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मीजल्स से बचाव, प्रिकॉशन-प्रॉपर ट्रीटमेंट

इस बीमारी के होने का प्रमुख कारक पैरामायक्सो वायरस है।

मीजल्स से बचाव, प्रिकॉशन-प्रॉपर ट्रीटमेंट

नई दिल्ली.मीजल्स में पेशेंट को तेज बुखार होने के साथ ही शरीर पर छोटे-छोटे लाल दाने निकल आते हैं। यह एक संक्रामक बीमारी है। इसमें जरा सी भी लापरवाही खतरनाक हो सकती है। इसलिए इसका समय पर इलाज और सावधानी बरतना जरूरी है।

मीजल्स यानी खसरा सांस से संबंधित एक बेहद इंफेक्टिव वायरल डिजीज है। विंटर और स्प्रिंग सीजन यानी सर्दी और वसंत ऋतु में इस बीमारी के वायरस ज्यादा एक्टिव रहते हैं इसलिए इस दौरान सावधानी बरतने की बहुत ज्यादा जरूरत होती है। खासकर साफ-सफाई को लेकर। इतना ही नहीं, चूंकि यह एक संक्रामक रोग है, इसलिए रोगी की देख-भाल को लेकर भी पूरी प्रिकॉशन बरतने की जरूरत होती है। ऐसा नहीं होने पर रोगी के संपर्क में आने वाला हर व्यक्ति बीमार हो सकता है। जानते हैं, इस बीमारी के बारे में कुछ महत्वपूर्ण बातें।

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कारण

इस बीमारी के होने का प्रमुख कारक पैरामायक्सो वायरस है। इससे संक्रमित होने वाले रोगी के खांसने-छींकने पर ये वायरस हवा में फैल जाते हैं और अपने संपर्क में आने वाले व्यक्ति को बीमार कर देते हैं। बचपन में टीकाकरण नहीं होने से बच्चों के इस रोग से ग्रस्त होने की संभावना बनी रहती है। कान में बैक्टीरियल इंफेक्शन, ब्रोंकाइटिस, निमोनिया, इनसेफेलाइटिस आदि बीमारियां होने पर भी मीजल्स होने का खतरा बढ़ जाता है। जिन लोगों में विटामिन ए की कमी होती है, उन्हें मीजल्स होने का ज्यादा खतरा रहता है।

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लक्षण

वायरस के संपर्क में आने के 10 से 14 दिनों के भीतर खसरे के लक्षण दिखाई देने लगते हैं। वायरल इंफेक्शन होने पर शुरुआत में पेशेंट को तेज बुखार, खांसी, नाक बहने, आंखों में जलन और सूजन, आंखों से पानी निकलने आदि की समस्या हो सकती है। जबकि इंफेक्शन के कुछ दिनों बाद मुंह के भीतर और गाल की भीतरी सतह पर छोटे-छोटे सफेद धब्बे दिखाई देने लगते हैं। इसके बाद चेहरे, गर्दन, पेट, पीठ, बांहों और टांगों पर घमौरियों की तरह लाल रंग के बेहद छोटे दाने या चकत्ते निकलने शुरू हो जाते हैं।

ट्रीटमेंट

मीजल्स का ट्रीटमेंट इस बात पर निर्भर करता है कि यह बीमारी कितनी गंभीर है। सामान्य तौर पर इसके होने पर एंटीपायरेटिक और डीकंजेस्टेंट दवाइयां दी जाती हैं। साथ ही पेशेंट को हाइड्रेट किया जाता है, यानी उसे ज्यादा से ज्यादा लिक्विड पीने के लिए दी जाती हैं। इस बीमारी में पेशेंट, खासकर बच्चों की बहुत ज्यादा देख-भाल की जरूरत होती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, इस बीमारी केजोखिम को कम करने के लिए बच्चों को दो दिन तक दिन में एक बार विटामिन ए देना चाहिए। रिकवरी के 2 से 4 सप्ताह के बाद भी विटामिन ए की कमी दिखाई दे तो विटामिन ए की तीसरी खुराक भी दी जा सकती है।

नीचे की स्लाइड्स में पढ़िए, सावधानियां -

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