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मस्जिद और मोबाइल हैं कश्मीर में हिंसा के जिम्मेदार!

मुफ़्ती की तकरीर का यह वीडियो सोशल मीडिया पर काफी वायरल हो रहा है।

मस्जिद और मोबाइल हैं कश्मीर में हिंसा के जिम्मेदार!

कश्मीर में आतंकवादी मस्जिद और मोबाइल के जरिए आम लोगों को भड़काने का काम कर रहे हैं। जिस वजह से कई ऐसे लोग जो इस्लाम की नरमपंथी विचारधारा से प्रेरित थे कट्टरता को अपना रहे हैं।

उल्लेखनीय है कि बीते जून महीने में दक्षिण कश्मीर की एक मस्जिद में मुफ्ती शब्बीर अहमद कासमी ने हिज्बुल कमांडर जाकिर मूसा को खुल कर समर्थन दिया था और जिहाद में शामिल हो गये थे

मुफ्ती अपने इस भाषण में न केवल जाकिर मूसा और जिहाद का समर्थन ही कर रहे हैं बल्कि लोगों को इसके लिए प्रेरित भी कर रहे हैं। मस्जिद में मुफ़्ती की तकरीर का यह वीडियो सोशल मीडिया पर काफी वायरल हो रहा है।

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जम्मू कश्मीर में 1989 के बाद से ही मस्जिद केवल धार्मिक केंद्र न रह कर राजनीति का भी केंद्र बन गईं। जब मस्जिदों का इस्तेमाल सियासी ताकतों को बढ़ावा देने के लिए होने लगा तो घाटी में न केवल अलगाववाद बल्कि आतंकवाद की भी शरुआत हुई।

समय के साथ ही हनफी बरेलवी जैसे लोग जो इस्लाम की नरम विचारधारा के समर्थक थे का झुकाव इस्लाम की कट्टरता की तरफ होता जा रहा है।

अहले हदीस के जनरल सेक्रटरी डॉ. अब्दुल लतीफ ने कहा, 'मोटे तौर पर कश्मीर के 60 लाख मुसलमानों में से अब 10 लाख से ज्यादा लोग अहले हदीस को मानने लगे हैं।'

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घाटी में बढती इस्लामिक कट्टरता पर सुरक्षा अधिकारियों का मानना है कि वहाबी विचारधारा का प्रभाव इंटरनेट, सोशल मीडिया और मेसेजिंग प्लैटफॉर्म्स के चलते बढ़ा है जो इससे जुड़ीं मस्जिदों और साहित्य से कहीं ज्यादा खतरनाक है।

एक पुलिस अधिकारी ने बताया, 'कश्मीर के 2.8 मिलियन मोबाइल इंटरनेट यूजर्स हैं। अगर सिर्फ एक धर्म प्रचारक भी बुरहान और मूसा का गुणगान करता है तो उसका विडियो स्मार्टफोन्स के जरिए लाखों लोगों तक पहुंच जाता है।'

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