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विश्लेषण / कश्मीर में चुनाव का रास्ता साफ

राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने विधानसभा भंग कर जम्मू कश्मीर में नए जनादेश का रास्ता साफ किया है। इसके बाद भी मलिक और केंद्र को निशाने पर लेने का प्रयास किया जा रहा है।

विश्लेषण / कश्मीर में चुनाव का रास्ता साफ

यह कोई पहली बार नहीं है, जब जम्मू-कश्मीर में राष्ट्रपति शासन लगा हो अथवा विधानसभा भंग हुई हो। इससे पहले वहां सात बार गर्वनर शासन रह चुका है। 1977, 1986, 1990 से 1996 तक, 2002 में, 2008 से 2009 तक, जनवरी 2015 में और जनवरी 2016 में भी वहां राष्ट्रपति शासन लगा है। कई बार विधानसभा भंग हुई है। कई बार सरकारें बर्खास्त की गई हैं।

इसी साल जून में तब फिर से गर्वनर रूल लगाना पड़ा था, जब भारतीय जनता पार्टी ने पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती की सरपरस्ती में चल रही मिली जुली सरकार से समर्थन वापस ले लिया। भाजपा का कहना था कि महबूबा मुफ्ती आतंकवादियों, अलगाववादियों और पत्थरबाजों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई में निरंतर बाधक बन रही थी, जिसके चलते राज्य में कानून और व्यवस्था बुरी तरह चरमराकर रह गई थी।

जिस समय केन्द्र ने राष्ट्रपति शासन लगाया और एनएन वोहरा के स्थान पर सत्यपाल मलिक को राज्यपाल बनाकर भेजा, उस समय भी पीडीपी, नेशनल कांफ्रैंस और कांग्रेस ने केन्द्र और भाजपा की तीखी आलोचना की थी और उन हालातों के लिए भाजपा को जिम्मेदार ठहराने की कोशिश की थी।

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अब जबकि राज्यपाल मलिक ने विधानसभा भंग कर नए जनादेश का रास्ता साफ किया है, तब भी उन्हें और केन्द्र को निशाने पर लेने का प्रयास किया जा रहा है। जब भाजपा और पीडीपी ने मिलकर सरकार गठित की थी, तब कांग्रेस और नेशनल कांफ्रैंस ने इसे बेमेल गठबंधन करार देते हुए कड़ी निंदा की थी।

यही नहीं, जम्मू-कश्मीर विधानसभा में जितना हंगामा भाजपा-पीडीपी सरकार के दौरान हुआ, वह अभूतपूर्व था। कई बार सदन में महबूबा मुफ्ती को सिर पकड़कर बैठे हुए देखा गया, लेकिन अब वही नेशनल कांफ्रैंस और कांग्रेस पीडीपी की सरकार बनवाने में मदद करने के लिए तैयार हो गई तो यह सोचना होगा कि यह अवसरवाद है या हंगामा और आलोचना राजनीति से प्रेरित था।

जब से घाटी में राष्ट्रपति शासन है, तब से पत्थरबाजी और आतंकवादी वारदातों में भारी कमी देखी जा रही है। इस बीच आतंकवादियों की घेराबंदी और मुठभेड़ के मौकों पर स्थानीय लोगों की ओर से किए जाने वाले विरोध में भी कमी आई है।

माना जा रहा है कि इसकी एकमात्र वजह यही है कि अब ऐसा करने वालों को किसी भी तरह की रहमदिली और समर्थन की उम्मीद नहीं रह गई है, जो महबूबा मुफ्ती के मुख्यमंत्री रहते उन्हें हासिल थी।

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यह कहना गलत नहीं होगा कि केन्द्र की सख्ती और सैन्य अभियानों के चलते कश्मीर में आतंकवाद लगभग दम तोड़ने की स्थिति में आ पहुंचा है। ऐसे में यदि अवसरवादी राजनीतिक दल फिर से येन केन प्रकारेण सत्ता हासिल कर लेती तो वहां चल रही मुहिम को बहुत बड़ा आघात लगने की आशंका थी।

इसके अलावा एक डर यह भी बना ही रहता कि कांग्रेस अथवा नेशनल कांफ्रैंस किसी भी समय महबूबा मुफ्ती की सरकार को गिरा सकते थे। जिसका जिक्र खुद राज्यपाल ने भी किया है। यह ऐसा समय है, जब जम्मू-कश्मीर में किसी भी तरह की ढील देना आत्मघाती साबित हो सकता है।

जिस आतंकवाद की वहां लगभग कमर टूट चुकी है, उसे जरा सा राजनीतिक प्रश्रय मिलते ही सीमा पार से ऊर्जा हासिल हो सकती है। जिन हालातों से यह विशेष राज्य गुजर रहा है, उनमें बेमेल गठबंधन की अवसरवादी सरकार बनने के खतरे ही खतरे थे।

ऐसे में वहां विधानसभा भंग करने के फैसले को अनुचित और राजनीति से प्रेरित कहना सही नहीं होगा। बल्कि यह मानना ज्यादा सही होगा कि इस फैसले से चार-छह महीने में चुनाव होने का मार्ग प्रशस्त हो गया है। जिसे जनता चाहेगी, वह सत्ता संभालकर अपने हिसाब से जो सही होगा, वो फैसले लेगा। तब तक सेना और बाकी सुरक्षाबल जो मुहिम चला रहे हैं, उसमें किसी तरह की बाधा पहुंचाना न राज्य के हित में होगा न देश के हित में।

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