खत्म होते हैं। यह आसन कब्ज, अजीर्ण व आलस्य को दूर करता है और यह रोगियों के लिए भी लाभकारी है।

ऊपर बताए गए स्थान पर दरी बिछाकर दोनों पैरों को सामने सीधे फैला लें। बाएं पैर को बिल्कुल सीधा रखें और दाएं पैर को घुटनों से मोड़कर बाएं पैर के घुटने के पास बाईं तरफ फर्श पर रखें। फिर दाएं हाथ को कमर के पीछे से घुमाकर कमर की दाईं ओर जितना संभव हो खीचें और बाएं हाथ की हथेली को दाएं पैर के पंजे पर टिकाकर रखें।

इसके बाद गहरी सांस लेते हुए सिर, कंधे व पीठ को दाईं ओर घुमाएं। अब जितनी देर श्वास रोक सकना संभव हो रोककर रखें। फिर सांस छोड़ते हुए धीरे-धीरे सिर, कंधे व पीठ को सामान्य स्थिति में ले आएं। इस तरह इस क्रिया को 2 से 3 बार करें। सांस रोकने की स्थिति 5 सेकंड की वृद्धि करते हुए 3 से 6 मिनट तक ले जाएं। इस आसन में अधिक देर तक रहने के लिए गहरी श्वास लेते रहना आवश्यक है। आसन को खोलते समय सांस को बाहर छोड़कर सामान्य रूप से सांस लें।

दूसरी स्थिति

पहले भ्रमणासन की पहली स्थिति का अभ्यास करने के बाद अपने दोनों पैरों को फैलाए रखें। इसके बाद दाएं पैर को घुटनों से मोड़कर बाएं घुटने के पास फर्श पर रखें और बाएं पैर के घुटने को मोड़कर एड़ी को नितंब से सटाकर रखें। बाएं हाथ को पहले की तरह दाएं पंजे के पास रखें। अब गहरी सांस लेते हुए सिर, गर्दन व छाती को धीरे-धीरे दाएं ओर घुमाते हुए ठोड़ी और कंधे की सीध में ले आएं।

इस स्थित में 10 सेकंड तक रहें, फिर धीरे-धीरे, सिर कंधों व छाती को सीधा कर लें। इस अभ्यास को फिर करें और सामान्य स्थिति में आने के बाद सांस सामान्य रूप से लें। इस क्रिया को दोनों पैरों की स्थिति बदल-बदल तक करना चाहिए।

तीसरी स्थिति

यह आसन दूसरी भ्रमणासन की तरह ही होती है। इसमें केवल बांहों की स्थिति में परिवर्तन किया जाता है। इसके अभ्यास के लिए भ्रमणासन की दूसरी स्थिति में आएं। फिर बाएं पैर को घुटने से मोड़कर दाएं पैर के घुटने के पास रखें। दाएं पैर को घुटने से मोड़कर बाईं ओर नितंब से सटाकर रखें।

बाएं हाथ को दाएं पैर के पंजों के पास रखें तथा दाएं हाथ को कमर के पीछे से घुमाकर बाईं ओर लाएं। इसके बाद गहरी सांस लेकर और सांत छोड़ते हुए धीरे-धीरे सिर, कंधों व छाती को बाईं ओर घुमा लें। इस क्रिया को 2 से 3 बार करें। फिर पैरों व हाथों की स्थिति बदलकर यही क्रिया बाईं ओर से भी करें।

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