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कश्मीर में आतंकी हमले का इतिहास, नाइजीरिया तक फैली हैं जड़ें

जम्मू कश्मीर के पुलवामा जिले के श्रीनगर जम्मू राजमार्ग पर अवंतिपुरा इलाके में 14 फरवरी बृहस्पतिवार को जैश-ए-मोहम्मद के एक आतंकवादी ने विस्फोटकों से लदे वाहन से सीआरपीएफ जवानों की बस को टक्कर मार दी, जिसमें 40 जवान शहीद हो गए जबकि कई जवान घायल हो गए हैं।

कश्मीर में आतंकी हमले का इतिहास, नाइजीरिया तक फैली हैं जड़ें

जम्मू कश्मीर के पुलवामा जिले के श्रीनगर जम्मू राजमार्ग पर अवंतिपुरा इलाके में 14 फरवरी बृहस्पतिवार को जैश-ए-मोहम्मद के एक आतंकवादी ने विस्फोटकों से लदे वाहन से सीआरपीएफ जवानों की बस को टक्कर मार दी, जिसमें 40 जवान शहीद हो गए जबकि कई जवान घायल बताए जा रहे हैं। सीआरपीएफ के एक अधिकारी ने बताया कि आतंकवादी संगठन जैश-ए-मोहम्मद ने इस घटना की जिम्मेदारी ली है। पुलिस ने आतंकवादी की पहचान पुलवामा के काकापोरा के रहने वाले आदिल अहमद के तौर पर की है। उन्होंने बताया कि अहमद 2018 में जैश-ए-मोहम्मद में शामिल हुआ था। हताहतों की संख्या अभी और बढ़ने की आशंका है।

कश्मीर में आतंकी हमले का इतिहास

आतंकियों ने कश्मीर विधानसभा के लिए हुए चुनाव का बहिष्कार करने का फरमान जारी किया था, लेकिन लोकतंत्र में विश्वास करने वाली जनता ने अपनी मर्जी की राज्य सरकार चुनने के लिए बेखौफ होकर बड़ी तादाद में (लगभग 72 प्रतिशत) मतदान किया, जो निश्चित तौर पर अलगाववादियों व उनके आका पाकिस्तानी सेना को पसंद नहीं आया, इसलिए 5 दिसम्बर को 12 घंटे के भीतर जम्मू कश्मीर में चार अलग अलग जगहों पर आतंकी हमले हुए जिनमें 21 लोग मारे गए। यह आतंकी हमले उरी में मोहरा स्थित आर्मी कैंप, सौरा में अहमदनगर में, पुलवामा में और शोपियां में हुए। चूंकि इन क्षेत्रों में मतदान होना शेष था, इसलिए अनुमान यही है कि मतदाताओं में दहशत फैलाने के लिए हमले किए गए।

जब ऐसा लग रहा था कि माओवादी आतंक को नियंत्रण में ले लिया गया है, खासकर इस वजह से भी कि माओवादियों की चुनावी बहिष्कार धमकी के बावजूद छत्तीसगढ़ में मतदाताओं ने मतदान प्रक्रिया में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेकर एक बार फिर डाॅक्टर रमण सिंह की सरकार में अपना विश्वास व्यक्त किया था, तो इस साल नवम्बर के आखिर और दिसम्बर के शुरू में माओवादियों ने दो जबरदस्त आतंकी हमले किए और इनमें ग्रामीणों को मानव शील्ड के रूप में प्रयोग किया। पहली दिसम्बर को छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले में चिंता गुफा के निकट माओवादियों ने सीआरपीएफ के जवानों पर हमला किया जब वह दक्षिण बस्तर के घने जंगलों में कांबिंग के बाद अपने कैंप में लौट रहे थे। इस आतंकी हमले में सीआरपीएफ के 13 जवान शहीद हुए। इसी क्षेत्र मंे माओवादियों ने नवम्बर में भारतीय वायु सेना के हेलीकाॅप्टर पर हमला किया था जिसमें पांच जवान जख्मी हुए थे। यह हमला उस वक्त हुआ जब एक दिन पहले छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डाॅक्टर रमण सिंह ने घोषणा की थी कि वह दिन दूर नहीं जब छत्तीसगढ़ केन्द्र व राज्य सरकारों के संयुक्त प्रयासों से ‘नक्सल मुक्त’ हो जाएगा।

इस किस्म की चिंताजनक आतंकी घटनाएं केवल भारत तक ही सीमित नहीं हैं। अगर दुनिया भर में सरसरी नजर भी दौड़ाई जाए तो नए नए स्थानों पर नए आतंकी संगठन अमानवीय कृत्य करने पर उतारू हैं। मसलन, इस साल कम से कम दो बार सोमालिया के आतंकी संगठन अल-शहाब ने उत्तर पूर्व केन्या में घुसपैठ की और बसों में से उतारकर मासूम यात्रियों को मौत के घाट उतारा। एक वारदात में 28 और दूसरी में 36 बस यात्रियों को मारा गया।

नाइजीरिया में बोकोहराम की आतंकी गतिविधियां पूरे साल चिंता का विषय बनी रहीं। अगर बोकोहराम द्वारा अंजाम दिए गए जघन्य अपराधों का उल्लेख किया जाए तो केवल सूची भर से ही अखबार के कई पृष्ठ भर सकते हैं। बोकोहराम न सिर्फ उत्तर पूर्व नाइजीरिया में लोगों को मार रहा है बल्कि सैंकड़ों की तादाद में नाबालिग लड़कियों का अपहरण करके उन्हें जबरन धर्म परिवर्तन के लिए मजबूर करता है और उन्हें अपने सदस्यों में ‘विजय ट्राॅफी’ के रूप में बांटता है। यही नहीं, जो व्यक्ति भी बोकोहराम के खिलाफ बोलने का साहस दिखाता है तो उसे मौत के घाट उतार दिया जाता है। जब बोकोहराम का आतंक अपनी सीमा पार कर गया तो नाइजीरिया की सबसे बड़ी जामा मस्जिद के इमाम ने आम जनता से आग्रह किया कि वह बोकोहराम के खिलाफ हथियार उठाए। जवाब में बोकोहराम ने जुमे की नमाज के दौरान मस्जिद में ही आत्मघाती हमला किया, जिसमें 128 लोग मारे गए।

सीरिया और इराक में आईएसआईएस ने आतंक को एक नई परिभाषा देने का प्रयास किया है। अब तक होता यह था कि आतंकी संगठन हमला करके अपने बिल में छुप जाते थे लेकिन यह पहली बार देखने को मिल रहा जब एक आतंकी संगठन ने दो देशों- इराक व सीरिया- के न सिर्फ बड़े भू-भागों पर कब्जा जमाया हुआ है बल्कि उनमें अपनी ‘प्रशासनिक’ व्यवस्था भी लागू की है। हालांकि आईएसआईएस को कमजोर करने के लिए अमरीका ने कई बार हवाई हमले भी किए, लेकिन इस आतंकी संगठन को अब तक नष्ट नहीं किया जा सका है। हद तो यह है कि अपने प्रोपगंडा के बल पर यह संगठन यूरोपीय देशों से भी महिला व पुरुषों को रिक्रूट करने में कामयाब हो रहा है।

भारत से भी पांच युवक इसमें शामिल हुए, जिनमें से एक जब वापस कल्याण (मुंबई) लौटा तो उसे पुलिस ने पूछताछ के लिए हिरासत में लिया। आईएसआईएस का सबसे ज्यादा आतंक इराक के यजीदी अल्पसंख्यक समुदाय की लड़कियों पर है, जिन्हें वह जबरन कब्जे में लेकर ‘सेक्स स्लेव’ बना रहा है। हालांकि आईएसआईएस ने 36 भारतीय नर्सों को तो रिहा कर दिया, लेकिन अब भी लगभग इतने ही भारतीय उसके कब्जे में बताए जाते हैं, जिनके बारे में कोई ठोस सूचना नहीं है।

इस साल जून में जब आईएसआईएस ने उत्तर इराक के दूसरे सबसे बड़े शहर मोसूल पर कब्जा किया था तो उसका प्रोपगंडा यह था कि वह जनता को बेहतर जीवन प्रदान करेगा। लेकिन अब लगभग 6 माह बाद मोसूल के बाशिंदे एक अलग किस्म के आतंक के साए में जी रहे हैं। पीने के लिए स्वच्छ पानी नहीं है और इस कारण जो बीमारियां हो रही हैं उनका इलाज करने के लिए दवाओं की कमी है। हालांकि बुनियादी सेवाओं को लेकर इराक में इस वर्ष से पहले भी संकठ था, लेकिन जिन क्षेत्रों में आतंकी कब्जा है उनमें स्थितियां अब अधिक जटिल हो गई हैं।

आईएसआईएस के मजबूत होने से अलकायदा के प्रभाव क्षेत्र पर निश्चित तौर पर असर पड़ा है। लेकिन पाकिस्तान व अफगानिस्तान में तालिबान व अन्य आतंकी संगठनों के जरिए अलकायदा इस साल भी काफी सक्रिय रहा। हालांकि पाकिस्तान भारत के खिलाफ आतंकी संगठनों जैसे लश्करे तैबा आदि का इस्तेमाल करता है, विशेषकर कश्मीर में, लेकिन वह खुद भी आतंक की जबरदस्त चपेट में है और 2014 में शायद ही ऐसा कोई दिन गुजरा हो जब पाकिस्तान में आतंकी हत्याएं न हुई हों। अफगानिस्तान का भी यही हाल रहा।

1996 में तालिबान ने अफगानिस्तान में सत्ता पर कब्जा किया था जो 2001 तक जारी रहा। तालिबान की सरकार को पाकिस्तान, सऊदी अरब व संयुक्त अरब अमीरात ने मान्यता प्रदान की थी, लेनिक बाद में सऊदी अरब व संयुक्त अरब अमीरात ने अपनी मान्यता वापस ले ली थी। अब लगभग दो दशक बाद पाकिस्तान के पूर्व सैन्य शासक परवेज मुशर्रफ ने स्वीकार किया है कि तालिबान को मान्यता देना बहुत बड़ी गलती थी।

मुशर्रफ का कहना है कि 1997 में सोवियत संघ द्वारा अफगानिस्तान की घुसपैठ ने दुनिया भर का राजनीतिक माहौल बदल दिया और इसके बाद अमरीका ने तीन बहुत बड़ी गलतियां की। एक यह कि 25000 अफगान मुजाहिदीन, जिन्होंने सोवियत संघ के खिलाफ जंग लड़ी और पाकिस्तान में आकर रहने लगे, उन्हें पुनः स्थापित नहीं किया गया जिससे अलकायदा का गठन हुआ।

दूसरा यह कि पश्चिम ने तालिबान सरकार को मान्यता नहीं दी और तीसरा यह कि अमरीका के नेतृत्व में नाटो सेना ने अफगानिस्तान में घुसपैठ की जिससे सभी लड़ाके पाकिस्तान के पहाड़ी क्षेत्रों में आ बसे। कारण जो भी रहे हों लेकिन इतना तय है कि अब आतंक से स्वयं पाकिस्तान भी नहीं बच पा रहा है।

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