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जम्मू-कश्मीर: पाक के साथ संघर्ष विराम नहीं बढ़ने पर घाटी में राजनीतिक पार्टियां नाराज

सत्ताधारी पीडीपी ने कहा कि पार्टी को इस फैसले से निराशा तो है लेकिन वह ज्यादा कुछ नहीं कर सकती क्योंकि शांति कायम रखना दोनों तरफ की जिम्मेदारी है।

जम्मू-कश्मीर: पाक के साथ संघर्ष विराम नहीं बढ़ने पर घाटी में राजनीतिक पार्टियां नाराज

जम्मू-कश्मीर में रमजान के महीने में आतंकवादियों के खिलाफ अभियान चलाने पर लगाई गई रोक आज केंद्र सरकार द्वारा हटा लिए जाने पर राज्य की राजनीतिक पार्टियों ने ‘निराशा' जताई और संघर्षविराम को प्रभावकारी नहीं बना पाने के लिए केंद्र एवं राज्य सरकारों को जिम्मेदार ठहराया।

राज्य में मुख्य विपक्षी नेशनल कांफ्रेंस के प्रवक्ता जुनैद मट्टू ने पीटीआई - भाषा को बताया, ‘यह निराशाजनक है लेकिन ऐसा नहीं है कि यह पूरी तरह अप्रत्याशित फैसला हो।' मट्टू ने कहा कि केंद्र सरकार को परोक्ष रूप से कुछ ऐसे कदम उठाने चाहिए थे जिससे संघर्षविराम प्रभावकारी हो पाता।

सत्ताधारी पीडीपी ने कहा कि पार्टी को इस फैसले से निराशा तो है लेकिन वह ज्यादा कुछ नहीं कर सकती क्योंकि शांति कायम रखना दोनों तरफ की जिम्मेदारी है।

पीडीपी महासचिव पीरजादा मंसूर ने पीटीआई-भाषा को बताया, ‘शांति बनाए रखना दोनों तरफ की जिम्मेदारी है। यह एकतरफा चीज नहीं है। हमने अपनी तरफ से सब कुछ करने की कोशिश की। क्या कोई ऐसा विश्वास बहाली उपाय है जिस पर हमने या महबूबा ने काम नहीं किया?

पत्थरबाजों को माफी दी गई, उन पर दर्ज हजारों मुकदमे वापस लिए गए, यहां तक कि उनके मुकदमे भी वापस ले लिए गए जिन पर तत्कालीन नेशनल कांफ्रेंस सरकार ने 2010 में मुकदमे दर्ज किए थे।

मंसूर ने कहा, ‘वार्ता प्रक्रिया भी अपनाई गई। केंद्रीय गृह मंत्री ने हुर्रियत का नाम लेकर उनसे बातचीत के बारे में जिक्र किया। हम और क्या कर सकते थे ?' उन्होंने कहा कि घाटी के हालात ने पीडीपी के पास कोई विकल्प नहीं छोड़ा है। लेकिन पार्टी नाउम्मीद नहीं हुई है।

कांग्रेस की जम्मू-कश्मीर इकाई के अध्यक्ष जीए मीर ने कहा कि भाजपा की अगुवाई वाली सरकार के पास कश्मीर को लेकर कोई स्पष्ट नीति या रूपरेखा नहीं है।

उन्होंने कहा कि राज्य की मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियों ने रमजान के महीने में कश्मीर में संघर्षविराम की वकालत की थी, लेकिन केंद्र ने इसे वापस लेने का फैसला एकतरफा तरीके से किया।

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