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भूलकर भी बार-बार होने वाली घबराहट को न करें इग्नोर, हो सकती है ये गंभीर बीमारी

अस्त-व्यस्त जीवनशैली और निरंतर बढ़ते मानसिक दबाव की वजह से इन दिनों तेजी से बच्चों समेत हर उम्र के लोग एंग्जाइटी की गिरफ्त में आ रहे हैं। यह ऐसा रोग है, जिसकी वजह से पेशेंट को अपनी नॉर्मल लाइफ भी जीने में परेशानी होती है। ऐसे में जरूरी है कि एंग्जाइटी के लक्षण नजर आते ही उसका ट्रीटमेंट करवाया जाए।

भूलकर भी बार-बार होने वाली घबराहट को न करें इग्नोर, हो सकती है ये गंभीर बीमारी

अस्त-व्यस्त जीवनशैली और निरंतर बढ़ते मानसिक दबाव की वजह से इन दिनों तेजी से बच्चों समेत हर उम्र के लोग एंग्जाइटी की गिरफ्त में आ रहे हैं। यह ऐसा रोग है, जिसकी वजह से पेशेंट को अपनी नॉर्मल लाइफ भी जीने में परेशानी होती है। ऐसे में जरूरी है कि एंग्जाइटी के लक्षण नजर आते ही उसका ट्रीटमेंट करवाया जाए।

आज की प्रतिस्पर्धा वाली जीवनशैली, एकल परिवार के बढ़ते ट्रेंड के कारण अकेलेपन से जूझते लोग, आरामतलबी और निष्क्रिय जीवनचर्या और अनहेल्दी डाइट के चलते लोग कई मानसिक विकारों से ग्रस्त हो रहे हैं। जिनमें से एक एंग्जाइटी भी है, इससे हर उम्र के लोग प्रभावित हो रहे हैं।

ओवर वर्कप्रेशर के कारण और ज्यादा सोचने से घबराहट होने लगती है और इस वजह से कई काम छूट जाते हैं। इसी तरह एक्सट्रा करीकुलम एक्टिविटी का प्रेशर स्कूल जाने वाले बच्चों में भी एंग्जाइटी यानि घबराहट (Anxiety) बढ़ा रही है।

क्या है घबराहट (Anxiety)

हमारे मन में कई नकारात्मक विचार हर समय चलते रहते हैं। हमेशा अपने साथ कुछ गलत होने की आशंका, छोटी-छोटी बातों को लेकर बेवजह घबराहट, बेचैनी, चिंता और डर में हम घिरे रहते हैं। यही दशा बढ़ने पर एंग्जाइटी रोग बन जाता है। एंग्जाइटी एक नशे की तरह है।

कई बार आपको पता भी नहीं चलता कि बेवजह सोच की आदत के आदी हो गए हैं, लेकिन यह घबराहट जब इतनी बढ़ जाती है कि मरीज अपने पर्सनल या प्रोफेशनल काम पर ध्यान नहीं लगा पाता या रोजमर्रा का काम भी नहीं कर पाता तो ऐसी स्थिति को एंग्जाइटी डिसऑर्डर कहते हैं।

घबराहट (Anxiety) के प्रकार

एंग्जाइटी के साथ मरीज को दर्द या अकड़ हो सकती है। यह दिल से संबंधित बीमारियों का पहला कारण भी बन सकता है। अगर एंग्जाइटी बहुत समय तक रहती है, तो मरीज को डिप्रेशन, हाइपरटेंशन, ब्लड प्रेशर की समस्याएं होने लगती हैं। एंग्जाइटी कई तरह के हो सकते हैं।

1.सोशल एंग्जाइटी: इसमें व्यक्ति को किसी अजनबी के साथ बात करने में बहुत घबराहट होती है। भीड़ वाली जगहों या सामाजिक समारोह में जाने से बचने की कोशिश करते हैं। पार्टी में लोगों से घिरे होने पर इस हद तक अनकंफर्टेबल फील करते हैं कि उनका पसीना छूटने लगता है, खांसी या हिचकी आने लगती है।

2.बॉडी इमेज एंग्जाइटी: यह एंग्जाइटी 18-35 वर्ष के युवा वर्ग में अधिक देखी जाती है। वे अपनी बाडी की शेप, साइज, वजन, लंबाई को लेकर चिंतित रहते हैं। अपनी बॉडी के प्रति इतना ज्यादा कॉन्शस हो जाते हैं कि वे या तो बहुत ज्यादा खाने लगते हैं या खाना छोड़ देते हैं। हेल्दी लाइफ नहीं जी पाते।

3.जनरलाइज्ड एंग्जाइटी डिसऑर्डर (जीएडी): मरीज को हर चीज में बेवजह नेगेटिव या जरूरत से ज्यादा सोचने की आदत हो जाती है। उन्हें लगता है कि सारी समस्याएं उन्हें ही हैं और इससे वे असामान्य व्यवहार करने लगते हैं या अपने डेली रूटीन का काम ठीक से नहीं कर पाते।

धीरे-धीरे वे फिजिकली भी बीमार होते जाते हैं। उनकी इम्यूनिटी कमजोर होने लगती हैं और शरीर में दर्द, कमजोरी जैसी समस्याएं देखने को मिलती हैं।

4.ऑब्सेसिव कंपल्सिव डिसऑर्डर: इसमें मरीज लगातार चिंतित और भयभीत रहता है। उसमें अजीब आदतें विकसित हो जाती हैं जैसे-किसी व्यक्ति को सफाई की सनक हो जाती है और वो साफ-सुथरी चीजों को भी बार-बार पोंछता रहता है।

जिस बात से उसे परेशानी होती है, 20-22 घंटे उसी बात को लेकर सोचता रहता है, उसी के बारे में बात करता है, वही बात दोहराता जाता है। कुछ और नहीं कर पाता। दूसरे से बात करते हुए भी 10 मिनट की बातचीत में एक ही चीज 3 बार दोहराता है।

प्रमुख लक्षण

बच्चों और बड़ों में एंग्जाइटी की अलग तरह की फीलिंग्स हो सकती हैं। बड़ी उम्र के लोगों में एंग्जाइटी होने पर घबराहट होती है, हल्की सी सांस की रुकावट होती है, हार्ट बीट बढ़ जाती है, लगता है जैसे कुछ खराब होने वाला है। वहीं बच्चों में सांस न आने, चेस्ट या पेट में दर्द की फीलिंग होती है क्योंकि बच्चे घबराहट समझ नहीं पाते तो उनके लिए घबराहट की फीलिंग दर्द बन जाती है।

किसी भी चीज को लेकर घबराहट या व्यग्रता ज्यादा होना, हार्ट बीट बहुत तेज हो जाना, चेस्ट में दर्द होना, सांस लेने में कठिनाई होना, एकाग्रता में कमी आना, एक ही बात बार-बार दोहराना, परेशान होना, बॉडी टेंप्रेचर में असंतुलन होना।

कभी हाथ-पैर ठंडे पड़ जाना तो कभी बुखार जैसा महसूस होना, हाथ आपस में जोड़ना-खोलना, कंपन होना,हाथ-पैर में झुनझुनी, बहुत ज्यादा पसीना आना, कमजोरी महसूस होना, मांसपेशियों में तनाव होने से शरीर में दर्द होना, बहुत ज्यादा सपने आना, नींद न आना या नींद पूरी न होना, नेगेटिव विचारों पर कंट्रोल न होना, डरावने सपने देखना इसके अन्य लक्षण हैं।

उपचार

एंग्जाइटी के मरीज का ठीक होना इस बात पर निर्भर करता है कि एंग्जाइटी कितनी गंभीर है। बड़ों के बनिस्पत बच्चों में रिकवरी जल्दी होती है। मनोचिकित्सक मरीज की स्थिति के हिसाब से इलाज करते हैं।

1.कॉग्निटिव्स बिहेवियर थेरेपी (सीबीटी): इसमें मरीज के लर्निंग और थिंकिंग पैटर्न को चेंज किया जाता है। इसमें ब्रेन ट्यूनिंग एक्सरसाइज, माइंड और थॉट्स एक्टिविटीज के जरिए मरीज को बिहेवियर मॉडिफिकेशन सिखाया जाता है। इससे उसे जटिल परिस्थितियों से तालमेल बिठाने और ब्रेन को शांत रखने में मदद मिलती है।

2.साइकोएनालिसिस थेरेपी: अगर मरीज एडल्ट है और उनके बचपन में कोई ट्रॉमा हुआ हो तो उसे एक्सप्लोर और हील करते हैं।

3.हिप्नोथेरेपी या हिप्नोसिस थेरेपी: क्लीनिकल साइकोलॉजी की तरह हिप्नोथेरेपी या हिप्नोसिस थेरेपी भी प्रयोग की जाती है। जब मरीज अपनी मेमोरीज को बाहर नहीं निकाल पा रहा हो या एंग्जाइटी के रूट कॉज नहीं बता पा रहा हो तो कई मामलों में हिप्नोथेरेपी की जाती है।

4.विजुलाइजेशन और सिस्टेमेटिक डीसेंटरलाइजेशन तकनीक: इन तकनीकों के माध्यम से एंग्जाइटी को धीरे-धीरे इतना बढ़ाया जाता है कि उसे झेलने के लिए मरीज मानसिक रूप से तैयार हो जाए। इससे मरीज की मेंटल स्ट्रेंथ बढ़ती है।

5.प्ले थेरेपी और आर्ट थेरेपी: एंग्जाइटी के शिकार बच्चों का इलाज प्ले थेरेपी और आर्ट थेरेपी से किया जाता है। मनोचिकित्सकों द्वारा डिजाइन किए गए साइकोलॉजिकल गेम्स खेलने को दिए जाते हैं, जो काफी मददगार साबित होते हैं।

बचाव के उपाय

1.वैसे तो एंग्जाइटी से बचने के लिए कोई नियत मानदंड नहीं हैं, बचपन से आप छोटी-छोटी बातों पर व्यग्र होना सीखते रहते हैं, इसी से धीरे-धीरे एंग्जाइटी बढ़ती जाती है।

2.सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है हेल्दी लाइफस्टाइल मैनेज करना। तन-मन को एनर्जेटिक बनाए रखने के लिए एक्टिव रहें। डेली रूटीन में कम से कम 30 मिनट वॉक या एक्सरसाइज जरूर करें।

3.तनाव को कम करने के लिए घर से बाहर जाएं और वो काम करें, जो आपको पसंद हैं।

4.दोस्तों के साथ समय बिताएं, अपनी प्रॉब्लम्स शेयर करें।

5.जहां तक हो सके नींद पूरी लें, लेकिन नींद न आने पर स्लीपिंग पिल्स से परहेज ही रखें।

6.धूम्रपान और एल्कोहल से बचें, ये चीजें एंग्जाइटी बढ़ाती हैं।

7.पानी ज्यादा से ज्यादा पीना चाहिए ताकि आपकी बॉडी में डिटॉक्सीफिकेशन होता रहे। इससे नेगेटिविटी बाहर निकलती है।

8.एंग्जाइटी के मरीजों को अपनी प्रॉब्लम को समझकर इसे दूर करने के लिए तत्पर रहना चाहिए।

9.एंग्जाइटी के मरीज के दिलो-दिमाग में पहले ही न जाने कितनी बातें, नकारात्मक विचार घूमते रहते हैं, जिन्हें बाहर निकालने की जरूरत होती है। इसके लिए रीडिंग के बजाय क्रिएटिव राइटिंग की हैबिट बढ़ाएं।

10.एंग्जाइटी के मरीज को मेडिटेशन तब तक नहीं करनी चाहिए, जब तक कि वो अपने दिमाग को कंट्रोल करना न सीखे। बेहतर होगा किसी से बात करें, अपनी परेशानी डिस्कस करें या शेयर करें और उसका सॉल्यूशन भी ढूंढ़ें।

11.स्लीप डायरी मेंटेन करें, जिसमें रात को सोते समय आपके दिमाग में जो भी विचार बार-बार आ रहे हैं, उन्हें लिखना शुरू करें।

क्या कहते हैं आंकड़े

आंकड़ों पर नजर डालें तो पाएंगे कि भारत के महानगरों में 15-20 प्रतिशत लोग एंग्जाइटी के शिकार हैं। 50 प्रतिशत लोग ऐसे हैं, जो अपनी नींद पूरी नहीं कर पाते, जो एंग्जाइटी का प्रमुख कारण है। अधिक उम्र के लोगों में एंग्जाइटी ज्यादा देखने को मिलती है, जिनमें से 65-70 प्रतिशत हाउसवाइफ महिलाएं होती हैं।

वे बहुत अकेलापन महसूस करती हैं, उस अकेलेपन में दिमाग ज्यादा सक्रिय हो जाता है। महिलाओं में यह एंग्जाइटी लंबे समय तक चलती है। पुरुषों में एंग्जाइटी का रूप महिलाओं से ज्यादा गंभीर होता है। शॉर्ट-पीरियड का होने के कारण पुरुषों में यह खतरनाक होता है और हार्ट अटैक जैसी बीमारियों का रूप ले लेता है।

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