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जम्मू-कश्मीर में 175 युवाओं ने थामे हथियार, सेना के लिए बन सकते हैं बड़ा सिरदर्द

जम्मू-कश्मीर में इस साल अब तक ताबड़तोड़ सैन्य अभियानों में मारे गए आतंकियों का आंकड़ा भले ही दोहरे शतक के पार पहुंच गया हो। लेकिन इससे भी सेना का ब्लडप्रेशर कम होने का नाम नहीं ले रहा है। क्योंकि मारे गए इन आतंकियों का फौज से बदला लेने के लिए बड़ी तादाद में आम कश्मीरी युवाओं ने हथियार उठाकर आतंकवाद का दामन थाम लिया है।

जम्मू-कश्मीर में 175 युवाओं ने थामे हथियार, सेना के लिए बन सकते हैं बड़ा सिरदर्द
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जम्मू-कश्मीर में इस साल अब तक ताबड़तोड़ सैन्य अभियानों में मारे गए आतंकियों का आंकड़ा भले ही दोहरे शतक के पार पहुंच गया हो। लेकिन इससे भी सेना का ब्लडप्रेशर कम होने का नाम नहीं ले रहा है। क्योंकि मारे गए इन आतंकियों का फौज से बदला लेने के लिए बड़ी तादाद में आम कश्मीरी युवाओं ने हथियार उठाकर आतंकवाद का दामन थाम लिया है।

सूबे में तैनात तमाम सुरक्षा एजेंसियों से मिले ताजा इनपुट के हिसाब से अभी इनकी कुल संख्या करीब 175 बतायी जा रही है। जो कि अब तक मारे गए 230 आतंकियों की तुलना में आधे से अधिक है।

सेना की चिंता इनके सफाए के अलावा मौजूदा साल के खत्म होने में बचा हुआ शेष समय भी है। क्योंकि इस दौरान इनकी संख्या में इजाफा होने का खतरा बरकरार है। यहां बता दें कि बीते वर्ष 2017 में सूबे से आतंक का दामन थामने वाले कश्मीरी युवाओं की तादाद इस बार के मुकाबले काफी कम यानि 128 थी।

उम्र 18 से 20 साल
सेना के एक अधिकारी ने हरिभूमि को बताया कि जिन कश्मीरी युवाओं ने आतंकवाद की राह पकड़ी है। उनका संबंध दक्षिण-कश्मीर से है और उम्र 18 से 20 साल है। घाटी में लंबे वक्त से सक्रिय जैश-ए-मोहम्मद, लश्करे-तैयबा और हिजबुल मुजाहिद्दीन जैसे तीन खूंखार आतंकी संगठनों में ये शामिल हुए हैं। प्रतिशत की बात करें तो इन तीन आतंकी संगठनों में युवाओं की पहली पसंद हिजबुल मुजाहिद्दीन बना है यानि उससे सबसे ज्यादा संख्या में युवा जुड़े हैं।
उन्होंने कहा, भले ही ये युवा आतंकवादी 18 से 20 वर्ष के हों। लेकिन सेना को इनका पूरी तरह से खात्मा करने के लिए छह महीने का समय लगेगा। क्योंकि युवा आतंकियों के पास प्रशिक्षण के नाम पर बहुत कुछ नहीं होता है। चंद दिनों तक एके-47 बंदूक चलाने की ही ट्रेनिंग होती है। ऐसे में सेना द्वारा किसी भी ऑपरेशन के लिए फर्स्ट फायर खोलते ही इन्हें मार गिराया जाएगा। गौरतलब है कि सेना में फर्स्ट फायर का आकलन सैन्य अभियान के आगाज के बाद के 15 दिनों से किया जाता है।

घर वापसी का रास्ता खुला
सेना की 15वीं कोर के प्रमुख जीओसी-इन-सी लेफ्टिनेंट जनरल ए़के़ भट्ट ने भी कहा है कि अगर कोई स्थानीय आतंकवादी आत्मसमपर्ण करना चाहता है, कर सकता है। इसके अलावा अब इन आतंकियों के माता-पिता भी सोशल-मीडिया के तमाम माध्यमों और खुले बयानों के जरिए भटके हुए अपने बच्चों से घर वापस लौटने की अपील करने लगे हैं। क्योंकि उन्हें यह खौफ सता रहा है कि आतंकी बनने के बाद आज नहीं तो कल ये सुरक्षाबलों के हाथों मारे जाएंगे।

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