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पत्थर नहीं फुटबॉल से बदल रही हैं कुदसिया 200 पत्थरबाजों की जिंदगी

कुदरिया ने इन पत्थरबाजों को बदलने के लिए अपनी सीविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई तक छोड़ दी।

पत्थर नहीं फुटबॉल से बदल रही हैं कुदसिया 200 पत्थरबाजों की जिंदगी
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इन दिनों लगातार कश्मीर में आतंकियों के मारे जाने की खबरें आ रही हैं। लेकिन इस बीच एक उम्मीद की नई किरण भी सामने आई है। इस किरण का नाम है कुदसिया अल्ताफ। 23 साल की कुदसिया अल्ताफ कश्मीर यूनिवर्सिटी में बच्चों को फुटबॉल सिखाती हैं। कुदसिया अल्ताफ बीते कई महीनों से रोज शाम को 3.30 से 6.30 बजे तक बच्चों को फुटबॉल की बारिकियां सिखाती हैं।

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बीते साल लश्कर कमांडर बुरहान वानी के मारे जाने के बाद सेना और वानी के समर्थकों के बीच पत्थरबाजी की घटनाएं चरम पर थी। उस वक्त कुदसिया ने अपनी सीविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई छोड़कर घाटी में अमन लाने की कोशिशों में जुड़ने का फैसला किया।

कुदसिया ने पटियाला स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ स्पोर्ट्स में खुद को फुटबॉल कोच के रूप में तैयार किया। कुदसिया फुटबॉल को दिलोजान से प्यार करती हैं। कुदसिया 2007 से फुटबॉल खेल रही हैं और स्टेट लेवल तक खेल चुकी हैं, लेकिन उन्हें इस बात का मलला है कि वो देश के लिए नहीं खेल सकीं।

कुदसिया का कहना है कि मेरा सपना है कि इन लड़कों को मैं अंतर्राष्ट्रीय मैच में खेलता हुआ देखना चाहती हूं। मैं इन बच्चों को बंदूक, पत्थरबाजी, ड्रग्स और स्मोकिंग जैसी बुरी लतों से दूर रखती हूं। इनके पास दे का नाम रौशन करने का शानदार मौका है।

कुदसिया ने बताया कि उनके पास 3 दर्जन ऐसे लड़के हैं जो पत्थरबाजी को छोड़कर फुटबॉल खेलना सीख रहे हैं। अब ये सारे बदल चुके हैं और देश का नाम रौशन करना चाहते हैं। कुदसिया कोचिंग के अलावा इंटीरियर डिजाइनिंग में ग्रेजुएशन करना चाहती हैं। फिलहाल वो जम्मू-कश्मीर स्टेट स्पोर्ट्स काउंसिल की जॉब से बेहद खुश हैं।

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मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती की नई स्पोर्ट्स पॉलिसी के अंतर्गत उन्हें राज्य के अंडर-14 और 17 लड़के-लड़कियों को कोचिंग देने की जिम्मेदारी दी गई है। उन्हें इस काम के बदले में हर महीने 5 हजार रुपए वेतन के रूप में मिलता है।

कुदसिया उन 198 कोचों में शामिल हैं, जिन्हें महबूबा मुफ्ती सरकार ने खेल इंडिया स्कीम के तहत कोच पद के लिए नियुक्त किया है। इन खेलों में फुटबॉल के अलावा एथलेटिक्स, हॉकी, वॉलीबॉल, बास्केटबॉल जैसे खेल भी शामिल हैं।

कुदसिया उन 200 पत्थरबाजों को फुटबॉल सिखा रही हैं, जिनकी पहचान स्पोर्ट्स काउंसिल ने है। कुदसिया कहती हैं कि एक मुस्लिम लड़की होने के नाते मुझे लोगों की आलोचना भी झेलनी पड़ी थी। मैं हिजाब छोड़कर टी-शर्त और हाथ में बैंड पहना तो लोगों ने इस कई बार टिप्पणी भी की, लेकिन मैंने इन चुनौतियों का डट कर सामना किया।

कुदसिया अपने बारे में कहती हैं कि मैं एक अनुशासित कोच हूं। मुझे मेरे पिता ने पर्वतरोहण सिखाया। उन्होंने हमेशा मेरे समर्थन किया। मैं अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करूंगी। मैं इन नौजवान खिलाड़ियों से उर्दू और अंग्रेजी में बात करती हूं। ये सभी मेरा सम्मान करते हैं और जब ये कोई स्थानीय टूर्नामेंट जीतते हैं तो इन्हें ईनाम भी मिलता है।

साभारः टाइम्स ऑफ इंडिया

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